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जानिए, आदमी के पेट में कैसे पहुंच गईं लोहे की 639 कीलें

हम छोटे से थे. विज्ञान क्या बला होती है, जानते भी नहीं थे. मगर तब भी हमें पता था कि एक चीज होती है, लोहा. और दूसरी चीज होती है, चुंबक. ये जो चुंबक होता है, वो लोहे को खींच लेता है. सट से खिंचा चला आता है लोहा. चुंबक से चिपक जाता है. इससे पहले कि हम विज्ञान का नाम जानते, हमको लोहे और चुंबक का रिश्ता मालूम चल गया. ये वाली खबर लिखते हुए एकाएक बचपन की ये बात याद आ गई.

मरीजे की एक्स-रे रिपोर्ट. पेट में कीलों के अलावा ढेर सारी मिट्टी भी मिली.
मरीज की एक्स-रे रिपोर्ट. पेट में कीलों के अलावा ढेर सारी मिट्टी भी मिली.

मरीज के पेट में था एक किलो लोहा

ये खबर आई है कलकत्ता से. वहां एक कॉलेज कम अस्पताल है. कलकत्ता मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल. यहां एक मरीज आया. उसके पेट में कीलें थीं. लोहे की कीलें. बिहार के पाठक कांटी पढ़ें. तो डॉक्टरों को इस मरीज के पेट से कीलें निकालनी थीं. ऑपरेशन करते समय डॉक्टरों को चुंबक की याद आई. चुंबक का इस्तेमाल करके उन्होंने कीलें निकालीं. घंटे तक मशक्कत करते रहे डॉक्टर. पता है, उस आदमी के पेट में कितनी कीलें थीं? 639. ज्यादातर कीलें ढाई इंच की थी. मुड़ी हुई थीं. वजन करो तो एक किलो से ज्यादा लोहा. पेट में बहुत सारी मिट्टी भी थी. इसी मिट्टी में मिलाकर मरीज ने कीलें खाई थीं.

ये ऑपरेशन करीब एक घंटे 45 मिनट तक चला. मरीज भी बिल्कुल ठीकठाक है (सांकेतिक तस्वीर)
ये ऑपरेशन करीब एक घंटे 45 मिनट तक चला. मरीज भी बिल्कुल ठीकठाक है (सांकेतिक तस्वीर)

चुंबक से चुन-चुनकर कीलें निकाली गईं

वो जो मरीज था, उसने एक बार में नहीं खाई थीं कीलें. थोड़ी-थोड़ी करके. फिर एक बार वो डॉक्टर के पास आया. उसको पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द हो रहा था. उल्टी भी होती थी. फिर डॉक्टरों ने उसके पेट में झांककर देखा. मशीन से तो उसके पेट में दिखीं बहुत सारी कीलें. फिर डॉक्टरों ने एक्स-रे किया. पक्का करने के लिए कि कीलें हैं. फिर प्लानिंग हुई. अस्पताल के सीनियर डॉक्टर जुटे. चुंबक की मदद ली गई. डॉक्टरों ने चुन-चुनकर सारी कीलें निकाल दीं. अच्छे से तसल्ली करने के बाद ही वापस पेट को सिला गया.

ये सारी कीलें मरीज के पेट से निकाली गई हैं. वो कब से कीलें खा रहा था, ये नहीं मालूम. इतना पता है कि शायद मिट्टी में मिलाकर खाता था.
ये सारी कीलें मरीज के पेट से निकाली गई हैं. वो कब से कीलें खा रहा था, ये नहीं मालूम. इतना पता है कि शायद मिट्टी में मिलाकर खाता था.

बड़ी अजीब बीमारी है स्कीजोफ्रेनिया, बहुत परेशान करती है

ये जो मरीज था, वो स्कीजोफ्रेनिया का मरीज था. ये बहुत बुरी बीमारी है. मनोवैज्ञानिक परेशानी. इसमें इंसान को लगता है कि पूरी दुनिया उसे मारने पर तुली है. लोग उसका पीछा कर रहे हैं. उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं. उसे सबके ऊपर शक होता है. इसमें इंसान के सोचने-समझने की ताकत पर बड़ा असर पड़ता है. दवा से सुधार तो होता है, लेकिन पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाता. मेरी एक प्रोफेसर थीं. मनोविज्ञान पढ़ाती थीं. उनको भी थी ये परेशानी. उनको वो दिखता था, जो किसी को नहीं दिखता था. पढ़ाते-पढ़ाते एक ओर देखकर जोर से बोलने लगतीं. वहां कोई नहीं होता था. मगर उनको नज़र आता था. कहतीं, बिल क्लिंटन उनके पीछे पड़ा है. हॉस्टल के कैंपस में रहती थीं तो रात को एक्स्ट्रा क्लास के लिए हमें अपने घर बुलातीं. कई बार लाइट बुझाकर चिल्लाने लगतीं. उनकी छत पर गूलर गिरता. उनको लगता उनके पति के भेजे भूत आए हैं. उनको मारने. वो हमसे कहतीं कि हम उनके साथ मिलकर भूतों को मारें. हम भी उनको दिखाने के लिए हवा में हाथ-पैर हिलाते. कई बार हम बच्चे मन ही मन हंसते. कई बार हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती. वो पढ़ाती अच्छा थीं, लेकिन बीमार थीं. बाद में चली गईं. कनाडा. वहीं रहने लगीं.


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