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पाकिस्तान पर 12 साल राज करने वाला हिंदुस्तानी

हॉलीवुड की बड़ी फिल्म में पाकिस्तानी डिक्टेटर जनरल ज़िया-उल-हक़ का रोल करने के लिए मेकर्स ने किसी पाक एक्टर को नहीं ओम पुरी को चुना. पाकिस्तानियों के सबसे आइकॉनिक रोल उन्होंने ही किए हैं.

ओम पुरी उन इंसानों में है जिन्होंने कभी भारत-पाकिस्तान को दो मुल्क नहीं समझा. उन्होंने हमेशा राजनीति और हिंसा से परे इंसान देखे और शांति की बात की. हाल ही में जबरन उन्हें इसलिए शर्मिंदा किया गया क्योंकि वे शांति और समझदारी की बात कर रहे थे. अफसोस. वे एक कद्दावर एक्टर हैं और उनका एक्टिंग प्रोफाइल ऐसा है जिससे नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेताओं को भी जलन होती है.

ऐसे इंटरनेशनल रोल ओम को मिले जिन्हें पाने की हसरत हर किसी को होती है. रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ से लेकर हाल ही में हेलन माइरेन के साथ आई उनकी फिल्म ‘द हंड्रेड फुट जर्नी’ तक ऐसी फिल्मों की सूची बहुत लंबी है. तमाम किरदारों के बीच कुछ फिल्में ऐसी भी रही हैं जिनमें उन्होंने पाकिस्तानी कैरेक्टर्स किए. खासकर इंटरनेशनल फिल्मों में. हाल ही में उन्होंने अपनी पहली पाकिस्तानी फिल्म भी की.

जानते हैं ऐसी ही सात फिल्मों के बारे में जिनमें ओम पुरी पाकिस्तानी बने:

#1. ईस्ट इज़ ईस्ट

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ओम पुरी के करियर के सबसे यादगार रोल्स में से एक इसमें रहा. जिसे देखकर हंसे और रोए बिना नहीं रह सकेंगे. ईस्ट इज़ ईस्ट (1999) की कहानी पाकिस्तानी मुस्लिम जॉर्ज की है जो आयरिश मूल की पत्नी एला और सात बच्चों के साथ ब्रिटेन में रहता है. पहले नाम जहीद खान था, पाकिस्तान में एक पत्नी भी थी जिसे बहुत पहले छोड़ इंग्लैंड चला आया. आ तो जाता है और लाइफ भी सेट हो जाती है लेकिन अब उसे अपने बच्चों के कल्चर की चिंता है जो ब्रिटिश होते चले गए हैं जबकि वो उन्हें पाकिस्तानी मुस्लिम आइडेंटिटी के साथ देखना चाहता है. लेकिन बच्चे नहीं सुनते. यही बात उसे तंग कर रही है और इसी को लेकर उसका बच्चों और बीवी से टकराव होता है.

इस मज़ेदार ब्रिटिश कॉमेडी में इंटेंस ड्रामा भी बहुत है. ओम पुरी का टूटी-फूटी इंग्लिश बोलना और ब्लूडी शब्द का इस्तेमाल याद रहता है.

#2. चार्ली विल्सन्स वॉर

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इस हॉलीवुड कॉमेडी ड्रामा (2007) में ओम पुरी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया-उल-हक़ का रोल किया. जो पहले पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष हुआ करते थे लेकिन बाद में डिक्टेटर बन गए. एक दशक से ज्यादा वक्त तक उन्होंने राज किया. इस फिल्म में टॉम हैंक्स ने अमेरिकी सरकार के आदमी चार्ली विल्सन का रोल किया जो अफगानिस्तान में सोवियत संघ के दखल को खत्म करने के गुप्त मिशन पर काम करता है. अफगानिस्तान के मुजाहिदों को सोवियत संघ के खिलाफ हथियार देकर उन्हें लड़वाने का काम करने में चार्ली की मदद करता है ओम पुरी का पात्र यानी जनरल ज़िया-उल-हक़.

फिल्म में जूलिया रॉबर्ट्स, फिलिप सीमूर हॉफमैन ने भी प्रमुख रोल किए. ध्यान देने वाली बात है कि एक पाकिस्तानी जनरल का रोल करने के लिए निर्माताओं ने किसी पाकिस्तानी एक्टर को नहीं लिया, ओम पुरी को लिया.

#3. वेस्ट इज़ वेस्ट

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निर्माता लेस्ली उडविन ने ईस्ट इज़ ईस्ट की ये सीक्वल 2010 में बनाई. इसमें ओम पुरी फिर से जॉर्ज के रोल में दिखे. यहां कहानी पिछली फिल्म के पांच साल बाद 1976 में शुरू होती है. उसका बड़ा बेटा हिप्पी बन चुका है. छोटा बेटा साजिद चोरी करता पाया जाता है. जॉर्ज उसे पाकिस्तानी बाप की तरह पीटता है तो वो उसे ‘डर्टी पाकी बास्टर्ड’ गाली देता है. इससे जॉर्ज अंदर तक हिल जाता है और साजिद को लेकर पाकिस्तान जाने का फैसला करता है ताकि उसे सुधार सके. वो जाता है और उसका सामना पहली पत्नी और बच्चों से होता है. फिल्म फनी रहती है लेकिन यहां कई बार रुलाती भी है. ओम का अभिनय बांध देता है.

