ओम पुरी नहीं रहे. सुबह सुबह फेसबुक पर ये स्टेटस पढ़ने को मिलता है और इसके बादइससे पहले से दिमाग में चल रहीं सारी चीज़ें खत्म हो जाती हैं. ठीक उनकी मशहूरफिल्म 'जाने भी दो यारों' के महाभारत वाले सीक्वेंस की तरह. जिसे एक बार देखने केबाद बस वही सीक्वेंस याद रह जाता है.हालांकि आज उनकी तमाम फिल्मों के बीच 'जाने भी दो यारों' का नाम बिना वजह याद नहींआ रहा. अक्सर फिल्म के निर्देशक कुंदन शाह और फिल्म की स्टार कास्ट दोहराती रही हैकि दोबारा ऐसी फिल्म नहीं बन सकती. लोग आहत हो जाते हैं. ओम पुरी भी आहत थे. कुछमहीनों पहले उनकी बातों को मीडिया के एक हिस्से ने आधा-अधूरा दिखाया. इसके बाद उनकोजिस तरह से ट्रोल किया गया, देशद्रोही जैसे लेबल उन पर चिपका दिए गए. वो रोए,फूट-फूट कर रोए. उस शहीद के घर पर गए जिसके अपमान का आरोप उन पर लगाया गया. उस गलतीके लिए प्रायश्चित करते रहे जो उन्होंने की ही नहीं थी.अभिनेता रजा मुराद ने बताया है कि वो शराब बहुत पी रहे थे. इसके चलते उनकी सेहतकाफी खराब हो गई. वैसे ओम पुरी लंबे समय तक गहरे डिप्रेशन में थे. 2003 में घुटनेकी एक सर्जरी हुई जिसके बाद करीब 2 साल तक वो छड़ी के सहारे चलने को मजबूर रहेशारीरिक दिक्कतों ने उन्हें जो तोड़ा वो अलग मगर बॉलीवुड के काम करने के तरीकों नेभी हिंदी सिनेमा के इस खास अभिनेता को कम तकलीफें नहीं दीं. ओम अक्सर कहते कि उनकेसबसे बेहतरीन काम के लिए उन्हें पैसे नहीं मूंगफलियां मिली हैं. कुछ स्टार पुत्रोंके लिए भी बोला कि सरनेम न होता तो कब के इंडस्ट्री से बाहर हो चुके हैं. इन सबकाखामियाजा भी उन्होंने भुगता. काम मिलना कम हुआ. तमाम ऐसी फिल्में की जो उनके जैसाअभिनेता कभी अपने पोर्टफोलियो में नहीं दिखाता. मगर इन सबके बाद भी वो बदले नहीं,एक तबके की भाषा में कहें तो सुधरे नहीं.क्या आज भी ऐसी तंज कसती फिल्म बन बन सकती है.सुधरते भी कैसे, ढाबे पर प्लेट धोने वाला लड़का मेहनत करके सरकारी नौकरी पा लेताहै. फिल्मों में काम करने के लिए वो क्लर्क की नौकरी छोड़ देता है, ये कहते हुए किकुछ नहीं हुआ तो वापस प्लेट धोने लगूंगा. चेचक के दाग भरे चेहरे और ढंग कीअंग्रेज़ी न जानते हुए भी ‘सिटी ऑफ जॉय’ ‘द रिलेक्टेंट फंडामेंटलिस्ट’ जैसी तमामहॉलीवुड फिल्मों में काम करता है. आतंकवादी और पुलिस वाले के किरदार बराबर शिद्दतसे निभा जाता है साथ ही 'चुप चुप के' 'मालामाल वीकली' जैसी मसाला फिल्मों में भी नभूलने वाली कॉमेडी कर जाता है. तमाम उपलब्धियों के बाद इंटरव्यू में बतता है किउसकी ख्वाहिश बस एक ढाबा खोलने की है, जिसका नाम दाल-रोटी हो.सिटी ऑफ जॉयओम पुरी के जाने की खबर अभी टीवी पर चल रही और टिकर पर ऐसे तमाम लोगों के नाम सामनेआ रहे हैं जो कुछ महीनों पहले ही सत्ता के गलियारों से अपनी नज़दीकियां बढ़ाने केलिए ओमपुरी जैसों के ऊपर पैर रख कर चढ़ रहे थे. उनकी फिल्मों और उनके सिनेमाईयोगदान को थोड़ा फुर्सत से याद करेंगे और करते रहेंगे. अभी तो मिर्च मसाला का वोक्लाइमैक्स याद आ रहा है जहां दुनाली लिए ओमपुरी पूरे गांव के सामने खड़े रहते हैंवो पक्ष चुनते हुए जो उन्हें सही लगता है. कहते हुए कि.बूढ़ा ही सही इस गांव में एक मर्द बाकी है.https://www.youtube.com/watch?v=hg7OnifZiMIजाने भी दो यारों का वो क्लासिक सीनhttps://www.youtube.com/watch?v=SDClKXKn0l8--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें :माफ़ी मांगकर शहीद की फैमिली का हिस्सा बन गए थे ओम पुरीपाकिस्तान पर 12 साल राज करने वाला हिंदुस्तानी