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35,000 किसान और आदिवासी पैदल नासिक से मुंबई क्यों पहुंचे हैं?

अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर तले हज़ारों किसान और आदिवासी मुंबई पहुंच गए हैं. ये लोग महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार से संपूर्ण कर्ज़ माफी और आदिवासियों के लिए ज़मीन के पट्टे मांग रहे हैं.

2017 का जून महीना. महाराष्ट्र भर के किसान (खासकर मारवाड़ा के) सुबह उठते थे, अपनी गायों का दूध निकालते थे और केतलियां लेकर पास के शहर जाते थे जहां इस दूध के ग्राहक होते थे. लेकिन केतलियों का दूध ग्राहकों के बर्तनों में जाने के बजाय चौराहों पर बहा दिया जाता था. लगातार कई दिन अपना खून-पसीना सड़कों पर बहाने वाले ये किसान आज फिर सड़क पर हैं. नासिक से चलकर मुंबई पहुंचे हैं. पैदल. क्योंकि सरकार ने तब इनसे जो वादा किया था, वो पूरा नहीं किया. अब सरकार के पास किसानों से मिलने का टाइम नहीं है. तो किसान खुद सरकार के पास जा रहे हैं. इस बार उनके साथ राज्य के आदिवासी भी हैं.

मराठवाड़ा से लगभग 35000 किसान-आदिवासी अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर तले सोमवार (12 मार्च, 2018) से महाराष्ट्र विधानसभा घेरने वाले हैं. ये सब मुंबई में सायन के के.जे. सोमैया मैदान में जुटेंगे. तब तक, जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं.

क्या हुआ था जून 2017 में?

मराठवाड़ा के किसान पिछले कई सालों से लगातार सूखा झेल रहे थे. रही सही कसर बढ़ते कर्ज़ ने पूरी कर दी थी. इलाके में लगातार किसान आत्महत्याएं हो रही थीं. इससे आजिज आकर किसान क्रांति मोर्चा के बैनर तले एक अराजनीतिक आंदोलन मराठवाड़ा में शुरू हुआ. किसान मंडियां बंद कर दी गईं. दूध की सप्लाई रोक दी गई. सब्ज़ियों की भी. तब के हालात तफसील से जानने के लिए यहां क्लिक करें.

किसानों ने जो मांगे सरकार के सामने रखी थीं, उनमें से कुछ ये थीं –

#1. किसानों का कर्ज़ बिना शर्त माफ किया जाए. उनकी ज़मीन से जुड़े 7/12 दस्तावेज़ पर से सारी देनदारियां हटाई जाएं.

#2. 60 साल से ऊपर के किसानों के लिए पेंशन स्कीम लाई जाए.

#3. दूध का दाम कम से कम 50 रुपए लीटर किया जाए.

#4. किसानों को बिना ब्याज़ कर्ज़ दिया जाए.

#5. किसानों के मुद्दों पर सलाह देने के लिए बनाई गई स्वामिनाथन कमिटी की सिफारिशें मान ली जाएं.

देवेंद्र फडणवीस. लगातार किसानों के निशाने पर.
देवेंद्र फडणवीस. लगातार किसानों के निशाने पर. (फोटोःपीटीआई)

तब महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार आखिर किसानों के आगे झुकी थी और ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकरी सम्मान योजना’ की घोषणा की थी. इसके तहत 34,020 करोड़ की कर्ज़-माफी का ऐलान किया गया था. तब इस रकम को ऐतिहासिक बताया गया था. इससे 89 लाख किसानों को फायदा पहुंचना था.

तो बात बिगड़ कहां गई?

कर्ज-माफी की रकम बहुत बड़ी थी और केंद्र ने इसमें हाथ बंटाने से मना कर दिया था. तो महाराष्ट्र सरकार ने कर्ज़-माफी का ऐलान शर्तें लगाकर किया. किसानों की तीन कैटेगरी बनाई गईं –

#1. जिनका पूरा कर्ज माफ होना था.

