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पहली बार कोर्ट में कब पहुंचा था अयोध्या का मामला?

9 नवंबर, 2019. वो तारीख, जब राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में फैसला आने वाला है. फैसला पांच जजों की पीठ देने वाली है, जिसमें चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, और जस्टिस एसए नज़ीर शामिल हैं. 16 अक्टूबर, 2019 को इस केस की सुनवाई पूरी हुई थी, जिसके बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. अब ये फैसला आने वाला है.

लेकिन अयोध्या का ये विवाद 100 साल से भी ज्यादा पुराना है. कहा जाता है कि बाबर के एक सिपहसालार मीर बाकी ने 1528 में अयोध्या में एक मस्जिद बनवाई और उसे नाम दिया बाबरी मस्जिद. हेमंत शर्मा की किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ से लेकर देवेंद्र स्वरूप की किताब ‘अयोध्या का सच’ में भी इसका जिक्र है कि मस्जिद मीर बाकी ने ही बनवाई थी. लेकिन 15 जनवरी, 1885 को महंत रघुबर दास फैजाबाद जिला अदालत में सब जज हरिकिशन की कोर्ट में पहुंचे. ये मामला नंबर 61/280 था. इस याचिका में महंत रघुबर दास ने दावा किया था कि वो जन्मस्थान अयोध्या के महंत हैं. याचिका में राम चबूतरे को जन्मस्थान बताया गया था और इस राम चबूतरा पर एक मंडप बनाने की मांग की. इस दावे में ये बात नहीं थी कि जहां मस्जिद है, वहां पहले कोई मंदिर थी. ये अयोध्या विवाद से जुड़ा हुआ पहला केस था.

हेमंत शर्मा की किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ के मुताबिक 24 फरवरी, 1885 को फैजाबाद जिला अदालत के जज हरिकिशन ने महंत रघुबर दास की अर्जी खारिज़ कर दी. कोर्ट ने कहा कि वह जगह मस्जिद के बेहद करीब है, इसलिए झगड़ा हो सकता है. जज हरिकिशन ने माना कि चबूतरे पर हरिकिशन का कब्जा है, इसलिए एक दीवार उठाकर चबूतरे को अलग किया जा सकता है, लेकिन वहां पर मंदिर नहीं बन सकता है.

अर्जी खारिज होने पर महंत रघुबर दास 17 मार्च, 1886 को जिला जज फैजाबाद कर्नल एफ.ई.ए. कैमियर की कोर्ट में पहुंचे. जस्टिस कैमियर ने अपने फैसले में ये मान लिया कि मस्जिद हिंदुओं की जगह पर बनी है, लेकिन अब देर हो चुकी है. 356 साल पुरानी गलती को अब सुधारना मुमकिन नहीं है, इसलिए यथास्थिति बनाए रखें. और इस तरह से अयोध्या विवाद का पहला मुकदमा यथास्थित बनाए रखने के आदेश के साथ खारिज हो गया.


अयोध्या केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर क्या थे हिंदू और मुस्लिम पक्ष के तर्क?

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