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सुप्रीम कोर्ट ने जिन चार लोगों की कमिटी बनाई है, क्या उनमें ज्यादातर कृषि कानूनों के समर्थक हैं?

48 दिनों से चल रहे सरकार और किसानों वाले झगड़े में आज सुप्रीम कोर्ट ने रेफरी बनकर विसल बजा दी. कि अब रुक जाइए, कब तक लड़ते रहेंगे. कोर्ट पर समाधान के लिए भरोसा करिए. सुप्रीम कोर्ट ने तीन कानूनों के लागू होने पर फिलहाल रोक लगा दी, और एक कमेटी बना दी. आगे जाएं, उससे पहले एक बात समझें कानून पर रोक और कानून लागू होने पर रोक में फर्क होता है. आज कोर्ट ने जो कहा, उसका मतलब ये है कि तीनों कानूनों का अस्तित्व बना रहेगा. लेकिन वो अगले आदेश तक लागू नहीं माने जाएंगे.

मुद्दे पर वापस लौटते हैं. सरकार ने कोर्ट से कहा- ठीक है आपकी बात मान लेते हैं. किसान कह रहे हैं कि हमें इस सलाह में दिलचस्पी नहीं, आपके फॉर्मूले में हमें कोई ज्यादा फायदा नहीं दिख रहा है. इसलिए हम प्रदर्शन खत्म नहीं करेंगे. ये पूरी बात का निचोड़ है. आइए इसे गहराई में जाकर समझें. किसानों का प्रदर्शन जब शुरू हुआ था, तब से सरकार किसानों से कह रही है कि चलिए मिलकर एक कमेटी बना लेते हैं जिसमें कुछ लोग हमारी तरफ से होंगे, कुछ आपकी तरफ से. किसानों ने सरकार की ये बात नहीं मानी. अब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तरफ से एक कमेटी बना दी है और साथ में ये भी कह दिया है कि जो कमेटी के पास नहीं आएगा उसके बारे में ये समझा जाएगा कि वो झगड़ा सुलझाना ही नहीं चाहता. तो सरकार जिस कमेटी की बात कर रही थी और सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई, उसमें कितना अंतर है? कमेटी के मेंबर्स कौन कौन हैं, किस तरह के रुझानों वाले हैं? कमेटी क्या करेगी और क्या कमेटी बनाने से अब किसानों का प्रदर्शन खत्म हो सकता है? इस पर विस्तार से बात करेंगे. लेकिन पहले आज कोर्ट में जो बहस हुई वो आपके लिए समझना ज़रूरी है. कोर्ट की आज वाली सुनवाई से ये भी समझ आ जाएगा कि जो किसान या किसान संगठन तीनों कानूनों को रद्द करने से कम पर राज़ी नहीं, उन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट का क्या रवैया है.

प्रदर्शन में खालिस्तानियों के शामिल होने पर मोदी सरकार ने आज कोर्ट में क्या कहा?

भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की बेंच ने आज इस मामले पर कल से आगे की सुनवाई की. बहस की शुरुआत हरियाणा के किसानों के वकील एमएल शर्मा ने की. उन्होंने कहा कि कल उन्हें बात रखने का पूरा मौका नहीं मिला था इसलिए आज अपना पक्ष रखना चाहते हैं. एमएल शर्मा ने कहा कि किसानों से उनकी बात हुई है और किसान किसी कमेटी के सामने पेश नहीं होना चाहते, वो कानूनों को रद्द कराना चाहते हैं. शर्मा ने ये भी कहा है कि सरकार किसानों की ज़मीन छीन लेगी.

इस पर चीफ़ जस्टिस बोबडे ने कहा है किसानों की ज़मीन छिनने वाली बात किसने कही? किसी भी किसान की ज़मीन नहीं बिकेगी. ये बात हम अपने ऑर्डर में रखने के लिए तैयार हैं.

Sa Bobde
चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया शरद अरविंद बोबडे. (तस्वीर: पीटीआई)

फिर सवाल आया कि किसानों से प्रधानमंत्री ने बात क्यों नहीं की?