#2. जिन्हें इंसेंटिव मिलना था.

#3. जिन्हें वन-टाइम सेटलमेंट (कुछ रकम देकर पूरे कर्ज़ की माफी) मिलना था.

इसके नतीजे में मार्च 2018 तक 13,782 करोड़ ही जारी किए जा सके और 89 लाख की बजाय 35.68 लाख किसानों तक ही फायदा पहुंच पाया.

मराठवाड़ा में पहले लगातार सूखा पड़ा, फिर ज़्यादा बारिश हो गई. (फोटोःपीटीआई)
मराठवाड़ा में पहले लगातार सूखा पड़ा, फिर ज़्यादा बारिश हो गई. (फोटोःपीटीआई)

तिस पर सूखे से परेशान मराठवाड़ा में पिछले साल मानसून ज़रूरत से कहीं अधिक बरसा. किसान एक और साल निराश हुए. 2017 में ठंड ढंग से पड़ी नहीं. तो मराठवाड़ा भीषण गर्मी के एक और दौर की तरफ बढ़ रहा है. इसलिए किसानों का धीरज जवाब दे गया है और वो महाराष्ट्र विधानसभा घेरने मुंबई पहुंच गए हैं.

इस बार क्या कुछ मांगें हैं किसानों की?

आंदोलन सरकार की वादाखिलाफी के नतीजे में शुरू हुआ है. इसलिए प्रमुख मांगें कमोबेश वही हैं –

#1. किसानों के लिए पूरी कर्ज़-माफी.

#2. स्वामिनाथन कमीशन की सिफारिशें मान ली जाएं.

#3. किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान हो.

स्वामिनाथन कमीशन की सिफारिशें जानने के लिए यहां क्लिक करें.

पिछली बार किसानों ने दूध बहाकर उसकी सप्लाई रोकी थी, इस बार खुद मुंबई जा रहे हैं. (फोटोःपीटीआई)
पिछली बार किसानों ने दूध बहाकर उसकी सप्लाई रोकी थी, इस बार खुद मुंबई जा रहे हैं. (फोटोःपीटीआई)

इस बार का आंदोलन पिछले साल से कैसे अलग है?

पिछली बार आंदोलन की बागडोर किसी राजनैतिक दल के हाथ में नहीं थी. किसान क्रांति मोर्चा आंदोलन का अगुआ था. ये कई किसान गुटों का एक गठबंधन था. 3 अप्रैल 2017 को इसकी बैठक अहमदनगर के पुणतांबा में हुई थी. जिसमें 37 किसान संगठन शामिल हुए थे. इस मीटिंग में तय किया गया था कि किसानों की मांगें न मानी गईं तो महाराष्ट्र के बड़े शहरों को दूध और सब्ज़ियों की सप्लाई रोक दी जाए. मोर्चे का ज़ोर नासिक और अहमदनगर में ज़्यादा है. यही वो दो ज़िले हैं जहां से मुंबई को दूध और सब्ज़ी सप्लाई होती है. तब किसानों की योजना सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुंबई की सप्लाई रोकने की थी. लेकिन आंदोलन वहां तक पहुंचा नहीं, समझौता हो गया.

इस बार के आंदोलन की अगुआ अखिल भारतीय किसान सभा है. ये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी – मार्कस्वादी (CPM) का किसान मोर्चा है. इसके अलावा महाराष्ट्र में भाजपा के अलावा लगभग सभी दल आंदोलन के पक्ष में हैं. CPM के अलावा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS), लोक भारती, आम आदमी पार्टी (AAP) आंदोलन के समर्थन में हैं. कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के भी आज आंदोलन में शामिल हो जाने की संभावना है.

