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क्या बीजेपी भारत को 'हिंदू राष्ट्र' घोषित कर देगी?"

गोआ में 14 जून से 150 से ज्यादा हिंदुत्वावादी संगठन का जुटान है. इस जुटान में भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने पर बातचीत होने जा रही है. तो क्या यह सम्मलेन बीजेपी के लिए वो काम कर पाएगा जो 1990 के दौर में बाबरी मस्जिद विवाद ने किया था? शायद यह दावा आपको फिलहाल मजकिया जान पड़े. 1986 में अगर कोई आदमी यह कहता कि राम मंदिर का ताला खोलना बहुत बड़ी भूल है. राजीव गांधी दिन भारत की राजनीति के हुलिए को बदल देगा तो उसकी बात को मजाक में लिया जाता.

इतिहास में दर्ज हैं कांग्रेस के पाप 

अयोध्या विवाद के लिए सिर्फ विश्व हिंदू परिषद या आरएसएस को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. 1985 के चुनाव में सिक्ख विरोधी लहर सवार होकर सत्ता में आए राजीव गांधी को राजनीति का यह तरीका भा गया. नवंबर 1989 में चुनाव के छह महीने पहले राजीव गांधी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर के शिलान्यास करने की इजाजत दे दी थी. इतना ही नहीं एक महीने बाद दिसंबर 1989 में उन्होंने अपने प्रचार अभियान की शुरुआत भी अयोध्या से की थी. उस चुनाव में बीजेपी नहीं बल्कि राजीव गांधी और कांग्रेस राम राज्य का वादा कर रहे थे.

यह बीजेपी का बहुत पुराना तरीका है

बीजेपी के लिए हिंदुत्व की राजनीति को साधना तलवार पर चलने जैसा है. बीजेपी एक ख़ास तरीके से इस काम को अंजाम देती है. वो कभी भी ऐसे मामलों में सामने अन्हीं आती. आरएसएस और उससे जुड़े दूसरे संगठन इस काम को अंजाम देते आए है. इस बार VHP और बीजेपी ने हिंदुत्व पर हो रहे इस जुटान से खुद को अलग कर लिया है.

इस जुटान की कमान फिलहाल ‘हिंदू जनजागृति समिति’ के हाथ में है. अपनी स्थापना के 11 साल बाद यह संगठन पहली बार 2013 में खबरों में आया. इस संगठन से जुड़े हुए वीरेन्द्र तावड़े को अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. जुटान में शामिल होने जा रहे 150 संगठनों में से ज्यादातर संगठन हाशिए के हैं. इनका प्रभाव क्षेत्र सिमित है और इनके बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं मिलती. अब इन संगठनों को हिंदू राष्ट्र का कोरस गाने का जिम्मा सौंपा गया है.

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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी

 

राम मंदिर आंदोलन के समय भी बीजेपी ने इसी रणनीति का सहारा लिया था. 1986 में बाबरी मस्जिद के ताले खोलने के बाद विश्व हिंदू परिषद को पूरे आंदोलन का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. 1964 में गोलवलकर के निर्देश पर बने संगठन का इससे पहले राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास प्रभाव नहीं हुआ करता था. बीजेपी ने हस्तक्षेप के लिए सही मौके का इंतजार किया. सितंबर 1990 में जा कर आडवानी की रथ यात्रा शुरू हुई और बीजेपी इस आंदोलन के राजनीतिक चहरे के तौर पर मैदान में आ गई. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया जाने को संतुलन साधने की कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए.

हिंदूवादी संगठन नया संविधान चाहते हैं

संविधान निर्माण के समय से हिंदूवादी राजनीति करने वाले धड़ों के बीच संविधान के प्रति गहरी नफरत का भाव रहा है. आरएसएस भारतीय संविधान की यह कह कर आलोचना करते आया है कि यह पश्चिमी देशों के संविधान से कॉपी किया गया है. दरअसल उनकी असली दिक्कत संविधान के सेक्युलर स्वरुप को लेकर है.

हिंदू जनजागृति समिति के प्रवक्ता रमेश शिंदे कहते हैं कि केंद्र में बीजेपी की तीन चौथाई बहुमत वाली सरकार है. भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने का यह सबसे बेहतर मौका है.

“संविधान की प्रस्तावना में से सोशलिस्ट और सेक्युलर शब्दों को हटाना इस दिशा में पहला कदम है.”

इस संगठन का ध्येय “धर्म आधारित हिंदू राष्ट्र की स्थपाना” है. इस सम्मेलन का मुख्य मुद्दे, भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना, पूरे देश में गौ हत्या और बीफ पर पाबंदी, कश्मीरी हिंदुओं का पुनर्वास आदी हैं. संगठन इस किस्म का सम्मेलन छठी बार आयोजित करने जा रहा है. इसमें भारत के अलावा बांग्लादेश,श्रीलंका और नेपाल के हिंदूवादी संगठनों के प्रतिनिधि भी इसमें भाग ले रहे हैं.

माधव सदाशिव गोलवलकर
माधव सदाशिव गोलवलकर

 

आरएसएस के विचारस्तंभ एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक “विचार नवनीत” में हिंदू राष्ट्र की वकालत में ढेर सारे तर्क पेश किए हैं. उन्होंने कम्युनिस्टों अरु मुसलामानों को देश का सबसे बड़ा शत्रु बताया है. यह किताब आज भी संघ और उसकी विचारधारा के बाइबिल के तौर पर देखी जाती है. इसके संघ से बीजेपी में आए प्रचारक भी सार्वजनिक मंचों पर “हिंदू राष्ट्र” के दावे करने से बचाते हैं. नई सरकार आने बाद से हिंदू राष्ट्र को तेजी से सार्वजानिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा रहा है. इसे खतरे घंटी के तौर पर देखा जाना चाहिए.


यह आर्टिकल DailyO के लिए अशोक सिंह ने लिखा है. दी लल्लनटॉप के विनय सुल्तान ने इसका अनुवाद किया है.

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