वकील एमएल शर्मा ने बेंच को बताया कि अब तक प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारी किसानों से बात नहीं की. इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि कृषि मंत्री ने किसानों के साथ कई बैठकें की हैं. इस बहस पर चीफ जस्टिस ने कहा है कि हम प्रधानमंत्री को ये नहीं बता सकते कि उन्हें क्या करना चाहिए.

फिर बात आई कि क्या दक्षिण भारत में भी किसान तीनों कानूनों के खिलाफ हैं? असल में तमिलनाडु से डीएमके के राज्यसभा सांसद तिरुची शिवा की याचिका पर एडवोकेट विल्सन पेश हुए थे. उन्होंने कोर्ट में कहा कि जिस तरह से ध्वनि मत से संसद में बिल पास किया गया था हम तो उसके भी खिलाफ हैं. चीफ जस्टिस ने कहा है कि हमें तो अटॉर्नी जनरल ने कल ये बताया था कि दक्षिण में लोग इन 3 कानूनों का समर्थन कर रहे हैं. इस पर एडवोकेट विल्सन ने कहा है कि विरोध में दक्षिण में भी रैली हो रही हैं. विजयवाड़ा जल रहा है. सरकार सुन नहीं रही है.

और अब सबसे दिलचस्प बात समझिए

शुरू से सत्ताधारी पार्टी के कई नेता कह चुके हैं कि प्रदर्शनों में खालिस्तानी शामिल हैं. हालांकि मोदी सरकार में कैबिनेट कमेटी ऑन सेक्योरिटी में बैठने वाले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इन बातों को खारिज किया था. लेकिन आज यही बात कोर्ट में फिर उठा दी गई. केंद्र का पक्ष रखने के लिए अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और वकीलों की पूरी फौज सुप्रीम कोर्ट में होती है. लेकिन बावजूद इसके ऐसे मामलों में हरीश साल्वे सुनवाई मिस नहीं करते हैं. आज भी नहीं की. उन्होंने कोर्ट में कहा कि ये सुनिश्चित होना चाहिए कि 26 जनवरी को प्रदर्शनकारी कुछ नहीं करेंगे. इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि इस बात पर तो किसानों के वकील दुष्यंत दवे पहले ही कोर्ट को भरोसा दे चुके हैं कि रिपब्लिक डे पर गणतंत्र दिवस के आधिकारिक कार्यक्रम में दखल देने की योजना नहीं है. टैक्टर रैली राजपथ की ओर नहीं जाएगी.

तब हरीश साल्वे ने कहा कि सिख फॉर जस्टिस संगठन का प्रदर्शन में शामिल होना चिंता की बात है क्योंकि ये संगठन खालिस्तान की मांग करता है. इंडियन किसान यूनियन की तरफ से वकील नरसिम्हन ने भी कोर्ट को बताया कि एक प्रतिबंधित संगठन इस आंदोलन में हिस्सा ले रहा है. इस पर मोदी सरकार के सबसे बड़े वकील यानी अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने भी कहा है कि हमारी जानकारी के हिसाब से एक प्रतिबंधित सगंठन प्रदर्शनकारियों को भटका रहा है. चीफ जस्टिस ने सरकार के वकील को निर्देश दिया कि आप इंटेलिजेंस एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर हलफनामा कोर्ट में दीजिए कि कोई प्रतिबंधित संगठन भी हिस्सा ले रहा है. कोर्ट ने ये भी कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना हमारा काम नहीं है. ये पुलिस का काम है.

Farmers Protest
किसान नए कृषि नियमों का लगातार विरोध कर रहे हैं. (तस्वीर: पीटीआई)

अब आते हैं कमेटी की बात पर

सुप्रीम कोर्ट ने चार सदस्यों की एक कमेटी बनाई है. कमेटी के चारों सदस्यों के बारे में भी विस्तार से बताएंगे लेकिन पहले ये बात समझिए कि कमेटी करेगी क्या. चीफ जस्टिस ने कहा है कि हम कमेटी अपने लिए बना रहे हैं, वो कमेटी सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट देगी. हम समस्या का समाधान चाहते हैं. जमीनी हकीकत समझने के लिए कमेटी बना रहे हैं. कोर्ट ने ये भी कहा कि इसमें कोई राजनीति नहीं है. और सभी को कोर्ट का सहयोग करना चाहिए. चीफ जस्टिस ने कहा-

You cannot accept the court when it suits you and reject it when it doesn’t suit you. You will have to co-operate with us. You cannot tell your clients all negative things.