शिवसेना महाराष्ट्र सरकार में जूनियर पार्टनर है, लेकिन इस आंदोलन में किसानों के साथ है. (फोटोःपीटीआई)
शिवसेना महाराष्ट्र सरकार में जूनियर पार्टनर है, लेकिन इस आंदोलन में किसानों के साथ है. (फोटोःपीटीआई)

एक और बात है. पिछले आंदोलन में पूरा ज़ोर किसानों की मांगों पर था. इस बार के आंदोलन में आदिवासियों के लिए भी हक मांगे गए हैं. आंदोलन की प्रमुख मागों में से एक फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006 को पूरी तरह लागू करना भी है. इसके तहत आदिवासियों को ज़ंगल में ज़मीन के पट्टे मिलने हैं. इसलिए 35000 की भीड़ में बड़ी संख्या में आदिवासी भी हैं.

180 किलोमीटर पैदल चले, अंधेरे में नदी किनारे पड़ाव किया

चूंकि पिछले आंदोलन में मुंबई की सप्लाई रोकने या मुंबई कूच जैसी कवायद नहीं हुई थी, इस बार के आंदोलन की शुरूआत ही नासिक से मुंबई तक के पैदल मार्च से हुई. 6 मार्च, 2018 को 10,000 के करीब किसान और आदिवासी नासिक से चले. 180 किलोमीटर के सफर का पहला पड़ाव हुआ निसिक-मुंबई हाइवे पर पड़ने वाले राजुर फाटा के पास. किसानों को सर्विस रोड पर रात गुज़ारने की इजाज़त नहीं मिली. तो किसानों ने रात वलदेवी नदी के किनारे एक प्लॉट पर घुप अंधेरे में गुज़ारी (बाद में पुलिस एक जनरेटर लाई जिससे कुछ मर्क्युरी लैंप जले). खुले आसमान के नीचे. फोन के टॉर्च की रोशनी में रात गुज़ारी. उसी में खाना खाया. लेकिन इस से टूट कर वापस नहीं लौटे. रात-भर कीर्तन किया और अगली सुबह आगे बढ़ गए.

मुंबई तक के रास्ते में लगने वाली रसद किसान अपने साथ ही लाए थे. कुछ पैसे भी रखे थे कि रास्ते में काम आ जाएं. 15-20 किलोमीटर चलने के बाद मोर्चा हर शाम पड़ाव करता था.

किसानों के इस बड़े मार्च की अगुआई 'हाशिए' पर ढकेल दिया गया लेफ्ट कर रहा है.
किसानों के इस बड़े मार्च की अगुआई ‘हाशिए’ पर ढकेल दिया गया लेफ्ट कर रहा है.

इस आंदोलन को लेकर ‘दी लल्लनटॉप’ ने अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अशोक ढवले से बात की. डॉ ढवले ही किसान मार्च में सबसे आगे चल रहे हैं. उन्होंने कहा,

”सरकार ने कर्ज माफी का ऐलान किया लेकिन पूरी तरह लागू नहीं किया. ये किसानों के साथ धोखा है. फिर भी सरकार का ध्यान बुलेट ट्रेन और समृद्धि हाइवे बनाने पर है. इसमें भी किसानों की ज़मीन जाएगी लेकिन उन्हें कोई फायदा नहीं पहुंचेगा. इसलिए अब हम विधानसभा घेरकर बैठेंगे. तब शायद सरकार हमें सुने. हमारी मांगें वही हैं जो पिछले साल थीं.”

अगर आपकी मांगें न मानी गईं तो?

”तो हम बैठे रहेंगे. जब तक मांगें न मानी जाएंगी, तब तक.”

महाराष्ट्र में भाजपा लगातार किसानों के गुस्से का शिकार बन रही है. राज्य में साल भर के भीतर ये दूसरा बड़ा किसान आंदोलन उठ खड़ा हुआ है. कहा ये भी जा रहा है कि किसानों के खराब मूड से डरकर ही सरकार भंडारा-गोंदिया सीट पर उपचुनाव नहीं कर रही. किसानों के खराब मूड का कितना डर सरकार को वाकई में है, ये मुंबई में 12 मार्च से मालूम चलने वाला है.


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किसानों की समस्याओं को समझने के लिए ये वीडियो देखेंः

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