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कोविड-19: सरकार जो दवा बांट रही है, उसके बारे में अलग ही दावा किया जा रहा है!

कोविड-19 (Covid-19) के जो मरीज होम क्वारंटीन में हैं, उनके लिए 7 मई को सरकार की तरफ से दवा सामने रखी गई. ये दवाएं हैं- आयुष-64 और काबासुरा कुडिनीर. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की मौजूदगी में इन दवाओं को नेशनल लेवल पर सर्कुलेट करने और इसको लेकर जागरुकता पैदा करने के लिए अभियान शुरू किया गया.

PIB के मुताबिक – ये पॉली हर्बल औषधियां हैं. कोविड के एसिंप्टोमेटिक या हल्के इंफेक्शन वाले केसेज़ में कारगर हैं. इन्हें कोविड-19 के जारी इलाज के ‘सहायक’ के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.  PIB के स्टेटममेंट में ही ये बताया गया है कि आयुष-64 को 1980 में मलेरिया के इलाज के लिए डेवलप किया गया था और अब इसे कोविड-19 के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

क्या वाकई आयुष-64 इतनी कारगर है? मलेरिया के केसेज़ में इसका क्या ट्रैक रिकॉर्ड रहा था? इन सब सवालों पर एमडी डॉक्टर सी वरुण ट्विटर पर कुछ और दावा करते हैं, जो कि चिंताजनक है. उन्होंने ट्वीट किया –

“आयुष-64 एक पुराना फॉर्मूला है, जिसे मलेरिया के लिए इस्तेमाल किया गया था. लेकिन स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट के मुकाबले इसका कोई फायदा होता नहीं दिखा. 2014 में इसे कमर्शिलाइज़ करके डाबर को इसके अधिकार बेच दिए गए. और इसके बाद से बिना किसी वैज्ञानिक आधार के इसे जमकर प्रमोट किया जा रहा है.

अब सवाल कि इसे कोविड-19 के केस में क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है? जवाब आसान है. क्योंकि मंत्रियों को कुछ अता-पता नहीं है कि क्या करें. वो ऑक्सीजन बेड, वेंटिलेटर, कंसंट्रेटर जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा पाने में नाकाम रहे. तो अब क्या करें? एक काल्पनिक दवा को प्रमोट करो.”

डॉ वरुण आगे लिखते हैं कि मौजूदा प्रशासन में वैज्ञानिक समझ की कमी कहीं और जानें न ले ले.

जिस दवा को देश की सरकार एक महामारी के इलाज में सहायक के तौर पर प्रचारित कर रही है, बांटने का अभियान चला रही है, उसी को ‘बिना वैज्ञानिक प्रमाण’ वाली दवा बताता ये एक गंभीर और चिंताजनक दावा है. इसलिए हमने जानने की कोशिश की कि इस दावे में कितना दम है? आयुष-64 में कितना दम है?

दावे में कितना दम है?

आयुष-64 कोविड केसेज़ में कितनी कारगर होगी, ये जानने के लिए ज़रूरी था ये जानना कि ये मलेरिया में कितनी कारगर रही है.

Research Gate नाम की रिसर्च वेबसाइट्स है, तो तमाम शोध प्रकाशित करती है. इस पर एक स्टडी है कि आयुष-64 और क्लोरोक्विन में से कौन सी दवा मलेरिया के इलाज में ज़्यादा कारगर है. ये रिसर्च कहती है –

“मलेरिया के कुछ मरीजों को 5 से 7 दिन तक रोज दिन में 3 बार 1-1 ग्राम आयुष-64 दिया गया. कुछ अन्य मरीजों को 3 दिन में 1500 mg क्लोरोक्विन दिया गया. 28 दिन बाद रिज़ल्ट देखा गया कि क्लोरोक्विन लेने वाले सभी 41 मरीज़ पूरी तरह ठीक हो गए, जबकि आयुष-64 लेने वाले 47 में से 23 मरीज ठीक हुए. इस आधार पर कह सकते हैं कि क्लोरोक्विन, आयुष-64 से कहीं अधिक प्रभावकारी है.”

डॉ वरुण ने भी अपने ट्वीट्स के साथ Google Scholar नाम का एक रिसर्च पेपर शेयर किया है, जिसमें वही बातें लिखी हैं, जो Research Gate के शोध में लिखी हैं. इसके अलावा फैक्ट चेकिंग वेबसाइट Alt News ने भी 2019 में आयुष-64 पर एक फैक्ट चेक किया था, जिसमें साफ तौर पर लिखा है कि आयुष-64 को लेकर जो भी दावे किए जा रहे हैं, उन्हें सपोर्ट करता कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.


अब व्हाट्सऐप पर पता चलेगा कि बेड, ऑक्सीजन और दवा कहां मिलेगी

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