माने आप सुप्रीम कोर्ट की बात को अपनी सुविधा के हिसाब से अपना या खारिज नहीं कर सकते. आपको सहयोग करना होगा. आप अपने मुअक्किलों को सिर्फ नाकारात्मक बातें नहीं बता सकते. इसके आगे कोर्ट ने वकीलों से कहा कि किसान संगठनों को समझाइए कि वो कमेटी से बात करें. चीफ जस्टिस ने कहा है कि अगर वो इस झगड़े को सुलझाना चाहते हैं कि तो हम ये नहीं सुनना चाहते कि वो कमेटी के सामने नहीं जाएंगे.

आज की सुनवाई में किसान संगठनों की तरफ से चारों बड़े वकील- दुष्यंत दवे, प्रशांत भूषण, एचएस फुल्का और कोलिन गोंजालवेस शामिल नहीं हुए. इन्होंने कल कहा था कि वो कमेटी के बारे में अपने क्लाइंट्स यानी किसानों से राय लेंगे और वो राय कोर्ट में रखेंगे. लेकिन आज की सुनवाई में जब चारों को गैरमौजूद देखा गया तो वकील हरिश साल्वे ने कहा कि ये वकील कल कह रहे थे कि ये 400 संगठनों के लिए पेश होते हैं लेकिन आज इनका ना आना चिंता की बात है. चीफ जस्टिस ने कहा कि हमने कल ही उनको सुन लिया था. हरीश साल्वे ने कहा है कि ऐसा नहीं लगना चाहिए कि कमेटी सिर्फ एक पक्ष की जीत है. हरीश साल्वे ने आज लगातार दूसरी बार ये किया है. उनका ज़ोर कल से ही इस बात पर है कि ऐसा न लगे कि अदालती कार्रवाई सरकार के खिलाफ है. वैसे सुप्रीम कोर्ट ने साल्वे की चिंता का समाधान करते हुए कहा कि ये न्याय की जीत होगी.

अब सवाल आता है कि सरकार जो कमेटी बनाना चाहती थी उसमें और सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई उसमें क्या अंतर है. सरकार ने जब कमेटी बनाने की बात किसानों से कर रही थी तो कानूनों पर फौरी रोक की बात नहीं कही थी. सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों के लागू होने पर स्टे लगाकर कमेटी बनाई है. सरकार किसानों और सरकार के बीच सुलह या बातचीत के लिए कमेटी बना रही थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हम किसी बीच-बचाव के लिए कमेटी नहीं बना रहे हैं, हर पक्ष को सुनेंगे. और क्लॉज बाइ क्लॉज कानूनों पर किसानों की आपत्ति कमेटी अपनी रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट को बताएगी.

एक अंतर और. सरकार जब कमेटी बनाने की बात कह रही थी तो साथ में ये भी कह रही थी कि किसान प्रदर्शन खत्म करें और कमेटी में आपत्तियों पर चर्चा हो. सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को आदेश नहीं दिया है कि वो प्रदर्शन खत्म करें. ना ही सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को ये आदेश दिया है कि वो कमेटी के सामने अपनी बात रखें. बस सलाह दी है. और ये लाइन खींच दी है कि जो कोर्ट की कमेटी का सहयोग नहीं करेगा उसके बारे में समझा जाएगा कि वो झगड़ा सुलझाना नहीं चाहता.

