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वीसी के खिलाफ खबर छपी और जेएनयू से अखबार के पन्ने ही गायब हो गए!

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आपके खाने पर प्रशासन की नज़र है, ये बात आप शायद पहले से जानते होंगे. आपके डेटा, बायोमेट्रिक, व्यक्तिगत जानकारी और हज़ारों तरह की जानकारियों पर उसकी नज़र है ये सच है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आप क्या पढ़ रहे हैं इस पर भी प्रशासन नज़र रख रहा है? एक मामला सामने आया है और अपने आप में बहुत हैरान कर देने वाला है. दरअसल मामला दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का है.

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

तो हुआ ये कि इंडियन एक्सप्रेस ने 19 जुलाई को अपने फ्रंट पेज पर एक स्टोरी छापी. जिसमें हैदराबाद की एक फर्म OMICS के बारे में बताया जो इंटरनेशनल कांफ्रेंस आयोजित कराने का दावा करती है. इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ संपादक श्यामलाल यादव जी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कैसे ये फर्म पैसे लेकर पेपर पब्लिश करवाती है. जिसका इस्तेमाल छात्र इंटरव्यू में अतिरिक्त नंबर लेने या सीवी को बेहतर बनाने के लिए करते हैं. पीएचडी छात्रों के लिए तो थीसिस जमा कराने से पहले यूजीसी से मान्यता प्राप्त जर्नल्स में 2 पेपर पब्लिश कराना जरूरी है. नहीं तो सालों की मेहनत मिट्टी में मिल सकती है. लेकिन हर जगह कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें मेहनत करना अच्छा नहीं लगता. उन्हें कोई ना कोई शॉर्टकट चाहिए होता है. ये उन्ही लोगों की कहानी है जिनकी वजह से जेएनयू एक बार फिर चर्चा में आ गया है.

इसी रिपोर्ट के कारण अख़बार के पेज निकाल लिए गये थे.
इसी रिपोर्ट के कारण अख़बार के पेज निकाल लिए गये थे.

दरअसल जेएनयू के वाइस चांसलर जगदीश मामीडाला ऐसे ही एक जर्नल, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में सह लेखक हैं. जगदीश मामीडाला के अनुसार उनके निर्देशन में पीएचडी करने वाले एक छात्र दवित अब्दी ने भी ऐसे ही एक जर्नल द्वारा आयोजित कांफ्रेंस में अपनी प्रेजेंटेशन दी. ये बात सामान्य हो सकती है, लेकिन जो नॉर्मल नहीं है वो ये कि पूरी यूनिवर्सिटी में वितरित इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के बीच के वो पेज गायब थे जिनपर ये रिपोर्ट छपी थी (पेज संख्या है 9 से 12). शायद इसलिए कि छात्र अपने वाइस चांसलर द्वारा किए गए घपले की जानकारी ना रख सकें. लेकिन वाइस चांसलर साहब शायद भूल गए कि ज़माना डिजिटल हो चुका है. सबने इसे पढ़ा और खूब फैलाया भी.

जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष मोहित पांडे ने हमें बताया कि किसी भी रिसर्च स्कॉलर द्वारा लिखी गई कॉपी में को-ऑथर (सह-लेखक) होने का श्रेय लेने में उनके गाइड हमेशा आगे रहते हैं क्योंकि ये उनके सीवी को भी बेहतर बनता है. मोहित का कहना है कि ‘अखबारों को सेंसर किया जाने का यह पहला मामला है क्योंकि यह सीधे वाइस चांसलर की मंशा पर सवाल उठा रहा है. छात्रसंघ इसे अपने तरीके से भी डील करेगा, शिक्षा मंत्रालय को लेटर लिखें जाएंगे. लेकिन छात्रों से अख़बार पढ़ने का हक छीना जाना असंवैधानिक है.’

श्यामलाल यादव जी, जिन्होंने ये स्टोरी की है, उनका कहना है कि अख़बार के पेज गायब होने की बात सामान्य नहीं है. लेकिन इसका जल्द ही संज्ञान लिया जाएगा. अख़बार का ऐसी घटना के बाद, सब पता होते हुए भी चुप्पी साधना कुछ इशारा तो नहीं कर रहा है.

हमने जेएनयू के लायब्रेरियन से बात की लेकिन उन्होंने इस सवाल को टालना चाहा. 


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