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जिस किताब के साथ PM मोदी का वीडियो वायरल हो गया, हाई कोर्ट में उस पर बात ही नहीं हुई थी!

बातें भूल जाती हैं. यादें याद आती हैं.
सुभाष घई की ‘यादें’ का गाना. एक किताब के ज़िक्र में ध्यान आया. किताब- War and Peace. जिसकी चर्चा उठी बॉम्बे हाई कोर्ट में. कॉन्टेक्स्ट था आपत्तिजनक साहित्य. पूछा गया, एक आरोपी से कि ये किताब क्यों थी आपके पास? वैसे बाद में जज साहब ने साफ भी कर दिया कि वो उस किताब की बात नहीं कर रहे थे जिसके बारे में सब बात करने लगे. लेकिन उनकी सफाई आती तब तक सोशल मीडिया ने एक पुराना वीडियो खोज निकाला था.

जिसमें नरेंद्र मोदी के हाथ में ‘वॉर ऐंड पीस’ है. वो इसे पढ़ रहे हैं. किसी लाइब्रेरी में हैं और खोजकर ये किताब निकाली है. कह रहे हैं, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले का वीडियो है. जब का भी हो, मोदी कभी ‘War and Peace’ उलटते-पटलते दिखे ये बात अभी के संदर्भ में काफी मायने रखती है. क्यों, जानने के लिए नीचे पढ़िए:

राज्य दमन विरोध. एक CD का ये नाम अपने आप में इशारा करता है कि इसमें स्टेट के विरुद्ध कुछ है. ‘वॉर ऐंड पीस’ किसी और देश में हुए युद्ध के बारे में है. आपके पास घर पर ये किताबें और CDs क्यों थीं? आपको ये अदालत को बताना होगा.

बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस सारंग कोतवाल. 27 अगस्त को भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के आरोपियों की जमानत याचिका सुन रहे थे. वरनॉन गोनसाल्वेज़, सुधा भारद्वाज और अरुण फरेरिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इनकी बेल पेटिशन सुनने के क्रम में जस्टिस सारंग ने ये बात कही. करीब एक साल पहले गोनसाल्वेज़ के घर की तलाशी के दौरान कुछ किताबें और CDs मिली थीं. इनमें ‘वॉर ऐंड पीस’ किताब और कबीर कला मंच द्वारा रिलीज़ की गई ‘राज्य दमन विरोध’ नाम की CD भी शामिल थीं. जस्टिस सारंग ने वरनॉन गोनसाल्वेज़ से इनपर सफ़ाई देने को कहा. बताने को कहा कि उनके पास ऐसी चीजें क्यों थी. इन ‘आपत्तिजनक’ साहित्य का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि ये प्रतिबंधित संगठनों से उनके जुड़ाव की तरफ इशारा करता है. ‘वॉर ऐंड पीस’ का नाम आते ही सबका दिमाग घूम किया. सब समझने लगे कि जज साहब ने लियो टॉल्स्टॉय की लिखी किताब का जिक्र किया. टॉल्स्टॉय महात्मा गांधी के पसंदीदा लेखक थे.

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जज ने सफाई में क्या कहा?
जस्टिस सारंग कोतवाल ने कहा कि वरनॉन गोनसाल्वेज़ के पास बिस्वजीत रॉय की लिखी ‘वॉर ऐंड पीस इन जंगलमहलः पीपल, स्टेट ऐंड माओइस्ट्स’ मिली थी. टॉल्स्टॉय की लिखी वॉर ऐंड पीस नहीं. उन्होंने कहा कि इस पर जो भी खबरें छपी वो हाईकोर्ट के लिए काफी डिस्टर्बिंग है.

