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कोरोना वैक्सीन बनाने वालों पर केस ठोकने वाले वॉलंटियर ने बताया कि क्या-क्या साइड इफेक्ट्स हुए थे

कोरोना वायरस के लिए बनी वैक्सीन के इन दिनों फाइनल ट्रायल चल रहे हैं. कोविशील्ड नाम की वैक्सीन के ऐसे ही ट्रायल के दौरान एक वॉलंटियर ने आरोप लगाया था कि उसे गंभीर साइड इफैक्ट्स हुए हैं. वह वर्चुअल न्यूरोलॉजिकल ब्रेकडाउन का शिकार हो गया. टीका लगने के बाद उसकी सोचने-समझने की क्षमता कमजोर हो गई. इसके लिए उसने पुणे के सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया से 5 करोड़ रूपये का मुआवजा भी मांगा है. सीरम इंस्टिट्यूट ने हालांकि आरोपों से इनकार किया है और उलटे उसी पर 100 करोड़ का मुकदमा कर दिया है. चेन्नई के रहने वाले 40 साल के इस व्यक्ति ने अब सामने आकर बताया है कि आखिर हुआ क्या था.

उस शख्स ने आपबीती सुनाते हुए कहा-

मैंने 1 अक्टूबर को वैक्सीन का शॉट लिया था. उसके 10 दिन बाद, 11 अक्टूबर को मुझे उसके बारे में कुछ याद नहीं था. उन 10 दिनों में क्या हुआ, ये भी याद नहीं. मैं जो भी बता रहा हूं, वो मुझे दूसरे लोगों ने बताया था. मुझे उस पीड़ा की हल्की सी याद है, लेकिन ये अवचेतन मन की यादें हैं. 

मैं किसी को पहचान नहीं पा रहा था. पूरे दिन मदहोशी की हालत में रहा. शाम को डॉक्टर आए और एम्बुलेंस में अस्पताल ले गए. मैं ICU में था. 10 दिन के बाद मुझे रूम में शिफ्ट कर दिया गया था. मुझे बस यही याद है.

आरोप लगाने वाले ने बताया कि मेरा परिवार इस बात से खुश नहीं था कि मैं ट्रायल का हिस्सा बनूं. लेकिन मुझे लगा कि जब तक ये (वैक्सीन) असुरक्षित नहीं है, और कुछ लोगों ने आगे आकर रिस्क लिया भी है, तो वैक्सीन का ट्रायल पूरा करने के लिए शॉट लिया जा सकता है. उन्होंने कहा,

ये एक वैज्ञानिक प्रक्रिया थी. इसी वजह से मैं रिस्क लेने के लिए तैयार था. लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि आपको इतना कुछ झेलना पड़े. मुझे पता था कि ये एक अप्रूव्ड मेडिसिन नहीं है. कुछ खतरे भी हैं इसके. लेकिन इस हद तक रिस्क के लिए मैंने हामी नहीं भरी थी.

शख्स ने आगे कहा कि जैसे ही मुझे ये रिएक्शन हुआ, मेरी पत्नी ने ट्रायल रोकने की रिक्वेस्ट की. ये तय करना ज़रूरी है कि ये वैक्सीन की वजह से हुआ, या किसी और वजह से. ये प्रोटोकॉल का हिस्सा है. मेरे परिवार ने जिस जांच की मांग की, वो आम जनता की सेहत की चिंता को ध्यान में रखते हुए की. उन्होंने कहा, 

कोई एक ऐसा टेस्ट नहीं है, जो बता सके कि ऐसा किस वजह से हुआ. एक आदमी नॉर्मल होते हुए अचानक कोमा जैसी स्थिति में अपने आप नहीं पहुंच सकता. डॉक्टरों ने जांच के बाद पाया कि मुझे जो रिएक्शन हुआ, उसकी वजह वैक्सीन हो सकती है. ये वैज्ञानिक रूप से सत्यापित तथ्य है कि वैक्सीन लगने के 8 से 14 दिन के बाद साइड इफेक्ट हो सकते हैं. इसे पोस्ट वैक्सीन इन्सेफ़्लाइटिस कहा जाता है. मुझे 10 दिन के लिए ये हुआ था, और धीरे-धीरे ठीक हुआ.

सीरम इंस्टिट्यूट की ओर से 100 करोड़ का केस करने की बात पर वॉलंटियर ने कहा कि उन्होंने (वैक्सीन बनाने वालों) जो कहा, उसका कोई मतलब नहीं बनता है. आप ऐसे व्यक्ति को क्यों धमकाओगे, जो आपके ट्रायल का हिस्सा रहा है.

मेरा मकसद ये था कि मैं उनके प्रोडक्ट को सुरक्षित तरीके से मार्केट तक पहुंचाने में मदद करूं. मैंने शॉट भी इसीलिए लिया, इस प्रोसेस में उनकी मदद की. सच बोलना किसी की मानहानि करना नहीं है. अपनी चुप्पी को न बेचना एक पब्लिक जिम्मेदारी है. जनता को पता चलना चाहिए कि हुआ क्या. इसे (वैक्सीन को) आखिर जनता को ही बेचा जाना है. इसलिए मैंने जनता को बताया. और अपनी चुप्पी उन लोगों (वैक्सीन बनाने वालों) को नहीं बेची.

इस वैक्सीन को ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका मिलकर बना रहे हैं. भारत में इसके निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट सीरम इंस्टिट्यूट ने लिया है. ट्रायल में शामिल वॉलंटियर ने जब आरोप लगाए थे, तो सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ने बयान जारी करके अपनी बात कही थी. इसमें उलटे आरोप लगाए गए थे कि वैक्सीन के बारे में ये सब आरोप निराधार हैं, और बुरे इरादों से लगाए  गए हैं. कंपनी ने कहा था कि जहां तक वॉलंटियर की मेडिकल कंडिशन का सवाल है, हम उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं. लेकिन वैक्सीन और उनकी मेडिकल कंडीशन के बीच कोई संबंध नहीं है. इसको लेकर इंस्टिट्यूट ने उसके खिलाफ 100 करोड़ रुपये की मानहानि का केस भी कर दिया है.

बहरहाल, चैन्ने के इस वॉलंटियर ने सीरम इंस्टिट्यूट, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और कुछ अन्य को नोटिस भेजे गए हैं. उसकी मांग है कि वैक्सीन की टेस्टिंग, निर्माण और वितरण की मंजूरी को रद्द किया जाए. ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया और उनसे जुड़े अधिकारी इन आरोपों की जांच कर रहे हैं.


वीडियो: PM मोदी ने इन तीन शहरों का दौरा किया और कोरोना वैक्सीन के विकास कार्य की समीक्षा की

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