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सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा - PM मोदी चुनाव प्रचार में बिज़ी, ये काम बाद में होगा

नोट: ये खबर बुकमार्क करके रख लीजिए. अगली बार जब भी केंद्र सरकार (या बीजेपी) का कोई नेता दावा करे. कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से सातों दिन, चौबीसों घंटे काम किया है, तो उन्हें ये वाली खबर याद दिला दीजिएगा.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट मंत्री कर्नाटक के अंदर चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं. इतने व्यस्त हैं कि जरूरी काम के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं. ये वो जरूरी काम है, जिसे लेकर पिछले करीब सवा सौ सालों से विवाद चला आ रहा है. आजादी के बाद से ही जोड़ें, तो कई लोगों की जान जा चुकी है. हजारों करोड़ की सरकारी संपत्ति बर्बाद हो गई है. इतने बड़े मसले के लिए वक्त नहीं दे रही है सरकार. क्योंकि वो ताबड़तोड़ रैलियां करने और भाषण देने में खर्च हो रही है.

कावेरी जल बंटवारे पर कई बार दंगा-फसाद हो चुका है. हजारों करोड़ की सरकारी संपत्ति बर्बाद हो चुकी है. Assocham ने अनुमान बताया था. कि 2016 में कावेरी विवाद के कारण कर्नाटक के अंदर जो विरोध प्रदर्शन हुए, उसकी वजह से राज्य सरकार को करीब 25,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. ऐसे हिंसक मुद्दे को सुलझाना केंद्र की वरीयता नहीं है. उसके लिए चुनाव प्रचार करना ज्यादा जरूरी है.
कावेरी जल बंटवारे पर कई बार दंगा-फसाद हो चुका है. Assocham ने अनुमान बताया था. कि 2016 में कावेरी विवाद के कारण कर्नाटक के अंदर जो विरोध प्रदर्शन हुए, उसकी वजह से राज्य सरकार को करीब 25,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. ऐसे हिंसक मुद्दे को सुलझाना केंद्र की वरीयता नहीं है. उसके लिए चुनाव प्रचार करना ज्यादा जरूरी है.

चुनाव प्रचार करने के लिए सरकार बनाई थी?
कावेरी जल बंटवारा. इस मुद्दे के कारण देश में कई बार अशांति हो चुकी है. इसको लेकर कई बार हिंसा हो चुकी है. कई मर चुके हैं. ये मसला तमिलनाडु और कर्नाटक के लिए जीने-मरने का सवाल है. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2018 में इस विवाद को सुलझा दिया था. बता दिया था कि किस राज्य को कितना पानी मिलेगा. मगर इस फैसले पर अमल करने का तरीका केंद्र को खोजना था. इसके लिए केंद्र को एक योजना बनानी थी. और उसका ड्राफ्ट कोर्ट के सामने पेश करना था. मतलब जब तक सरकार ऐसा नहीं करेगी, तब तक कोर्ट का फैसला लागू नहीं हो सकेगा. कोर्ट ने केंद्र को 3 मई की समय-सीमा दी थी. मगर केंद्र ये काम नहीं कर पाई. हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक उसका कहना है कि प्रधानमंत्री के पास इसके लिए समय नहीं है. वो चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं. बाकी केंद्रीय मंत्री भी इसी काम में लगे हैं. मतलब PM और उसकी कैबिनेट को लोगों ने चुनाव प्रचार करने के लिए चुना है? ताकि वो जरूरी काम न करें. काम का नुकसान करें. और चुनाव प्रचार कर सकें. ऐसे ही चलना है, तो सरकार की जरूरत क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में भी केंद्र को फटकार लगाई थी. तब सरकार ने तीन हफ्तों का समय मांगा था. कोर्ट ने 3 मई तक काम पूरा करने को कहा था. तारीख आई, बीत गई. काम फिर भी पूरा नहीं हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में भी केंद्र को फटकार लगाई थी. तब सरकार ने तीन हफ्तों का समय मांगा था. कोर्ट ने 3 मई तक काम पूरा करने को कहा था. तारीख आई, बीत गई. काम फिर भी पूरा नहीं हुआ है.

कोर्ट बार-बार तारीखें दे रही है, सरकार बार-बार फेल हो रही है
ऐसा नहीं कि केंद्र पहली बार फेल हुआ हो. 16 फरवरी को ही कोर्ट ने केंद्र से कहा था. कि वो पानी के बंटवारे पर अमल की योजना, इसका तरीका वगैरह तैयार करे. कोर्ट ने केंद्र को ये काम 29 मार्च तक पूरा करने को कहा था. लोगों को उम्मीद थी कि कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र ‘कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड’ का गठन करेगा. 29 मार्च की तारीख आई और बीत गई. केंद्र ने काम नहीं किया. अप्रैल के महीने में केंद्र सफाई देने कोर्ट पहुंची. उसने कोर्ट से तीन महीने का समय मांगा. कोर्ट ने 9 अप्रैल को जवाब दिया. कहा, आपके पास 3 मई तक का समय है. इस मियाद के भीतर-भीतर योजना का ड्राफ्ट तैयार कर लीजिए. अब ये 3 मई वाली डेडलाइन भी खत्म हो गई है. काम फिर भी नहीं हुआ. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा है. कि वो 8 मई तक एक हलफनामा दे. इसमें बताए कि उसने योजना की ड्राफ्ट तैयार करने के सिलसिले में अब तक क्या काम किया है?

