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नहीं रहे 'आनंद' के गीत लिखने वाले योगेश, जिन्होंने कहा था- 'इंडस्ट्री ने मुझे भुला दिया'

‘ज़िंदगी, कैसी ये पहेली, कभी ये हंसाए कभी ये रुलाए’

‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन बदन चुराए…’

‘आनंद’ फिल्म में परदे पर ये गीत राजेश खन्ना के होंठो पर दिखतें हैं पर ये निकले थे योगेश की कलम से. पूरा नाम योगेश गौड़. शुक्रवार, 29 मई को उनका निधन हो गया है. 77 साल की उम्र में. वो कुछ बेहतरीन गीत पीछे छोड़ गए. 60 और 70 के दशक के कुछ यादगार गीत.

लता मंगेशकर ने श्रद्धांजलि दी

लता मंगेशकर ने उनके निधन की ख़बर सोशल मीडिया पर दी. लता मंगेशकर ने शोक जताते हुए लिखा,

‘मुझे अभी पता चला कि दिल को छूनेवाले गीत लिखने वाले कवि योगेश जी का आज स्वर्गवास हो गया है. ये सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ. योगेश जी के लिखे गीत मैंने गाए. योगेश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे. मैं उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पण करती हूं.’

इन फिल्मों में गीत लिखे

योगेश 19 मार्च, 1943 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में पैदा हुए थे. लता मंगेशकर ने उनके कई गीत गाए. योगेश ने ऋषिकेश मुखर्जी-बासु चटर्जी जैसे डायरेक्टर्स के साथ काम किया. योगेश को गीतकार के तौर पर पहला ब्रेक फिल्म सखी रॉबिन (1962) से मिला, जिसमें उन्होंने छह गीत लिखे. अमोल पालेकर-विद्या सिन्हा की फिल्में आई थीं- रजनीगंधा (1974) और छोटी सी बात (1976) इनमें भी योगेश ने गीत लिखे. इसके अलावा बातों बातों में (1979), मंज़िल (1979), प्रियतमा (1977) मंज़िलें और भी हैं (1974) और बेवफा सनम (1995) जैसी फिल्मों के गीत उन्होंने लिखे. टीवी सीरियल्स में भी लिखा. 2017 में संजय मिश्रा की फिल्म ‘अंग्रेज़ी में कहते हैं’ में उन्होंने काफी लम्बे समय बाद तीन गाने लिखे.

इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में योगेश कहते हैं,

‘जो देखता था, जो जिया था, वही लिखा है. मैंने अपने आस-पास के लोगों के बारे में लिखा. उनके बीच रहकर. दूर जाऊंगा तो कैसे लिखूंगा.’

17 साल की उम्र में मुंबई आए

योगेश के पिता लखनऊ में पीडब्ल्यूडी डिपार्टमेंट में इंजीनियर थे. पिता के निधन के बाद योगेश मुंबई आए. 17 साल की उम्र में. 12वीं पूरी करने के बाद. वो बताते हैं,

बैंक में सिर्फ 500 रुपए थे. बड़ा परिवार था. मुंबई में एक भतीजा था. व्रजेंद्र गौर. डायलॉग लिखता था. उसकी मदद से मैंने फिल्म इंडस्ट्री में काम पाने की कोशिश की. मुझे लगा कि फिल्म मेकिंग में कई डिपार्टमेंट होते हैं. 

लेकिन मुंबई में उनका टिकना कठिन था. वो एक दोस्त सत्यप्रकाश के साथ चरनी रोड के आर्य समाज मंदिर में रुके. उनका भतीजा आता था लेकिन उनसे कुछ खास मदद मिली नहीं. योगेश ने कहा कि उन्हें अंधेरी स्टेश से 45 मिनट की दूरी पर हमें एक झोपड़ी मिली. 12 रुपए महीने पर. बिजली-पानी नहीं था. एक कुआं था.

सलिल चौधरी और टर्निंग पॉइन्ट

योगेश ने बताया, ‘मुझे लगने लगा था मैं फिल्म लाइन के क़ाबिल नहीं हूं. कई तरह के काम किए. फिल्मों में एक्स्ट्रा की तरह काम किया.’ वो कहते हैं कि सत्य प्रकाश ने उन पर लिखने के लिए ज़ोर डाला. वो लोग एक चॉल में आ गए. यहां फिल्म से जुड़े कई लोग थे. यहां वो गुलशन बावरा से मिले, जिन्होंने उपकार फिल्म का ‘मेरे देश की धरती’ गाना लिखा था. गुलशन बावरा ने योगेश की लिखी चीजें सुनीं और उन्हें लोगों से मिलने को कहा. तब 1962 में योगेश को पहला ब्रेक मिला. फिल्म सखी रॉबिन में. छह गीतों के लिए 25 रुपए मिले. तब के हिसाब से काफी थे. मन्ना डे ने उनका लिखा गाना ‘तुम जो आ जाओ’ गाया, जो काफी हिट हुआ. योगेश कहते हैं कि धुन के हिसाब से वो हमेशा शब्द लिखते थे. इसके बाद वो सलिल चौधरी से मिले. लाइफ का टर्निंग पॉइंट. दोनों ने आनंद, सबसे बड़ा सुख, रजनीगंधा, छोटी सी बात में काम किया. लेकिन धीरे-धीरे योगेश पीछे छूटते चले गए. या उन्हें छोड़ दिया गया.

योगेश ने इंडियन एक्सप्रेस से ये दु:ख साझा करते हुए कहा था,

बरसों हो गए जब कोई मुझसे गाना लिखवाने के लिए आया हो. 90 के दशक के आखिर में कुछ फिल्मों में गाने लिखे लेकिन वो फिल्में रिलीज़ नहीं हुई. मुझे लगता है इंडस्ट्री और लोग मुझे भूल गए.

उनके लिखे कुछ बेहतरीन गीत सुनते जाइए. उन्हें याद करते हुए.

1. ज़िंदगी कैसी है पहेली.

फिल्म: आनंद (1971)

2. कहीं दूर जब दिन ढल जाए.

फिल्म: आनंद (1971)

3. रजनीगंधा फूल तुम्हारे.

फिल्म: रजनीगंधा (1974)

4. रिमझिम गिरे सावन.

फिल्म: मंज़िल (1979)

5. ना जाने क्यों होता है ये.

फिल्म: छोटी सी बात (1976)

6. कई बार यूं भी देखा है.

फिल्म: रजनीगंधा (1974)

7. वफा ना रास आई.

फिल्म: बेवफा सनम (1995)

 

 

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