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दिल्ली दंगा: हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले में 5 आरोपियों को जमानत मिली

दिल्ली दंगों को लेकर अदालतें एक के बाद एक फैसले और अहम टिप्पणियां दे रही हैं. शुक्रवार 3 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट ने दंगे से जुड़ी एक हत्या के मामले की सुनवाई की. इसमें हाई कोर्ट ने 5 आरोपियों को बेल दे दी. ये पांचों आरोपी हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या और नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के डीसीपी पर हमले के आरोप में नामजद हैं. दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने मामले में आरोपियों की ओर से दायर 11 याचिकाओं में से 5 पर अपना फैसला सुनाया है. बाक़ी पर अगले हफ्ते सुनवाई होगी.

ये भी पढ़ें: कॉन्स्टेबल रतन लाल की मौत पत्थर से हुई या गोली से, पता चल गया है

कोर्ट ने क्या कहा?

जमानत पर रिहाई पाने वालों में आरिफ, शादाब अहमद, फुरकान, सुवलीन और तबस्सुम शामिल हैं. इन्हें जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि गैरकानूनी सभा के हर सदस्य पर हत्या का मामला दर्ज नहीं किया जा सकता. साथ ही विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले अन्य लोगों के संपर्क में होना भी इस तर्क को सही ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है कि घटना की पूर्व योजना में आरोपी शामिल थे.

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने आदेश को पिछले महीने ही सुरक्षित रख लिया था. जिसे 3 सितंबर को पारित करते हुए उन्होंने कहा,

“अदालत की राय है कि याचिकाकर्ताओं को लंबे समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता का परीक्षण ट्रायल के दौरान भी किया जा सकता है.”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा,

“ये सुनिश्चित करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य है कि राज्य की शक्ति की अधिकता के मामले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से ना छीना जाए. जमानत नियम है और जेल अपवाद है, और अदालतों को अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करना चाहिए.”

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दिल्ली हाईकोर्ट ने पांचों आरोपियों को जमानत देते हुए कहा कि कोर्ट की राय में किसी को लगातार जेल में रखना ठीक नहीं है. (फोटो: साभार आजतक)

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने एक याचिकाकर्ता आरिफ के मामले में कहा,

“IPC की धारा 149 को अस्पष्ट सबूतों और महज आरोपों के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब इसे धारा 302 के साथ पढ़ा जाए. किसी भीड़ को जमानत देने या नहीं देने से पहले कोर्ट को कई बार सोचना चाहिए कि उस गैरकानूनी भीड़ के हर सदस्य का इरादा गैरकानूनी है या नहीं.”

कोर्ट ने कहा कि जिस वीडियो फुटेज में आरिफ को घटनास्थल पर दिखाया जा रहा है, उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि वो उसमें साफ दिखाई ही नहीं दे रहा है. उसके जैसे कपड़े कई लोगों ने पहने हैं और CDR (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) के आधार पर इसका फैसला नहीं हो सकता.

कोर्ट ने एक और याचिकाकर्ता तबस्सुम को जमानत देने के आदेश में कहा,

“अभियोजन पक्ष की ये दलील है कि बुर्का पहनी कुछ महिलाओं को वीडियो में पुलिस अधिकारियों के साथ मारपीट करते हुए देखा गया है. लेकिन इससे ये साबित नहीं हो पा रहा है कि मारपीट करने वाली महिलाओं में तबस्सुम शामिल है.”

हाई कोर्ट से जमानत पाने वाले आरोपियों में फुरकान नाम का याचिकाकर्ता भी शामिल है. उसे लेकर भी अदालत ने कहा,

“ऐसा कोई इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं है जो याचिकाकर्ता को आपराधिक स्थल पर दिखाता हो और याचिकाकर्ता के तत्काल मामले में CDR फैसले का आधार नहीं हो सकती.”

इसके अलावा, याचिकाकर्ता शादाब को भी जमानत मिली है. उसके मामले में कोर्ट ने कहा,

“शादाब को विरोध स्थल के आसपास किसी भी वीडियो फुटेज में नहीं देखा गया है. चार्जशीट के माध्यम से रिकॉर्ड में रखे गए CDR और Cell ID विवरण से ऐसा लगता है कि पुलिस अधिकारियों के दर्ज किए गए बयान इससे पूरी तरह से अलग हैं.”

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता सुवलीन के वकील ने गवाहों के अभाव की बात कही. उन्होंने कहा,

“मेरे मुवक्किल के खिलाफ ना कोई गवाह है और ना ही कोई CCTV फुटेज है. अभियोजन का दावा है कि हिंसा पूर्व नियोजित है. लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो ये दर्शाता हो कि मेरे मुवक्किल किसी पूर्व योजना का हिस्सा थे.”

तमाम दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पूछा कि आरोपियों को 15 महीने से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखा गया है, क्या उन्हें लगातार हिरासत में रखा जाना चाहिए. कोर्ट ने राय दी कि याचिकाकर्ता को लगातार जेल में नहीं रखा जाना चाहिए. इसके साथ ही उसने 11 में से 5 आरोपियों को बेल दे दी.

(ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे रौनक भैड़ा ने लिखी है.)


वीडियो- दिल्ली दंगों में पड़ोसी को फंसाने के लिए ऐसी साजिश रची पुलिस तक सिर खुजाने लगी!

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