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सरकार ने 38 भारतीयों के ताबूत न खोलने के लिए क्यों कहा

2 अप्रैल को मोसुल से ताबूत आए. 2014 में जो 39 भारतीय लापता हुए थे, उनमें से 38 के अवशेष थे इनके अंदर. विदेश राज्य मंत्री वी. के. सिंह एक स्पेशल विमान में ये ताबूत लेकर अमृतसर पहुंचे. वहां से पटना. फिर कोलकाता. ताबूतों को उनके परिवार के सुपुर्द कर दिया गया. विमान के भारत पहुंचने से पहले ही एक बात मालूम चली. कि विदेश मंत्रालय ने उन भारतीयों के परिवारवालों को कुछ खास हिदायत दी है. कहा है कि ताबूत खोलकर न देखें. इस हिदायत पर कई सवाल उठ रहे हैं. कुछ लोगों ने इसे असंवेदशील बताया. कुछ ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए. इससे पहले भी एक बहस चल रही थी. कि सरकार को बहुत पहले से ही मालूम था कि ये सारे गुमशुदा भारतीय मारे जा चुके हैं. बावजूद इसके उसने इनके परिवारवालों को अंधेरे में रखा. उन्हें झूठी उम्मीद दी. अब ये ताबूत वाली अडवाइजरी और ये सवाल गुत्थमगुत्था हो गए हैं.

ये परमजीत कौर हैं. इनके हाथ में भाई कुलजीत सिंह की फोटो है. कुलजीत भी उन 39 भारतीयों में शामिल थे. बचकर भाग आए एक शख्स मसीह के मुताबिक, ISIS ने इन सबों को जून 2014 में ही मार डाला था.
ये परमजीत कौर हैं. इनके हाथ में भाई कुलजीत सिंह की फोटो है. कुलजीत भी उन 39 भारतीयों में शामिल थे. बचकर भाग आए एक शख्स मसीह के मुताबिक, ISIS ने इन सबों को जून 2014 में ही मार डाला था.

आदेश नहीं था, सलाह थी
हमने इस बारे में पंजाब पुलिस से बात की. अमृतसर के डेप्युटी कमिश्नर हैं कमल दीप सिंह सांघा. उन्होंने हमें सरकारी निर्देश के बारे में बताया. MEA की तरफ से ताबूत न खोलने वाली जो बात कही गई थी, वो अनिवार्य नहीं थी. बस सुझाव था. इसकी वजह ये थी कि लाशों के अवशेष केमिकली ट्रीटेड थे. ये लोग कब मारे गए, कोई नहीं जानता. इन्हें लापता हुए चार साल हो गए थे. जुलाई 2017 में जब मोसुल को ISIS से आजाद कराया गया, उसके बाद इनकी तलाश शुरू हुई. एक पहाड़ के ऊपर बने सामूहिक कब्र से खोदकर इन्हें बाहर निकाला गया. इसके बाद भी इन अवशेषों को एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. डीएनए मैचिंग कराई गई. इस दौरान इन अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए केमिकल्स का इस्तेमाल किया गया था. फिर भारत लाने से पहले भी रासायनिक लेप वगैरह का इस्तेमाल किया गया. आशंका थी कि ताबूत खुलने पर परिवारवाले भावुक होंगे. रोएंगे. उनके शरीर में केमिकल लग सकता है और इससे उन्हें नुकसान पहुंच सकता है. स्वास्थ्य कारणों के मद्देनजर सरकार ने ताबूत न खोलने का सुझाव दिया था.

ये जून 2014 की तस्वीर है. लापता भारतीयों के परिवारवाले अपने-अपनों की फोटो थामे खड़े हैं. जब ISIS ने मोसुल पर कब्जा किया, तब ये 39 भारतीय वहां एक सरकार कंस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे थे. साढ़े तीन साल तक चली तलाश के बाद अब ये पक्का हो गया है कि ये सभी मारे जा चुके हैं.
ये जून 2014 की तस्वीर है. लापता भारतीयों के परिवारवाले अपने-अपनों की फोटो थामे खड़े हैं. जब ISIS ने मोसुल पर कब्जा किया, तब ये 39 भारतीय वहां एक सरकार कंस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे थे. इतनी लंबी तलाश के बाद जाकर मालूम हुआ कि वो सब मारे गए.

सरकार ने ताबूत न खोलने की कोई जबर्दस्ती नहीं की
डेप्युटी कमिश्नर कमल दीप सिंह सांघा के मुताबिक दूसरी बात थी भावनात्मक पहलू. इतने समय में लाश के नाम पर बस कंकाल और हड्डियां बची होंगी. परिवारवाले उन्हें देखेंगे, तो उन्हें तकलीफ होगी. किसी की तबीयत ज्यादा खराब भी हो सकती है. ये भी एक वजह थी कि उन्हें ताबूत न खोलने का सुझाव दिया गया. बाकी ये कहना कि सरकार की तरफ से ताबूत न खोलने की कोई जबर्दस्ती थी, गलत है. लाशों के अंतिम संस्कार के लिए प्रशासन की ओर से इंतजाम किए गए थे. अंतिम संस्कार के वक्त भी अधिकारी मौजूद थे. ताकि सबकुछ ठीक से निपट जाए और परिवारवालों को कोई दिक्कत न हो. सरकारी इंतजामों की तारीफ खुद पंजाब पुलिस और प्रशासन कर रहा है. ये अलग बात है कि वी के सिंह पंजाब द्वारा किए गए इंतजामों पर खुश नहीं थे. उन्होंने एक ट्वीट करके इसको जाहिर भी किया. ट्वीट में बिहार की तारीफ थी और पंजाब को उलाहना था.

कुछ को शिकायत है, कुछ शुक्रिया कह रहे हैं
कुछ परिवारवाले फिर भी आरोप लगा रहे हैं. इनमें से एक है गुरचरण सिंह का परिवार. गुरचरण के परिवार को ताबूत के अंदर एक प्लास्टिक बैग मिला. उसमें एक टोपी थी. परिवारवाले कहने लगे कि गुरचरण तो सिख थे. पगड़ी पहनते थे. उन्होंने कभी टोपी नहीं पहनी. फिर उनके शरीर पर टोपी कैसे मिली? परिवार का इल्जाम है कि उन्हें जो अवशेष दिए गए, वो गुरचरण के नहीं हैं. बाकी कई परिवार भारत सरकार, खासकर सुषमा स्वराज की तारीफ कर रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार की कोशिशों की वजह से ही उन्हें अवशेष मिल पाया है.


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