अब आते हैं कमेटी के चार सदस्यों पर

पहला नाम है- अशोक गुलाटी

Ashok Gulati

अशोक गुलाटी कृषि अर्थशास्त्री हैं. अभी एक थिंक टैंक- Indian Council for Research on International Economic Relations शॉर्ट में ICRIER के इंफोसिस चेयर प्रोफेसर हैं. 2015 में सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया था. गूगल पर इनके बारे में खोजने पर मिलता है कि जब अटल बिहार वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब उनकी आर्थिक सलाहकार परिषद में गुलाटी सबसे कम उम्र के सदस्य थे. वो मोदी सरकार के 2015 में बनाए Expert Group on Agriculture Market Reforms के अध्यक्ष रहे हैं. नीती आयोग के कृषि पर टास्क फोर्स के सदस्य हैं. Commission for Agricultural Costs and Prices यानी CACP के चेयरमैन रह चुके हैं. ये कमेटी सरकार को फसलों के मूल्यों पर सलाह देती है.

इसके अलावा मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने भी कृषि मामलों में अशोक गुलाटी की सलाह पूर्व में आधिकारिक तौर पर ली है. कुल मिलाकर अशोक गुलाटी बीजेपी सरकारों के साथ कृषि मामलों पर काफी वक्त से काम कर रहे हैं. अब तीन कृषि कानूनों पर इनकी राय क्या है, ये भी समझिए. जब कृषि कानून नहीं आए थे तब से अशोक गुलाटी इस तरह के कानून लाने की बात अखबारों में अपने लेखों में लिख रहे हैं. अशोक गुलाटी का मानना है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए निर्यात और फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को भी बढ़ावा देना ज़रूरी है. तो साफ तौर पर उन्हें प्रो रिफॉर्म माना जाता है. हालांकि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मामले में वो मोदी सरकार की आलोचना भी करते रहे हैं और ये भी लिखा कि मौजूदा कृषि विकास दर से ऐसा हरगिज मुमकिन नहीं है.

दूसरे सदस्य हैं भूपिंदर सिंह मान

Bhupendra Singh Maan

आज़ाद भारत के किसान आंदोलनों वाले इतिहास में भूपिंदर सिंह का नाम कई पन्नों पर मिलेगा. 1960 के दशक से अब तक कई बड़े किसान आंदोलनों की अगुवाई कर चुके हैं. अभी ये भारतीय किसान यूनियन और ऑल इंडिया किसान कॉर्डिनेशन कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक दिसंबर 2020 में हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से किसानों का एक प्रतिनिधि मंडल कृषि मंत्री तोमर से मिलने आया था जिसकी अगुवाई भूपिंदर सिंह मान ने की थी. इस प्रतिनिधिमंडल ने एक मेमोरेंडम कृषि मंत्री को देकर कृषि कानूनों का समर्थन किया था. कुछ संशोधनों की बात भी जोड़ी थी. मान ने तब कहा था कि कृषि को कॉम्पिटिटिव बनाने के लिए सुधार तो ज़रूरी हैं लेकिन किसानों के हितों की हिफाज़त होनी चाहिए. मान क्या संशोधन चाहते हैं ये भी उन्होंने बताया था कि एमएसपी पर ही खरीद हो इस पर कानून हो. चाहे सरकारी खरीद हो या प्राइवेट कोई भी एमएसपी से कम ना खरीदें और कम पर खऱीदने वालों पर कार्रवाई हो.

तीसरा नाम है प्रमोद कुमार जोशी

Pramod Kumar Joshi

ये भी कृषि अर्थशास्त्री हैं. इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट में साउथ एशिया के निदेशक हैं. कृषि शोध के क्षेत्र में ये बड़ा नाम हैं. प्रमोद जोशी का फाइनेंनशियल एक्सप्रेस में 15 दिसंबर 2020 का एक लेख मिलता है जिसमें वो कहते हैं कि मोदी सरकार के सकारात्मक रवैये के बावजूद किसान सुलह नहीं करना चाहते. एक दूसरे मौके पर वो कहते हैं कि MSP कानून का हिस्सा कभी नहीं हो सकता, ये दुनिया में कहीं नहीं हुआ आज तक. 2014 की मिंट में एक रिपोर्ट में जोशी का कथन छपा है जिसमें वो कहते हैं कि मंडी सिस्टम को ओवरराइड करने और आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन की जरूरत है. अब इससे आप कृषि कानूनों पर उनका रुख समझ सकते हैं.

