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इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट ने वो फैसला दिया है, जिसकी उम्मीद कम लोगों को थी

क्या जिस तरह से भारत का संविधान लोगों को जीने की आजादी देता है, उसी तरह से उन्हें मरने की आजादी है? ये एक ऐसा सवाल था, जिसपर सुप्रीम कोर्ट के अलावा सिविल सोसाइटी में भी पिछले कई सालों से चर्चा चली आ रही थी. अब इस सवाल का जवाब खुद सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया है. 9 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की खंडपीठ ने कहा है कि अगर कोई बीमार आदमी चाहता है कि वो अब और जिंदा न रहे, तो उसे मरने का पूरा अधिकार है.

Common cause

भारत का एक एनजीओ है कॉमन कॉज. इस एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी. एनजीओ ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है. इसी अनुच्छेद के तहत लोगों को मरने का भी अधिकार भी दिया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने मरने का अधिकार देते हुए कुछ दिशा निर्देश भी दिए. कोर्ट ने इस पूरे मामले की सुनवाई 11 अक्टूबर 2017 को पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था. 9 मार्च 2018 को कोर्ट ने कहा कि अगर किसी शख्स ने लिविंग बिल बनाया है, तो उसे ये फैसला करने का अधिकार होगा कि वह अपनी आखिरी सांस कब लेगा.

क्या होता है लिविंग बिल

लिविंग विल एक लिखित दस्तावेज होता है. इसे कोई भी शख्स बना सकता है. इसके तहत कोई शख्स इस बात को लिख सकता है कि अगर उसे कोई गंभीर बीमारी हो जाए और वो मरने जैसी हालत में हो तो उसके साथ कैसे इलाज किया जाए. इसके तहत कोई शख्स खुद को इलाज न देने को कह सकता है या फिर ये निर्देश दे सकता है कि उसके जीवन को वेंटिलेटर या आर्टिफिशियल सपोर्ट सिस्टम पर न लगाया जाए. इस स्थिति को पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छा मृत्यु) कहते हैं. ये लिविंग बिल किसी मैजिस्ट्रेट के सामने बनाया जाए, जिसके लिए दो स्वतंत्र गवाह भी हों.

सरकार ने किया था विरोध

aruna

कर्नाटक की रहने वाली अरुणा शानबाग मुंबई के एक अस्पताल में नर्स थी. वहां पर एक वॉर्ड बॉय ने अरुणा से रेप किया, जिसके बाद वो कोमा में चली गई. करीब 37 साल तक कोमा में रहने के बाद एक पत्रकार पिंकी वीरानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अरुणा के लिए इच्छामृत्यु की मांग की. 24 जनवरी 2011 को कोर्ट ने याचिका स्वीकार करने के बाद इसे एक मेडिकल बोर्ड को भेज दिया. कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा. इसके बाद सरकार की ओर से कहा गया कि लिविंग बिल को मंजूरी नहीं दी जा सकती है. इसके बाद कोर्ट ने पिंकी वीरानी की याचिका खारिज कर दी. सरकार ने कहा कि इस लिविंग बिल का दुरुपयोग किया जा सकता है, क्योंकि यहां बुजुर्गों की उपेक्षा होती है. ऐसे में बुजुर्गों से पल्ला छुड़ाने के लिए लोग लिविंग बिल बनवा सकते हैं.

2005 में दाखिल हुई याचिका पर आया फैसला

एनजीओ कॉमन कॉज ने 2005 में ही लिविंग बिल की बात उठाई थी. एनजीओ की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई. करीब 13 साल तक इस याचिका पर सुनवाई होती रही. अलग-अलग दलीलें पेश हुईं, जिसके बाद अक्टूबर 2017 में फैसला सुरक्षित रख लिया गया. अंतिम सुनवाई के दौरान भी सरकार की ओर से लिविंग बिल का विरोध किया गया था, लेकिन एनजीओ के वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि गंभी बीमारी से जूझ रहे लोगों को ‘लिविंग विल’ बनाने का हक होना चाहिए. इसके जरिए कोई भी आदमी ये बता सकता है कि जब उसके ठीक होने की उम्मीद न हो, तो उसे जबरन लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर न रखा जाए. सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने ये भी कहा था कि वो उस ऐक्टिव यूथेनेशिया की बात नहीं कर रहे हैं, जिसमें लाइलाज मरीज को इंजेक्शन देकर मारा जाता है.

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

जब 11 अक्टूबर 2017 को इस मामले पर फैसला सुरक्षित हुआ था, तो उस वक्त फैसला लेने वाली पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ ही जस्टिस एके. सिकरी, जस्टिस एएम. खानविलकर, जस्टिस डीवाई. चंद्रचूड और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे. 9 मार्च को फैसले के दौरान कोर्ट ने कहा कि पैसिव यूथेनेशिया और लिविंग विल राइट टू लाइफ का पार्ट है. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कुछ गाइडलाइंस भी जारी कीं. इसके तहत कहा गया –

लिविंग बिल तभी मान्य होगा जब इसे किसी मैजिस्ट्रेट के सामने बनाया जाए और इसके लिए दो स्वतंत्र गवाह भी हों. इस लिविं बिल के जरिए कोई शख्स यूथेनेशिया चाहता है, तो इसके लिए डॉक्टरों का एक पैनल बनेगा. वो पैनल तय करेगा कि क्या अब इस शख्स के जीने की संभावनाएं न के बराबर हैं. अगर डॉक्टर इस बात को तय कर देते हैं तो फिर उस मरीज के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाया जा सकता है, जिससे कि उसकी मौत हो जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसके लिए पर्याप्त सेफगार्ड की व्यवस्था होगी, जिससे इसका दुरुपयोग न हो.

देश की सबसे बड़ी अदालत ने फैसला दे दिया है. लेकिन अब भी लोगों के सामने और साथ ही डॉक्टरों के सामने भी कई चुनौतियां होंगी. बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो थोड़ी सी परेशानी में ही जान देने की कोशिश करते हैं. ऐसे में अगर वो अगर अपने लिविंग बिल में किसी बीमारी का जिक्र करते हैं तो उनपर क्या फैसला लिया जाएगा. अगर किसी के दोनों हाथ और दोनों पैर कट जाएं और वो इस स्थिति में जीना न चाहे तो उसका क्या होगा. इसके अलावा और भी कई सवाल हैं, जिनके जवाब अभी खोजे जाने बाकी हैं.


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