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मोदी सरकार ने ये बदलाव कर दिए तो सिर्फ शक पर किसी को आतंकी मान लिया जाएगा?

जब देश में कोई आतंकी घटना होती है, या ऐसी आशंका ही होती है तो जांच एजेंसियां अपना काम करती हैं. छापेमारी की जाती है, और कई बार लोगों को गिरफ्तार किया जाता है. गिरफ्तार लोगों पर चलता है मुक़दमा. कई बार लोग दोषमुक्त हो जाते हैं और कई बार दोषी साबित हो जाते हैं. लेकिन तरीका ये है कि गिरफ्तार लोगों को दोष सिद्ध या दोष मुक्त होने तक “आरोपी” कहा जाता है. जब तक वे गिरफ्तार नहीं होते हैं, न ही उन पर कोई आरोप लगा होता है तो उन्हें “संदिग्ध” कहा जाता है. और जब दोष सिद्ध हो जाता है तो उसे “दोषी”, “हत्यारा” या “आतंकी” जैसे विशेषणों से बुलाया जाता है.

सीधे तरीके से बात करें तो आरोप न लगे तो “संदिग्ध”, आरोप लगे तो “आरोपी”, और आरोप सिद्ध हो जाये तो “दोषी”. ये कानून है, इसलिए ये तरीका है. अब कानून बदल रहा. बदले कानून में अदालत का इंतज़ार नहीं होगा. सरकार कोशिश में है कि आतंक से जुड़े केसों में “संदिग्ध” को सीधे-सीधे “आतंकी” घोषित कर दिया जाए.

जी हां. सोमवार यानी 24 जून की हुई कैबिनेट की बैठक में राष्ट्रीय जांच एजेंसी या नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी एक्ट यानी NIA एक्ट और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट यानी UAPA में दो संशोधनों के प्रस्ताव पास किये गए. ये संशोधन अब संसद में आएंगे. चर्चा, जिरह या वोटिंग के बाद अगर ये दोनों सदनों से पास हो गए तो क्या होगा? अभी तक जितनी भी खबरें इस मुद्दे पर बाहर आ रही हैं या हम इन बदलावों को समझने की कोशिश करें, तो ये समझ आता है कि NIA को किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को आतंकी करार देने का हक मिल जाएगा. और ऐसा करने के लिए बस संदेह की ही ज़रुरत है, आरोप सिद्ध होने की कोई ज़रुरत नहीं है. इसके पहले सिर्फ संगठनों को ही सीधे “आतंकी” कहा जा सकता था.

इस लिस्ट में दूसरा संशोधन साइबर क्राइम और मानव तस्करी के मामलों से जुड़ा है. वह ये कि NIA अब इन दो क्षेत्रों के भी मामलों की तफ्तीश कर सकेगी. अब तक NIA महज़ आतंक से जुड़े केसों की ही जांच करती थी. सदन के मौजूदा सत्र में संशोधन का मसविदा संसद में भेजा जाएगा. जिस पर बहुमत के बाद संशोधन प्रभाव में आ जाएगा.

इसके अलावा कुछ और बिंदु संशोधन के दायरे में लाए गए हैं. ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के मुताबिक़, NIA अब पुलिस महानिदेशक को सूचित किये बिना या अनुमति लिए बिना भी छापेमारी कर सकती है. साथ ही साथ, NIA भारत से बाहर भी जांच करने के लिए जा सकती है, बशर्ते उस मामले में कोई भारतीय नागरिक संलिप्त हो.

संदिग्धों को सीधे आतंकी घोषित करने के पीछे अभी जो कारण सामने आ रहे हैं, उनके बारे में कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा ताकि संदिग्धों की फंडिंग रोकी जा सके. साथ ही साथ, उनके यात्रा करने पर प्रतिबन्ध लगाया जा सके.

इसके पहले तक किसी भी मामले में संदिग्धों की गिरफ्तारी के बाद अदालतों में केस चलते थे. केस चलने के बाद यह तय होता था कि संदिग्ध को दोषी या आतंकी माना जाए या नहीं. कई बारे ऐसे मामलों में संदिग्ध और आरोपी दोषमुक्त होकर जेलों से रिहा हुए हैं, वो भी कई सालों की सज़ा काटने के बाद.

लेकिन नए संशोधन के बाद ऐसा होता नहीं दिख रहा है. बहुत हद तक संभव है कि संदिग्धों को इस घटना के बाद ज्यादा सख्ती का सामना करना पड़ेगा. साथ ही साथ, न्याय पाने की प्रक्रिया और भी जटिल हो सकती है, क्योंकि जांच एजेंसियां पहले ही संदिग्ध को आतंकी घोषित कर चुकी होती हैं.

NIA क्या है?

NIA का गठन साल 2008 के मुंबई हमलों के बाद किया गया था. NIA गठित करने के पीछे सरकार का उद्देश्य था कि प्रमुख रूप से आतंकरोधी जांच दस्ते का गठन हो. साथ ही विशेष NIA अदालतों का भी गठन किया गया. ताकि NIA से जुड़े मामलों का तेज़ी से निबटारा किया जा सके.

दिल्ली के मुख्यालय के अलावा देश में हैदराबाद, गुवाहाटी, कोच्ची, मुंबई, लखनऊ, कोलकाता, रायपुर और जम्मू में NIA के दफ्तर हैं. साल 2017 से योगेश चंद्र मोदी, NIA के महानिदेशक हैं. और साल 2017 से ही NIA एक्ट और UAPA में संशोधन की बात चल रही थी, जिससे NIA को और ताकत मिल सके.

इस कानून संशोधन के बारे में ‘दी लल्लनटॉप’ ने गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और NIA से बात करने की कोशिश की, लेकिन इस पर कोई अधिकारी जवाब देने के लिए नहीं तैयार हुआ. NIA ने कहा कि इस बारे में कॉमेन्ट करने के लिए उनके पास अभी कुछ नहीं है.

 


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