#4. द रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट

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डायरेक्टर मीरा नायर ने मोहसिन हामिद के नॉवेल पर ये फिल्म 2012 में रिलीज की. ओम पुरी ने इसमें एक पाकिस्तानी पोएट का रोल किया जिनकी सब बड़ी इज्जत करते हैं. ये पात्र गैर-पूंजीवादी मूल्यों में श्रद्धा रखने वाला आदमी है. उसके लिखे शब्दों का अनुवाद दूसरी भाषाओं में भी हुआ है. वहीं दूसरी ओर फिल्म का केंद्रीय पात्र चंगेज है जो उसका बेटा है. उसे अमेरिका आकर्षित करता है. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप मिल जाती है और वो चला जाता है. फिर बड़ी फर्म में काम करने लगता है. लेकिन 9/11 के हमले के बाद मुस्लिमों के लिए अमेरिका में माहौल ख़राब हो जाता है. चंगेज को भी इसका रूप देखने को मिलता है. अंत में वो लाहौर लौट आता है और पढ़ाने लगता है. ओम पुरी द्वारा निभाया उसके अब्बू का पात्र उसे प्रेरणा देता रहता है.

#5. बजरंगी भाईजान

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कबीर खान द्वारा निर्देशित ये फिल्म (2015) कहानी है बजरंगी नाम के भोले ब्राह्मण युवक की जो हनुमान का भक्त है. बोलने में असमर्थ एक बच्ची शाहिदा पाकिस्तान जा रही ट्रेन से उतरती है और भारत में ही छूट जाती है. बजरंगी उसे उसके घरवालों के पास पहुंचाने का प्रण लेता है. वो बॉर्डर पार करके चला जाता है लेकिन वहां उसे पुलिस से बचते फिरना होता है. इस दौरान वो रात एक मस्जिद में बिताता है. सुबह आंख खुलती है तो बच्चे घेरे हंस रहे होते हैं. पूछता है, ये क्या जगह है तो बच्चे कहते हैं, मस्जिद. और ये सुनते ही बजरंगी नंगे पैर बाहर दौड़ जाता है.

उसे लगता है उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. तभी वहां मौलाना आते हैं जो यहां बच्चों को बढ़ाते हैं. ये रोल ओम पुरी ने किया. उनका पात्र बजरंगी से कहता है, “बाहर क्यों खड़े हो?” तो वो कहता है, “हम कैसे अंदर जा सकते हैं, हम मोमडन नहीं हैं.” तो मौलाना हंसते हैं, “तो क्या हुआ मेरे भाई! ये जगह सबके लिए खुली है. इसीलिए हम मस्जिद में कभी ताला नहीं लगाते. आ जाओ.” वो बजरंगी की मदद करते हैं. अंत में विदा लेते हुए जब वो हाथ मिला रहा होता है तो मौलाना हंसते हैं और बाहों में भर लेते हैं. ओम के इस पात्र को देख कलेजे में ठंडक भर जाती है.

#6. एक्टर इन लॉ

पिछले महीने रिलीज हुई ‘एक्टर इन लॉ’ ओम पुरी के करियर की पहली पाकिस्तानी फिल्म है. ये कहानी है एक युवा वकील शान मिर्ज़ा की जो एक्टर बनना चाहता है. लेकिन फिलहाल के लिए अदालत में ही रिहर्सल करता चलता है. लेकिन उसके पिता को एक्टिंग पसंद नहीं. ये रोल ओम पुरी ने किया है. शान फिर कुछ ऐसा करता है जिससे उसकी और उसके परिवार की बड़ी बदनामी होती है. ओम का किरदार उसे घर से निकाल देता है. अंत तक शान को सबकुछ सही करना है और अपने पिता का स्नेह पाना है.

#7. माई सन द फैनेटिक

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1997 में रिलीज हुई ये ओम पुरी की पहली फिल्म थी जिसमें वे पाकिस्तानी बने थे. इससे दो साल पहले निर्देशक उदयन प्रसाद की ही ‘ब्रदर्स इन ट्रबल’ भी आई थी जिसमें ओम थे लेकिन उनके किरदार की पृष्ठभूमि इतनी स्पष्ट नहीं थी. हालांकि वो कहानी ब्रिटेन में गैर-कानूनी तौर पर रहे रहे पाकिस्तानी व एशियाई इमिग्रेंट्स की थी. लेकिन ‘माई सन द फैनेटिक’ से ओम को बड़ी पहचान मिली. वेस्ट में आलोचकों ने इस फिल्म में उनके काम को काफी सराहा.

इस कहानी में ओम के पात्र का नाम परवेज़ होता है जो पाकिस्तान में जन्मा और रोजगार के लिए इंग्लैंड में आ बसा. इतने बरसों के बाद भी वो टैक्सी ही चलाता है जबकि उसके साथ आए उसके परिचित धनी हो चुके हैं. परवेज एक खुले विचारों वाला, सहिष्णु मुस्लिम है लेकिन उसका कॉलेज में पढ़ने वाला बेटा अक़बर अपने धर्म के प्रति कट्‌टर होने लगता है. पिता के बहुत समझाने पर भी वह अपना रास्ता नहीं बदलता और चरमपंथी बन जाता है. परवेज का परिवार इससे बिख़र जाता है.

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