अगस्त 2018 में अरेस्ट किए गए थे वरनॉन गोनसाल्वेज़
1 जनवरी, 2018 को पुणे के नजदीक भीमा कोरेगांव में हुई जातीय हिंसा के आरोपियों में हैं वो. वरुण के वकील मिहिर देसाई की दलील थी. कि बस किताबें और CD रखने से वो आतंकवादी या फिर किसी प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सदस्य नहीं हो जाते. जस्टिस सारंग इसपर सहमत हुए. मगर फिर उन्होंने ये भी कहा कि वरुण को एक्सप्लेन करना होगा कि उनके घर पर इस तरह की ‘आपत्तिजनक’ चीजें क्यों मिलीं. जज ने पुणे पुलिस से भी कहा. कि उन्हें अदालत को इस तर्क से राज़ी करवाना होगा कि तलाशी के दौरान मिली किताबें और CDs वरुण को दोषी ठहराने का सबूत हैं. जस्टिस सारंग ने कहा-

अब तक पुलिस ये ब्योरा देने में नाकाम रही है कि उन CDs और किताबों में ऐसा क्या था, जो गोनसाल्वेज़ को इस केस से जोड़ती हैं. बस ये कह देना कि उनके टाइटल आपत्तिजनक हैं, काफी नहीं है. क्या आपने इन CDs की जांच की? अगर वो ब्लैंक निकलती हैं, तो? अगर अभियोजन पक्ष बरामद साहित्य और CDs के अंदर की चीजों का ब्योरा नहीं देती, तो अदालत को इन्हें नज़रंदाज करना होगा.

मिहिर देसाई की अरग्यूमेंट थी. कि पुणे पुलिस ने कुछ ईमेल्स और चिट्ठियों के आधार पर गोनसाल्वेज़ के नामे पूरा केस बनाया है. मिहिर के मुताबिक-

इनमें से कोई भी चिट्ठी गोनसाल्वेज़ ने नहीं लिखी. न ही ये उन्हें संबोधित करते हुए लिखी गई हैं. ऐसे में गोनसाल्वेज़ के विरुद्ध किसी ठोस सबूत के अभाव की वजह से उन्हें जमानत दे दी जानी चाहिए.

पुणे पुलिस की वकील अरुणा पाई इस जमानत याचिका का विरोध कर रही थीं. उनका कहना था कि पुलिस को भले ही गोनसाल्वेज़ के कंप्यूटर और हार्ड डिस्क से उनके विरुद्ध कोई इलेक्ट्रॉनिक सबूत न मिला हो. मगर उनके घर पर हुई छापेमारी के दौरान मिलीं किताबें और CDs उन्हें दोषी ठहराते हैं.

बैटल ऑफ भीमा कोरेगांव क्या है?
ये पुणे जिले का एक छोटा सा गांव है. यहां 1 जनवरी, 1818 को पेशवाओं और अंग्रेज़ों के बीच एक युद्ध हुआ था. अंग्रेज़ों की सेना में खूब सारे दलित सैनिक थे. पेशवा की सेना में सवर्णों की तादाद ज्यादा थी. अंग्रेज़ों ने पेशवा की सेना को हरा दिया. समय के साथ ये लड़ाई दलित शौर्य, उनकी अस्मिता की एक निशानी बन गई. 2018 की पहली जनवरी को इस युद्ध के 200 साल पूरे हो रहे थे. इसी मौके पर यहां हालात बिगड़े और जातीय हिंसा छिड़ गई.

ये केस क्या है?
वरनन गोनसाल्वेज़ को अनलॉफुल ऐक्टिविटिज़ (प्रिवेंशन) ऐक्ट में गिरफ़्तार किया गया था. उनके घर और दफ़्तर पर छापा मारा गया था. और भी कई ऐक्टिविस्ट्स के साथ ऐसा हुआ. इन सबका कनेक्शन एलगार परिषद केस से बताती है पुलिस. पुलिस का कहना है कि 31 दिसंबर, 2017 को परिषद की तरफ से भड़काऊ भाषणबाजी हुई. इसी वजह से अगले दिन, यानी 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में जातिगत हिंसा भड़की. इसमें एक इंसान की जान गई और कई लोग घायल हुए. गोनसाल्वेज़ के अलावा इस केस में शोमा सेन, रोना विल्सन, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरिया और गौतम नवलखा भी अरेस्ट किए गए हैं.


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