चौथा नाम है अनिल घनवट का

Anil Ghanwat

ये महाराष्ट्र के किसान नेता हैं. शेतकारी संगठन के अध्यक्ष हैं. और किसान कानूनों पर सरकार की तरफदारी करते रहे हैं. अक्टूबर में शेतकारी संगठन ने किसान कानूनों के समर्थन में कार्यक्रम रखा था. कृषि मंत्री मंत्री नरेंद्र तोमर के बाद उनका एक बयान आया था कि 40 साल में पहली बार किसानों को ओपन मार्केट का लाभ मिलेगा. हालांकि शेतकारी सगंठन भी कानूनों में कुछ संशोधन की बात कर चुका है.

हमने आपको सुनवाई की जानकारी दी. कमेटी में शामिल विशेषज्ञ क्या राय रखते हैं, ये भी बताया. किसान नेता इनसे बात करेंगे कि नहीं, और अगर करेंगे तो कितने सहज होंगे इसे लेकर सभी चिंतित हैं. क्योंकि ये समझने के लिए न कृषि न कानून का विशेषज्ञ होने की ज़रूरत है कि कमेटी में आम राय क्या है.

कमिटी की आम राय जान लीजिए

टिप्पणीकार कह रहे हैं कि आज का दिन सरकार अंदर ही अंदर बड़ी खुश होगी. किसान आंदोलन को लेकर सरकार ने हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश की थी, लेकिन आंदोलन टस से मस नहीं हुआ था. सरकार की किरकिरी हो रही थी. फिर सरकार पीछे हटते भी नहीं दिखना चाहती थी. ऐसे में ये फैसला सरकार के लिए राहत से कम नहीं था. याद कीजिए किसानों और सरकार के बीच पहली मीटिंग के बाद की खबरें. तब भी एक कमेटी की बात हुई थी. किसानों ने कहा कि वो कमेटी से नहीं मिलेंगे, तो अब दूसरे रास्ते से कमेटी का गठन हो गया. किसान मिलना इस कमेटी से भी नहीं चाहेंगे लेकिन अब ऐसा वो किसी मोरल हाई ग्राउंड पर रहकर नहीं कर सकते. क्योंकि इससे जो बात किसान बनाम सरकार थी, वो किसान बनाम कोर्ट हो जाएगी. ऐसे में किसानों को जो जन समर्थन मिल रहा था, उसपर असर पड़ेगा. फिर कृषि कानूनों के लागू भर होने पर रोक लगी है. बात संवैधानिक आधार पर कानून खारिज होने तक नहीं आई है. ऐसा हुआ तो सरकार अदालती लड़ाई आसानी से नहीं हारेगी. समय सरकार के पक्ष में है.

और किसान चाहें जितने मज़बूत संकल्प वाले हों, समय उनके पाले से रोज़ निकलता जाता है. किसान घर से दूर हैं. दिल्ली की ठंड में हैं. बड़ी तकलीफ में हैं. प्रदर्शन स्थल पर किसानों की मौत के मामले आते जा रहे हैं. बावजूद इसके प्रेस की दिलचस्पी आंदोलन में कम होती जाएगी, जैसे ही दूसरी खबरें आगे आएंगी. ऐसे में किसान कितने दिन दिल्ली की सीमा पर रहेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन को फौरन खत्म करने या उसकी जगह से हटाने की बात नहीं की है. लेकिन किसान संगठन ये समझते हैं कि उनके पास असीमित संसाधन या समय नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने किसानों और सरकार के बीच गतिरोध का समाधान नहीं दिया है. उस समाधान को एक दिशा दे दी है. आंदोलन फिलहाल जारी रहेगा. दिल्ली में ट्रैक्टर रैली करने के मामले पर सोमवार को फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी. तब आपसे फिर इस मुद्दे पर विस्तार से बात होगी.


विडियो- कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है, अब आंदोलन करने वाले किसान क्या करेंगे?

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