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राजीव गांधी के हत्यारे ने संजय दत्त की मुश्किलें बढ़ा दी हैं

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बहुत सारे लोगों को पता है कि फिल्म अभिनेता संजय दत्त को जेल की सज़ा क्यों हुई थी. 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के केस में संजय दत्त का नाम सामने आया. Terrorist and Disruptive Activities (prevention) Act (TADA), हिंदी में लिखें तो टाडा, के तहत संजय दत्त पर मामला दर्ज किया गया. इसका कारण था संजय दत्त पर लगा आरोप, जिसमें कहा गया कि संजय दत्त ने अबू सलेम से एके-56 राइफल खरीदी. इस खबर में दूसरा नाम है पेरारिवलन का. कौन पेरारिवलन? भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में सज़ा काट रहा पेरारिवलन. पेरारिवलन पर आरोप था कि उसने राजीव गांधी को मारने में इस्तेमाल हुई आत्मघाती जैकेट के लिए 9 वोल्ट की बैटरी की सप्लाई की थी. पेरारिवलन अब तक जेल में है.

इस बारे में ओपन मैगज़ीन की पत्रकार शाहिना केके ने विस्तार से रिपोर्ट लिखी है.

जिस आत्मघाती जैकेट से राजीव गांधी की हत्या हुई थी, उसके लिए पेरारिवलन के बैटरी दी थी.
जिस आत्मघाती जैकेट से राजीव गांधी की हत्या हुई थी, उसके लिए पेरारिवलन के बैटरी दी थी.

रिपोर्ट के मुताबिक राजीव गांधी की हत्या के दोषी पेरारिवलन को सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारियां मिली हैं, उनसे संजय दत्त मुश्किल में पड़ते नज़र आ रहे हैं. संजय दत्त तो अब जेल से अपनी सज़ा काटकर निकल चुके हैं. अपनी सज़ा के दौरान भी कई दफा संजय दत्त पैरोल पर बाहर आए. इस बारे में पेरारिवलन को जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार जेल प्रशासन ने संजय दत्त को पैरोल और छुट्टी देने में कई बार नियमों का उल्लंघन किया.

जब तक मुकदमा चला, संजय दत्त कई बार जेल गए. ज़मानत पर बाहर आए. लम्बी चली सुनवाई के बाद 2007 में टाडा कोर्ट ने संजय दत्त को धमाकों के आरोपों से तो बरी कर दिया. लेकिन हथियार रखने के मामले में छः साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई. आगे चलकर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सज़ा को पांच साल के कारावास में तब्दील कर दिया. 16 मई 2013 को संजय दत्त ने आत्मसमर्पण किया. और जेल से छूटे 25 मई 2016 को. अपने कारावास के कई मौकों पर संजय दत्त पैरोल पर बाहर आए.

तारीख आई मार्च 24, 2016. संजय दत्त के जेल से छूटने के एक महीने बाद. पेरारिवलन ने पुणे की यरवडा जेल प्रशासन से पांच प्रश्नों पर सूचना के अधिकार के तहत जवाब माँगा. पेरारिवलन ने उन सारी मीटिंगों का हिसाब, लेखा-जोखा और आधिकारिक पत्र मांगे, जो संजय दत्त के जेल से छूटने से जुड़े हुए थे. पेरारिवलन ने इस बारे में भी जवाब मांगा कि किस क़ानून या संविधान की किस धारा-हिस्से के तहत संजय दत्त को जेल से छोड़ा गया? पेरारिवलन ने राज्य और केंद्र सरकार के बीच हुई पत्राचार की डीटेल मांगी और अपने किसी प्रतिनिधि के माध्यम से सारे रिकॉर्ड देखने की भी मांग की. पेरारिवलन को तीन साल बाद यानी 20 अप्रैल, 2019 को उनके सारे सवालों का जवाब मिला.

पुणे की यरवडा जेल से छूटने के बाद संजय दत्त.
पुणे की यरवडा जेल से छूटने के बाद संजय दत्त.

“ओपन” पत्रिका में छपी खबर के मुताबिक़, संजय दत्त को जेल से कई बार मिली छुट्टी में नियमों का पालन नहीं किया गया. पेरारिवलन ने ओपन के साथ जानकारियां साझा कीं. दरअसल टाडा जैसी संगीन धारा में बंदी को जेल से मिलने वाली छुट्टियों – जिसमें फरलो और पैरोल शामिल है (जिनके बारे में हम आगे बताएंगे) – में जेल प्रशासन या राज्य सरकार बिना केंद्र सरकार की सहमति के कोई निर्णय नहीं ले सकते. पेरारिवलन को यरवडा जेल से मिली जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार से किसी भी तरह का कोई भी आधिकारिक पत्र नहीं मिला था.

20 अप्रैल, 2016 को यरवडा केन्द्रीय कारगार के प्रथम अपीलीय अधिकारी ने पेरारिवलन को जो जानकारी मुहैया करायी, उसमें यह साफ़ किया गया कि संजय दत्त को जेल से छुट्टी देने को लेकर केंद्र सरकार के कोई भी कागज़ात जेल प्रशासन के पास नहीं मौजूद हैं. ‘ओपन’ के मुताबिक़, अपीलीय अधिकारी ने यह भी साफ़ किया कि संजय दत्त को जेल से छोड़ने के पहले केंद्र सरकार से कोई राय नहीं ली गयी.

