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'हम देखेंगे' विवाद की जड़ में है ये आदमी, जिसके विचार कठुआ रेप और मुसलमानों पर बहुत घिनहे हैं

‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे.’

फै़ज़ की नज़्म, जिसकी वजह से पिछले कुछ दिनों में तूफान आ गया. धरती धड़-धड़ धड़कने लगी. बिजली कड़-कड़ कड़कने लगी. अन-अल-हक़ के नारे की तरह ये तूफान ‘उट्ठा’ IIT कानपुर से. लेकिन इसका सिरा मिलता है एक शख़्स से, जिसने इस विवाद के बीज बोए.

नाम वशी मंत शर्मा. IIT कानपुर में अस्थायी टीचर. इन्होंने ही ये ‘खोज’ की थी कि फै़ज़ की नज़्म ‘हिंदू विरोधी’ है और शिकायत कर दी कि ये धार्मिक भावनाओं को ‘आहत’ करती है. इस बात की जांच के लिए फौरी तौर पर ‘ऐक्शन’ हुआ और 6 लोगों की जांच कमेटी बैठा दी गई. जामिया में हुई हिंसा के खिलाफ IIT कानुपर में ये नज़्म गायी गई थी. ‘शर्मा जी का लड़का’ इससे पहले भी कन्हैया कुमार, मुसलमानों, ताज महल को लेकर वही बातें कह चुका है, जो व्हाट्सऐप फॉरवर्ड के कचरे में मिलती रहती हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि 32 साल के वशी मंत मेकैनिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में पढ़ाते हैं. उनकी नियुक्ति साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट की INSPIRE स्कीम के तहत हुई. इस स्कीम में हर साल 27-32 साल के रिसर्च स्कॉलरों को कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर पांच साल के लिए रखा जाता है.

10 किताबें लिख चुके हैं

शर्मा ने IIT-बॉम्बे से मास्टर्स और पीएचडी की डिग्री ले रखी है. सोलर पॉवर और रिन्यूवेबल एनर्जी जैसे विषय उनके रिसर्च इंटरेस्ट हैं. ये जानकारी IIT-कानपुर की वेबसाइट पर है. इन्होंने 10 किताबें भी लिख रखी हैं. अग्निवीर नाम की संस्था इन्हें प्रकाशित करती है. संस्था की वेबसाइट पर वशी मंत को ‘मार्गदर्शक’ बताया गया है. इसके मुताबिक, संस्था का लक्ष्य ”वेदों की महिमा” को वापस लाना और ”अन्याय और भेदभाव” के हर स्वरूप से लड़ना है. शर्मा की किताबों के नाम ‘मुग़ल-हवस के शैतान’, ‘एक्सपोजिंग ज़ाकिर नाईक’, ‘इंडियन मुस्लिम्स-चिल्ड्रेन ऑफ इंडिया ऑर स्लेव ऑफ अरब’ हैं. वो इस्लामोफोबिया से भरे ट्वीट्स भी करते रहते हैं. ‘लव जिहाद’ पर उनके वीडियो अग्निवीर के यूट्यूब पेज पर हैं. ट्विटर बायो में उन्होंने ख़ुद को बेटी रक्षा, दलित-आदिवासी धर्म एकीकरण, धर्म प्रचार, गौ-जीव रक्षा का कर्ता-धर्ता बता रखा है.

इन ट्वीट्स में वशी मंत बता रहे हैं कि कैसे अपने बच्चों का धर्मांतरण होने से रोक सकते हैं. फोटो: Twitter
इन ट्वीट्स में वशी मंत बता रहे हैं कि कैसे अपने बच्चों का धर्मांतरण होने से रोक सकते हैं. फोटो: Twitter

इंडियन एक्सप्रेस ने वशी मंत से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने मना कर दिया. उन्होंने कहा कि अख़बारों को उनकी प्रोफाइल नहीं करनी चाहिए क्योंकि उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता है. शर्मा का कहना है कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, वो ”डिस्क्लेमर” के साथ है और इस पर फोकस किए बिना उनके लिखे के ग़लत मतलब निकाले जा सकते हैं.

वो विचार, जिन पर उन्हें लगता है इसके ‘ग़लत’ मतलब निकल सकते हैं

उन्होंने अपनी एक किताब में लिख रखा है,

अगर हिंदू रेप के लिए जाने जाते…तो कोई भी मुस्लिम महिला भारत में नहीं रह पाती.

वशी मंत का मानना है कि भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिंदू और बौद्ध थे. उन्होंने लिखा है कि शिवाजी की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बनने में लगने वाली लागत सही है क्योंकि सरकार ताज महल जैसी ”इस्लामिक साइट” पर भी पैसे खर्च करती है. जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर पटियाला हाउस कोर्ट में हमले को लेकर उन्होंने लिखा कि इससे ‘देशद्रोहियों’ पर लगाम लगेगी.

उनकी दो किताबों से कुछ हिस्से हम यहां लगा रहे हैं. ये इंडियन एक्सप्रेस में छपे हैं. इन किताबों के नाम हैं- A Liberal’s (F)Laws- Hypocrites that feed terrorism और Indian Muslims- Children of India or Slaves of Arabs

भारतीय मुसलमानों पर

दूसरी किताब में शर्मा भ्रमित मुसलमानों से अपनी भारतीय जड़ पहचानने की अपील करते हैं. वो लिखते हैं,

ये तथ्य है कि यहां के बहुत से मुसलमान सोचते है कि वो अरब के हैं, सच हमेशा से यही रहा है कि उनके पूर्वज हिंदू और बौद्ध हैं. ये सच्चाई उन्हें बुरी लगती है क्योंकि इससे वो अरब के मुसलमानों के सामने खुद को हीन महसूस करते हैं. अपने आपको और अल्लाह और मोहम्मद को दिलासा दिलाने के लिए कि वो अरबों से कम नहीं हैं, भारत में मुल्ले लोगों से हरसंभव तरीके से अरबों की नकल करने को कहते हैं.

