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सड़क पर मजदूरों संग खाना खाने वाले अर्थशास्त्री ने सरकार को कमाल का फॉर्मूला सुझाया है

कोरोना वायरस के चलते देश में 15 अप्रैल से 3 मई तक, दूसरी बार लॉकडाउन किया गया है. इसके बीच 14 अप्रैल को मुंबई, सूरत जैसे शहरों में मजदूर घर जाने को सड़कों पर उतर आए. लेकिन पुलिस ने बल-प्रयोग कर इन्हें खदेड़ दिया. इस बारे में मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने चिंता जताई है. उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को देश में सभी लोगों को एक साल तक राशन देना चाहिए. उनका कहना है कि सरकार को अनाज के भंडार खोल देने चाहिए, जिससे कोई भूखा न रहे.

कौन हैं ज्यां द्रेज़

आप सोच रहे होंगे कि ज्यां द्रेज़ कौन हैं? तो बता दें कि इनका जन्म बेल्जियम में हुआ था. लेकिन भारत को ही इन्होंने अपना घरबार बना लिया. यूपीए शासनकाल के दौरान ये नेशनल एडवाइजरी कमिटी के मेंबर थे. कांग्रेस सरकार की जो सबसे महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा की ड्रॉफ्टिंग इसी शख्स ने की थी. देश में अब तक के महत्वपूर्ण कानूनों में से एक माने जाने वाले आरटीआई कानून को लागू करवाने में भी ज्यां द्रेज की भूमिका रही है. देश-दुनिया के अच्छे अर्थशास्त्रियों में गिने जाते हैं.

वे भारत में भूख, महिला मुद्दे, बच्चों का स्वास्थ्य, शिक्षा और स्त्री-पुरुष के अधिकारों की समानता के लिए काम कर रहे हैं.साल 2017 में इनकी एक तस्वीर वायरल हुई थी. इसमें वे आम लोगों के साथ सड़क पर बैठकर खाना खा रहे थे.

सितंबर 2017 में ज्यां द्रेज़ की एक तस्वीर काफी सुर्खियों में रही थी. इसमें वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने में शामिल लोगों के साथ सड़क पर खाना खाते हुए दिखे थे. (फोटो क्रेडिट: दीपक यात्री, ईश्वर)
सितंबर 2017 में ज्यां द्रेज़ की एक तस्वीर काफी सुर्खियों में रही थी. इसमें वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने में शामिल लोगों के साथ सड़क पर खाना खाते हुए दिखे थे. (फोटो क्रेडिट: दीपक यात्री, ईश्वर)

‘मजदूरों के साथ बुरा बर्ताव किया गया’

‘इंडिया टुडे’ से बातचीत में द्रेज़ ने कहा कि कोरोना वायरस के संकट में माइग्रेंट वर्कर्स, यानी दूसरे राज्यों से आए मजदूरों के साथ बुरा बर्ताव किया गया है. उन्होंने कहा कि मजदूरों के लिए काफी-कुछ करने की जरूरत है. उन्हें खाना, रहने को जगह दी जानी चाहिए. उनका खयाल रखने की जरूरत है. हो सके तो उन्हें सम्मान के साथ घर भी भेजा जाना चाहिए.

द्रेज़ ने कहा-

सरकार की ओर से जो राहत पैकैज जारी किया गया, उसमें मजदूरों के लिए कुछ नहीं था. अभी जो हो रहा है, वह इसी वजह से हो रहा है. एक बात यह भी है कि मजदूर टीवी पर दिख रहे हैं, तो उनकी समस्याएं भी नज़र आ रही हैं. लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो मजदूरों की तरह ही परेशान होंगे. लेकिन हम उन्हें देख नहीं पा रहे, क्योंकि ये टीवी पर नहीं हैं. इनमें से एक हैं- बिना राशन कार्ड वाले गरीब परिवार, और दूसरे हैं- बुजुर्ग लोग.

उन्होंने कहा कि  बुजुर्गों को कोरोना का खतरा ज्यादा है. संकट में हमेशा बच्चों और जवानों को बचाने पर ध्यान दिया जाता है. इसकी वाज़िब वज़हें भी हैं. लेकिन बुजुर्गों की उपेक्षा की जाती है. राहत पैकेज में भी बुजुर्गों के लिए कुछ नहीं है. पेंशन के लिए सरकार ने केवल 3000 करोड़ रुपए दिए हैं.


