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क्या अयोध्या भूमि विवाद के अहम पक्ष रहे निर्मोही अखाड़े को कुछ भी नहीं मिला?

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अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला आ गया है. 9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की खंडपीठ ने फैसले में विवादित ज़मीन रामलला की बताई है और कहा है कि केंद्र सरकार अगले तीन महीने में एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर बनाने की रूपरेखा तय करे. इसके अलावा इस ज़मीन के दो और पक्षकारों – निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड की दलील खारिज कर दी है. जबकि अयोध्या भूमि विवाद को जिस स्वरूप में आज हम जानते हैं, उसे मुद्दा बनाने की शुरुआत ही एक तरह से निर्मोही अखाड़े ने की थी.

पहला केस दाखिल हुआ था 15 जनवरी, 1885 को. केस दाखिल करने वाले थे महंत रघुबर दास. महंत रघुबर दास निर्मोही अखाड़े के महंत थे और उन्होंने ही राम चबूतरे को राम का जन्मस्थान मानते हुए वहां पर मंदिर बनाने की मांग की थी. हालांकि 24 फरवरी, 1885 को फैजाबाद जिला जज हरिकिशन ने महंत रघुबर दास की याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि वहां पर मंदिर नहीं बन सकता है. लेकिन महंत रघुबर दास ऊपरी अदालत में पहुंच गए. उन्होंने 17 मार्च, 1886 को जिला जज फैजाबाद कर्नल एफ.ई.ए. कैमियर की अदालत में याचिका दाखिल की. जस्टिस कैमियर ने अपने फैसले में ये मान लिया कि मस्जिद हिंदुओं की जगह पर बनी है, लेकिन अब देर हो चुकी है. 356 साल पुरानी गलती को अब सुधारना मुमकिन नहीं है, इसलिए यथास्थिति बनाए रखें. और इस तरह से अयोध्या विवाद का पहला मुकदमा यथास्थित बनाए रखने के आदेश के साथ खारिज हो गया.

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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

इसके करीब 73 साल बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा फिर से फैजाबाद सिविल कोर्ट पहुंचा. निर्मोही अखाड़ा चाहता था कि उसे राम जन्म भूमि का प्रबंधन और पूजन की इजाजत मिले. वहां भी बात नहीं बनी. इसके बाद साल 1989 में निर्मोही अखाड़ा एक बार फिर से कोर्ट पहुंचा और कहा कि जिस जगह पर मूर्ति विराजमान है, वहां निर्मोही अखाड़ा सदियों से राम लला की पूजा करता आया है, लिहाजा कोर्ट निर्मोही अखाड़े को पूजा का अधिकार दे. आखिरकार 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों में बांट दिया था, जिसमें एक हिस्सा ज़मीन निर्मोही अखाड़े को भी दी गई थी.

लेकिन 9 नवंबर, 2019 को जब सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की खंडपीठ ने अयोध्या विवाद से जुड़ा फैसला दिया, तो इस फैसले में निर्मोही अखाड़े को ज़मीन देने का जिक्र नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि विवादित ज़मीन पर केंद्र सरकार एक ट्रस्ट बनाकर तीन महीने के अंदर मंदिर बनाने की योजना बनाए. वहीं निर्मोही अखाड़े को इस ट्रस्ट में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए और सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ ज़मीन कहीं और दी जाए. सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े को लेकर अपने फैसले में कहा-

‘निर्मोही अखाड़े की ओर से दाखिल सूट 3 के इस दावे को खारिज़ किया जाता है कि निर्मोही अखाड़े के पास पूजा पाठ का अधिकार रहा है. हालांकि निर्मोही अखाड़े के इस विवाद से ऐतिहासिक जुड़ाव को सम्मान देते हुए कोर्ट आर्टिकल 142 के तहत मिले अपने अधिकार का इस्तेमाल करती है. और इसलिए मैनेजमेंट में निर्मोही अखाड़े को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए.’

इस तरह से 14वीं सदी के वैष्णव संत रामानंद की ओर से बनाए गए निर्मोही अखाड़े को विवादित ज़मीन पर कोई मालिकाना हक नहीं मिला. निर्मोही अखाड़ा राम को अपना आराध्य मानता है. यह अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त 14 अखाड़ों में से एक है, जिसका संबंध वैष्णव संप्रदाय से है. इसके पास उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात और बिहार में राम के कई मंदिर हैं. अब निर्मोही अखाड़ा केंद्र सरकार की ओर से राम मंदिर के लिए बनाए जाने वाले ट्रस्ट में भागीदार होगा. और यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ज़मीन पर मालिकाना हक न मिलने के बाद भी निर्मोही अखाड़ा खुश है. अखाड़े के वरिष्ठ पंच महंत धर्मदास ने ‘भाषा’ से बातचीत में कहा-

‘विवादित ज़मीन पर अखाड़े का दावा खारिज होने का कोई अफसोस नहीं है, क्योंकि वह भी रामलला का ही पक्ष ले रहा था. कोर्ट ने रामलला के पक्ष को मजबूत माना है. इससे निर्मोही अखाड़े का मकसद पूरा हुआ है.’


अयोध्या पर राम मंदिर के पक्ष में फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के 5 जज ये हैं

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