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UAPA के आखिरी केस में बरी होकर अखिल गोगोई बोले- सच्चाई की जीत हुई

अखिल गोगोई (Akhil Gogoi). असम की राजनीति में बड़ा नाम हैं. कृषक मुक्ति संग्राम समिति और राईज़ोर पार्टी के नेता हैं. हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में सिबसागर सीट से विधायक बने हैं, वो भी जेल से चुनाव लड़कर. कैद में थे  क्योंकि उन पर अन्लॉफ़ुल ऐक्टिविटीज़ प्रिवेन्शन ऐक्ट (UAPA) के तहत आरोप थे. लेकिन अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की अदालत ने अखिल गोगोई और तीन अन्य लोगों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. इसके बाद गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज से उन्हें रिहा कर दिया गया. अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था.

रायज़र पार्टी के प्रमुख गोगोई ने रिहाई के बाद पत्रकारों से बात की. इसे सच्चाई की जीत करार दिया. उन्होंने कहा,

“आखिरकार सच्चाई की जीत हुई, हालांकि मुझे सलाखों के पीछे रखने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी गई थी.”

गोगोई ने बताया कि वह 2019 में एंटी CAA (नागरिकता कानून) आंदोलन में मारे गए 17 वर्षीय छात्र सैम स्टैफोर्ड के घर भी जाएंगे. कृषक मुक्ति संग्राम समिति और रायजर दल के कार्यालयों का दौरा करेंगे. चुनाव में उन्हें चुनने के लिए  शिवसागर जाकर  लोगों को धन्यवाद भी देंगे.

CAA के विरोध पर भेजे गए थे जेल

अखिल गोगोई को नागरिकता कानून (CAA) विरोधी आंदोलन में शामिल होने पर 12 दिसंबर, 2020 को जोरहाट से गिरफ़्तार किया गया था. दिसंबर 2019 में असम में CAA के खिलाफ कई बड़े आंदोलन हुए थे. इस दौरान हिंसा भी हुई. असम के सिबसागर, डिब्रूगढ़, गौरीसागर, टीओक, जोरहाट थानों में गोगोई के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए. इनमें से दो मामले जो डिब्रूगढ़ जिले के चबुआ पुलिस स्टेशन और गुवाहाटी के चांदमारी पुलिस स्टेशन में दर्ज़ हुए थे, वो NIA को सौंपे गए थे. इन दोनों मामलों में अखिल के खिलाफ राजद्रोह का आरोप लगाया गया. UAPA की धाराओं में भी केस दर्ज किया गया. उन पर प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) का ओवरग्राउंड वर्कर होने का भी आरोप लगा. लेकिन आरोप अदालत में ठहर नहीं पाए. वो केसों में बरी होने लगे. चबुआ वाले मामले में भी वह पिछले महीने बरी हो गए थे. इसके बाद उनके खिलाफ UAPA और राजद्रोह का एक ही मामला बचा था. अब इसमें भी उन्हें बरी कर दिया गया है.

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पुलिस हिरासत में अखिल गोगोई. फ़ाइल फ़ोटो

साहित्य पढ़ते-पढ़ते आंदोलनकारी बने

अखिल गोगोई असम के जोरहाट इलाके से आते हैं. 1 मार्च 1976 को यहीं उनका जन्म हुआ. लेकिन उनका सार्वजनिक जीवन शुरू होता है 1993 से, जब वे गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य पढ़ने पहुंचे. जल्दी ही वे कॉटन कॉलेज की स्टूडेंट मैगजीन के संपादक बन गए. साथ ही स्टूडेंट पॉलिटिक्स में भी सक्रिय हो गए. 2009 से गोगोई ने असम और अरुणाचल प्रदेश के संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का नेतृत्व किया. उनके संगठन कृषक मुक्ति संग्राम समिति ने NHPC के एक मेगा हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट के तहत सुबनसिरी के बांध के चल रहे निर्माण को रोकने के लिए बड़ा आंदोलन किया था.

अन्ना आंदोलन से नाता

शताब्दी का पहला दशक खत्म होते-होते अखिल गोगोई असम में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का एक जाना पहचाना चेहरा बन चुके थे. लेकिन उसी दौर में दिल्ली में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का शंखनाद हुआ. इंडिया अगेंस्ट करप्शन नामक एक संगठन के बैनर तले. अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, अंजलि दमनिया– ये सब चर्चित नाम इसी संगठन से जुड़े थे. अखिल गोगोई भी इससे जुड़ गए. उसके बाद अन्ना हजारे को चेहरा बनाकर दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू हुआ. लोकपाल विधेयक पारित कराने की मांग को लेकर अन्ना हजारे का अनशन हुआ. सरकार से आश्वासन मिलने के बाद अनशन खत्म भी हो गया. लेकिन इस पूरे आंदोलन के दरम्यान इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कुछ चेहरे, खासकर अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गए. इन लोगों ने आम आदमी पार्टी के नाम से अपनी पार्टी बनाई और राजनीति में उतरने का फैसला किया. इसी मुद्दे पर अखिल गोगोई का इन सबसे मतभेद हो गया, क्योंकि अखिल गोगोई राजनीति में जाने के खिलाफ थे. इसके बाद अखिल गोगोई ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन को टाटा बाय-बाय कह दिया.


असम चुनाव 2021: BJP के खिलाफ रायजोर दल के अखिल गोगोई को शिबसागर से कितने वोट मिले?

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