‘राशन कार्ड वालों को डबल राशन अच्छा पर…’

द्रेज़ ने कहा कि देश में लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. भूखे हैं. उनके लिए काम जरूरी है. तभी वे पेट भर पाएंगे. उन्होंने कहा कि जिनके पास राशन कार्ड हैं, उन्हें सरकार ने डबल राशन देने का ऐलान किया है. लेकिन जिनके पास नहीं उनके लिए कुछ नहीं किया. ऐसे में आप उनकी जगह खुद को रखकर देखिए. वे देख रहे हैं कि उनके पड़ोसियों को डबल राशन मिल रहा है, पर उन्हें नहीं. यह अन्याय है.

दिल्ली से उत्तर प्रदेश में अपने घर को लौटता हुआ एक माइग्रेंट वर्कर और उसका परिवार. File Photo - PTI.
दिल्ली से उत्तर प्रदेश में अपने घर को लौटता हुआ एक माइग्रेंट वर्कर और उसका परिवार. File Photo – PTI.

‘सरकार के पास काफी अनाज पड़ा है’

उऩ्होंने कहा कि बिना राशन कार्ड वालों के लिए भी कुछ करना चाहिए. सौभाग्य से देश के पास काफी अनाज है. अप्रैल में फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) के पास 77 लाख टन अनाज का भंडार है. साथ में 21 लाख टन का बफर स्टॉक है. कुछ ही दिनों में रबी की फसल आने वाली है. इससे और अनाज आ जाएगा.

ज्यां द्रेज़ ने कहा-

जिन परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है, सरकार को उन्हें इमरजेंसी राशन कार्ड देकर मदद करनी चाहिए. ये राशन कार्ड छह महीने से एक साल तक के लिए दिए जाए. गांवों और शहर की झुग्गियों में रहने वाले सभी लोगों को एक साल तक पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम यानी पीडीएस की सुविधा दी जाए, जिससे की कोई भूखा न रहें. सभी को डबल राशन देना चाहिए. यह हो सकता है. इससे कोई भूखा नहीं रहेगा. इससे केवल 20 लाख टन राशन खर्च होगा, जो कि अभी सरकार के पास मौजूद राशन का छोटा-सा हिस्सा है.

ज्या द्रेज़ ने माना कि लॉकडाउन के चलते ज्यादा मार शहरी गरीबों पर पड़ी है. उन्होंने कहा कि पहले ऐसा नहीं था. वे कुछ भी करके पेट पाल लेते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. इसलिए राशन को यूनिवर्सल करने की बात कही है. साथ ही सरकार को ऐसे लोगों के खातों में पैसे भी डालने चाहिए.

मुंबई में 14 अप्रैल को मजदूरों की भीड़ घर जाने को रेलवे स्टेशन के पास जमा हो गई. फोटो: इंडिया टुडे
मुंबई में 14 अप्रैल को मजदूरों की भीड़ घर जाने को रेलवे स्टेशन के पास जमा हो गई. फोटो: इंडिया टुडे

गांव लौट चुके मजदूरों का क्या होगा?

ज्यां द्रेज़ ने मजदूरों से जुड़ी एक बड़ी परेशानी भी बताई. कहा कि गांवों में रह रहे छोटे किसान और मजदूरों की आर्थिक हालत पर बुरा असर पड़ रहा है. झारखंड, बिहार जैसे राज्यों में काफी मजदूर हो गए हैं. जैसा बर्ताव इनके साथ शहरों में हुआ, उसे देखकर लगता नहीं कि वे वापस बड़े शहरों में जाने की जल्दी में हैं. इसलिए वे जहां हैं, वहीं रहेंगे. वे वहीं काम तलाशेंगे, लेकिन वहां पर काम नहीं है.

उन्होंने कहा-

लॉकडाउन लंबा चलने से सामाजिक अशांति बढ़ सकती है. मैंने लॉकडाउन शुरू होने के समय ऐसी आशंका जताई थी. ऐसी कई घटनाएं सामने आई भी हैं. जैसे राजस्थान में खाने के सामान को लूटा गया. सूरत और महाराष्ट्र में मजदूरों ने हंगामा किया. लोग घरों से दूर हैं, उनमें डर है. वे पुलिस की मार झेल रहे हैं. ऐसे में आज नहीं, तो कल कुछ लोग हंगामा कर सकते हैं. आम तौर पर भारत में देखा गया कि विरोध आसानी से होता नहीं है. क्योंकि लोग जानते हैं कि कार्रवाई काफी तेज और बर्बर होती है. मेरा मानना है कि हालात ज्यादा खराब नहीं होंगे. लेकिन फिर भी दबाव बढ़ रहा है. लोगों का संयम टूट सकता है.

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