सरकार के पास ताबड़तोड़ चुनावी रैलियां करने का समय है. और जिन कामों के लिए वो चुनकर आई है, उसके लिए ही समय नहीं है. एक लेखा-जौखा इस बात का भी होना चाहिए. कि सरकार जब चुनाव में व्यस्त रहती है, तो देश के जरूरी काम-काज को कितना नुकसान पहुंचता है.
सरकार के पास ताबड़तोड़ चुनावी रैलियां करने का समय है. और जिन कामों के लिए वो चुनकर आई है, उसके लिए ही समय नहीं है. एक लेखा-जोखा इस बात का भी होना चाहिए. कि सरकार जब चुनाव में व्यस्त रहती है, तो देश के जरूरी काम-काज को कितना नुकसान पहुंचता है.

कर्नाटक के लिए बड़ा मुद्दा है कावेरी
12 मई को कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. कर्नाटक के लिए कावेरी के पानी से बड़ा कोई और मुद्दा नहीं है. तो शायद यही वजह है कि चुनाव का ख्याल रखते हुए केंद्र ने इस काम को टाला है. ताकि वो चुनाव के समय इस विवाद से दूर रहे. क्योंकि इस मुद्दे का असर वहां के चुनाव नतीजों पर हो सकता है. वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले और इस विवाद के निपटारे से ज्यादा तवज्जो अपनी पार्टी (यानी बीजेपी) के फायदे को दे रही है.

कर्नाटक सरकार को भी फटकार पड़ी है
कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को भी फटकार लगाई है. उसे ट्राइब्यूनल के फैसले पर अमल करते हुए तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने को कहा है. तमिलनाडु सरकार ने भी चेतावनी दी है. कि अगर बंटवारे की स्कीम का ऐलान नहीं होता, तो हंगामा हो जाएगा. उधर कर्नाटक का कहना है कि देरी उसकी तरफ से नहीं हो रही है. उसने 26 अप्रैल को केंद्र के पास एक चिट्ठी भेजी थी. इसमें उसने केंद्र से एक कमिटी बनाने को कहा था. कर्नाटक का कहना है कि मुख्य भूमिका तो अब केंद्र की है. क्योंकि जो बंटवारे की स्कीम है, उसके ऊपर मंजूरी तो केंद्र को ही देनी है.

16 फरवरी, 2018 को SC ने फैसला सुनाया था
सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी को जो फैसला दिया था, उसके मुताबिक अब तमिलनाडु को 177.25 TMC पानी मिलेगा. पहले ये 192 TMC था. यानी तमिलनाडु के हिस्से में आने वाला पानी 14.75 TMC घटा दिया गया है. वहीं कर्नाटक को 192 TMC पानी देने का फैसला सुनाया गया है. यानी ये फैसला कर्नाटक को फायदा देने वाला है. केरल को 30 TMC और पुडुचेरी को 7 TMC पानी आवंटित किया गया है. ये फैसला करीब-करीब कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल के फैसले जैसा ही था.

कावेरी दक्षिण भारत की एक नदी है. करीब 750 किलोमीटर लंबी. कर्नाटक के कोडागू जिले से निकलती है और तमिलनाडु से होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है. केरल और पुदुच्चेरी से भी इसका कुछ हिस्सा गुजरता है. इसीलिए इन चारों राज्यों का नदी के पानी पर हक बनता है. सबसे बड़ा दावा है कर्नाटक और तमिलनाडु का.
कावेरी दक्षिण भारत की एक नदी है. करीब 750 किलोमीटर लंबी. कर्नाटक के कोडागू जिले से निकलती है और तमिलनाडु से होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है. केरल और पुदुच्चेरी से भी इसका कुछ हिस्सा गुजरता है. इसीलिए इन चारों राज्यों का नदी के पानी पर हक बनता है. सबसे बड़ा दावा है कर्नाटक और तमिलनाडु का.

19वीं सदी से ही चल रहा है ये विवाद
कावेरी नदी के पानी का बंटवारा बहुत पुराना मुद्दा है. 19वीं सदी का. जो पहला साल सामने आता है, वो था 1892. 20वीं सदी में भी ये विवाद बना रहा. मद्रास प्रेसिडेंसी और प्रिंसली स्टेट ऑफ मैसूर के बीच 1924 में एक समझौता हुआ. ये समझौता 1974 में खत्म हो गया. हालांकि इसमें चार राज्यों (तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुदुच्चेरी) का नाम है. मगर मुख्य विवाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच है. इस विवाद की वजह से तमिलनाडु और कर्नाटक में कई बार हिंसा हो चुकी है. दंगे हो चुके हैं. कई मारे गए हैं. कई बेघर हुए हैं. हजारों करोड़ की संपत्ति बर्बाद हो चुकी है.


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