इस किताब की शुरुआत में शर्मा ने डिस्क्लेमर दिया है कि उनकी किताब का उद्देश्य ‘दूसरों में एक समुदाय के प्रति नफरत फैलाना नहीं है.’ वो लिखते हैं कि ‘इस्लाम से उनका मतलब इस्लाम की व्याख्या करने वाले कट्टर इस्लामिक लोगों और उन्हें फॉलो करने वालों से है. जो ग़ैर-मुस्लिमों के बराबरी के अधिकार को खारिज करते हैं और धर्म को ना मानने वालों की हत्या को जायज ठहराते हैं.’ उनका कहना है, ”मेरी सारी आलोचना रूढ़िवादी तत्वों के लिए ही है, इसके अलावा किसी के लिए नहीं.”

ट्विटर पर जावेद अख्तर को ट्रोल करते वशी शर्मा. फोटो: Twitter
ट्विटर पर जावेद अख्तर को ट्रोल करते वशी शर्मा. फोटो: Twitter

कठुआ रेप पर

‘आसिफा रेप केस’ नाम के एक चैप्टर में उन्होंने कठुआ रेप मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच पर सवाल उठाए हैं. वो लिखते हैं,

और अंत में क्या आपने कभी सुना है कि हिंदू मंदिर में रेप करते है? ये हमारे खून में नहीं है. अगर हमने ऐसा किया होता, हमने मुस्लिम आक्रांताओं का उन्हीं की भाषा में प्रतिकार किया होता. उन्होंने मंदिर तोड़े और उनके ऊपर मस्जिद बनाई. उन्होंने लाखों का रेप किया. अगर हिंदुओं को रेप के लिए जाना जाता वो भी धर्म के नाम पर, तो कोई भी मुस्लिम आक्रांता या महिला भारत में नहीं बचती.

फ़ैज़ पर

1 जनवरी के अपने ब्लॉग में शर्मा इस बात से असहमति जताते हैं कि फ़ैज़ पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ थे और उनकी नज़्म सत्ता को चुनौती देती थीं. वो लिखते हैं,

क्रांतिकारी फ़ैज़ साहब ने सेक्युलर भारत की जगह जिन्ना के इस्लामिक पाकिस्तान को चुना. पाकिस्तान जिसने हिंदू-सिख-ग़ैर मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कसम खा रखी थी. नहीं, ‘हिंदू भारत’ में मौत के डर से उन्होंने पाकिस्तान नहीं चुना. उन्होंने सच में पाकिस्तान को मुस्लिमों की आज़ादी माना.’ 

उन्होंने ट्विटर पर फ़ैज़ की नज़्म पर अपने ब्लॉग का लिंक शेयर किया है. शेयर करते हुए ट्वीट में वो लिखते हैं,

सावरकर ने 28 साल अपनी भरी जवानी में जेल में बिता दिए. लिबरल उन्हें देशद्रोही बताते हैं. फ़ैज़ ने 1942 में ब्रिटिश आर्मी जॉइन की, आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने से मना कर दिया. लिबरल उन्हें डैडी बुलाते हैं.

वशी मंत अपने ब्लॉग में बता रहे हैं कि फ़ैज़ ने 1942 में ब्रिटिश आर्मी जॉइन की लेकिन फ्रीडम स्ट्रगल में भाग नहीं लिया. फोटो: Twitter
वशी मंत अपने ट्वीट में बता रहे हैं कि फ़ैज़ ने 1942 में ब्रिटिश आर्मी जॉइन की लेकिन फ्रीडम स्ट्रगल में भाग नहीं लिया. फोटो: Twitter

शिवाजी की मूर्ति पर

शिवाजी की मूर्ति पर होने वाले खर्चे को लेकर विवाद हुआ था. इस पर शर्मा ने कहा,

ASI की फंडिंग भी टैक्सपेयर्स के पैसे से होती है. मैंने कभी नहीं सुना कि आपने ताज महल, लाल किले जैसे स्मारकों पर हो रहे खर्चे पर चिल्लाया हो. आपके ही इतिहास के मुताबिक ये तब बने जब भारत सबसे ज़्यादा भुखमरी, सूखा, गरीबी झेल रहा था. बल्कि आप अपने बच्चे इन जगहों पर ले जाते हैं. लेकिन जब हम शिवाजी का स्मारक बनाने की बात करते है…आप जलने लगते हैं. अगर भारत सरकार के पास ताज महल, हुमायूं के मक़बरे और दूसरी इस्लामिक जगहों के रख-रखाव के पैसे हैं तो शिवाजी महाराज की मूर्ति पर चिल्लाना बंद कीजिए..

वशी मंत का कहना है कि वो RSS या बीजेपी से नहीं जुड़े हैं, अपनी रिसर्च ख़ुद करते हैं और अपने विचार रखते हैं. वो ख़ुद को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थक बताते हैं.


जब पाकिस्तान में फैज़ से मिलने के लिए प्रोटोकॉल तोड़कर पहुंच गए अटल बिहारी वाजपेयी

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