संजय दत्त का जेल हिसाब

बम धमाकों के बाद संजय दत्त पहली बार जेल गए 19 अप्रैल, 1993 को. महज़ पंद्रह दिन जेल में काटने के बाद 4 मई को संजय दत्त ज़मानत पर बाहर आ गए.

दो महीने बाद संजय दत्त फिर से गिरफ्तार हुए और अब जेल से बाहर आए 16 अक्टूबर, 1995 को. दस साल से भी ज्यादा समय तक बाहर रहने के बाद आर्म्स एक्ट में संजय दत्त जुलाई 2007 में फिर से जेल गए. बाहर आ गए 20 अगस्त, 2007 को.

अब आया 2013. सुप्रीम कोर्ट ने एक साल सज़ा घटा दी.

संजय दत्त फिर से जेल गए मई 2013 में. चार ही महीने बाद उन्हें फरलो के तहत 14 दिन की छुट्टी दी गयी. जिसे फिर से दो हफ़्तों तक बढ़ा दिया गया.

संजय दत्त जेल वापिस आए 13 अक्टूबर, 2013 को. 6 दिसंबर को 30 दिनों के पैरोल पर फिर से छोड़ दिया गया.

छुट्टी ख़त्म होने के बाद जेल वापिस जाते संजय दत्त.
छुट्टी ख़त्म होने के बाद जेल वापिस जाते संजय दत्त.

उन्हें जनवरी 2014 में जेल में वापिस आना था. लेकिन वे नहीं आए. लगातार दो बार कुल मिलाकर 60 दिनों के लिए उनका पैरोल बढ़ाया गया. संजय वापिस आए 18 फरवरी, 2014 को.

दिसंबर 2014. संजय दत्त फिर से फरलो पर बाहर आए. और दो हफ़्ते बढ़ाने की मांग की. नहीं मिली. जेल वापिस आना पड़ा.

अगस्त 2015. संजय दत्त को 30 दिनों का पैरोल मिला. सितम्बर में वापिस आए. और 16 फरवरी 2016 को सज़ा पूरी करके जेल से रिहा हुए. और संजय दत्त रिहा भी हुए तो अपनी सज़ा कम कराने का आवेदन करने के बाद.

टाइमलाइन से पता चलता है कि संजय दत्त ने ज्यादा समय तो जेल के बाहर ही गुज़ारा है.. और पूरे कारावास के दौरान उन्हें 120 दिनों की पैरोल और 44 दिनों की छुट्टी मिली. ‘ओपन’ के मुताबिक़, इतना अवकाश मिलना, किसी भी कैदी के लिए लगभग नामुमकिन है.

क्या है Furlough (फरलो) यानी छुट्टी और Parole (पैरोल)

फरलो मतलब छुट्टी. अगर जेल के किसी कैदी पर अपराध सिद्ध हो गया है, और सज़ा हो गयी है तो उसे एक साल में जेल से 14 दिनों की छुट्टी मिल सकती है. ज़रूरत पड़ने पर ये छुट्टी दो हफ़्तों यानी और 14 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है. फरलो जेल के कैदी का अधिकार है. कई संगीन मामलों के मुज़रिमों को कई बार जेल प्रशासन से फरलो देने से भी इनकार किया है.

लेकिन इसके उलट पैरोल पूरी तरह से प्रशासन पर निर्भर करता है. किसी आपातकालीन स्थिति या ज़रूरी काम के लिए आवेदन करने पर जेल प्रशासन कैदी को पैरोल देता है. एक साल में अधिकतम 90 दिनों का पैरोल मिल सकता है, और एक बार में अधिकतम 30 दिनों का पैरोल मिल सकता है. पैरोल के बारे में यह भी जानना चाहिए कि यह कैदी का अधिकार नहीं है.

पेरारिवलन ने ऐसा क्यों किया?

एजी पेरारिवलन पर दो 9 वोल्ट की बैटरी सप्लाई करने का मुक़दमा चला था. उसे फांसी की सजा सुनाई गयी, लेकिन 18 फरवरी, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सज़ा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया. 19 फरवरी, 2014 को तमिलनाडु सरकार ने पेरारिवलन और अन्य छः अभियुक्तों को रिहा करने का ऐलान किया.

ऐसा बहुत हद तक संभव है कि पेरारिवलन को लगता हो कि सुप्रीम कोर्ट से राहत और राज्य सरकार से रिहाई मिलने के बाद भी वह जेल में ही है और संजय दत्त को नियमों को ताक पर रखकर छूट दी जा रही है. क्योंकि दोषी करार दिए जाने के बाद जब संजय दत्त अधिकतर समय जेल से बाहर समय काट रहे थे, तो जेल के अन्य बंदियों के परिजनों ने याचिकाएं दायर की थीं, जिन पर कोई सुनवाई नहीं हुई.


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