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यूपी के हर जिले में कोरोना से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई की हाई कोर्ट ने स्पेशल व्यवस्था कर दी है

इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने यूपी में कोरोना (Corona) महामारी के मैनेजमेंट को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है. कोर्ट ने योगी आदित्यनाथ सरकार को राज्य के हर जिले में COVID-19 से जुड़ी लोगों की शिकायतें दूर करने के लिए 3 सदस्यीय समिति बनाने का आदेश दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में यूपी सरकार की कोरोना टेस्टिंग पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि यूपी सरकार के हलफनामे से साफ पता चलता है कि राज्य की कोरोना टेस्टिंग में कमी आ गई है. इलेक्शन ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले सरकारी कर्मचारियों और वैक्सीनेशन को लेकर भी कई महत्वपूर्ण बातें कहीं. आइए जानते हैं कि कोर्ट ने क्या-क्या आदेश दिए हैं.

48 घंटे के भीतर बने शिकायत समिति

हाई कोर्ट ने कोरोना महामारी को लेकर लगातार मिल रही शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाया. लाइव लॉ डॉट कॉम के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने कहा-

हर जिले में कोरोना से जुड़ी शिकायतों को सुनने के लिए 3 सदस्यों की महामारी लोक शिकायत समिति बनाई जाए. समिति में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला न्यायाधीश द्वारा नामित समान रैंक के न्यायिक अधिकारी हों. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य द्वारा नामित प्रोफेसर हों. यदि कोई मेडिकल कॉलेज नहीं है, तो जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक द्वारा जिला अस्पताल के नामित डॉक्टर को रखा जाए. जिला मजिस्ट्रेट की ओर से नामित अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के रैंक का एक प्रशासनिक अधिकारी भी इस कमिटी में शामिल हो.

कोर्ट ने कहा कि इस आदेश के पारित होने के 48 घंटे के भीतर ये 3 सदस्यीय महामारी लोक शिकायत समिति अस्तित्व में आ जाए. इस बारे में जरूरी निर्देश उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव (गृह) द्वारा सभी जिलाधिकारियों को दिये जाएं. जहां तक ग्रामीण इलाकों की बात है तो वहां शिकायत सीधे संबंधित तहसील के एसडीएम के पास की जा सकती है. वो इन्हें महामारी जन शिकायत समिति को भेजेंगे.

कोर्ट ने कहा कि यह महामारी जन शिकायत समिति कोरोना को लेकर लगातार सामने आ रहे वीडियो और वायरल खबरों का भी संज्ञान लेगी. बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछली सुनवाई में वायरल वीडियो पर संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी थी.

वैक्सीन का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन न कराने वाले क्या करें?

हाई कोर्ट ने उन लोगों के बारे में भी निर्देश जारी किए, जो कोरोना वैक्सीन का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन नहीं करा सकते. कोर्ट ने शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के टीकाकरण को लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकार से सवाल पूछा. कोर्ट ने पूछा-

सरकार उन शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को टीका कैसे लगाएगी, जिन्हें टीकाकरण केंद्रों पर नहीं लाया जा सकता और जो ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन नहीं करा सकते? अनपढ़ मजदूरों और गांव में रहने वालों को टीका कैसे लगाया जाएगा, क्योंकि ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन जैसी तकनीक तक उनकी पहुंच नहीं है?

कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे कोर्ट के सामने एक प्लान पेश करें. बताएं कि 18 से 44 साल के उन अशिक्षित मजदूरों और ग्रामीणों का टीकाकरण कैसे करेंगे, जो ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन नहीं करवा पा रहे हैं.

Allahabad High Court And Yogi Adityanath
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी सरकार से उन दिव्यांगों और गांव-देहात के लोगों के टीकाकरण पर भी सवाल पूछा जो ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन नहीं करा सकते.

चुनाव ड्यूटी में मौत पर 1 करोड़ मुआवजा

हाई कोर्ट ने चुनाव ड्यूटी के दौरान कोरोना संक्रमण से सरकारी कर्मचारियों की मौत के मामले में भी महत्वपूर्ण आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि मतदान कराने की प्रक्रिया के दौरान कोरोना की चपेट में आकर जिन अधिकारियों की मौत हो गई, उन्हें दिया जाने वाला मुआवजा बहुत कम है. ये रकम कम से कम 1 करोड़ होनी चाहिए. बता दें कि सरकार ने हर ऐसे मृतक को 30 लाख रुपये का मुआवजा देने की बात कही थी.

कोर्ट ने आदेश में लिखा-

यह ऐसा मामला नहीं है कि किसी ने चुनाव के दौरान अपनी सेवाएं स्वेच्छा से दी हों. चुनाव के दौरान कर्तव्य निभाने के लिए चुने गए लोगों के लिए ये अनिवार्य था. कई लोगों ने इसके लिए अनिच्छा भी दिखाई थी. हमारे विचार में मुआवजे की राशि बहुत कम है. राज्य और राज्य चुनाव आयोग ने जानबूझकर उन्हें बिना RT-PCR टेस्ट के ही काम करने के लिए मजबूर किया गया. परिवार के लिए रोटी कमाने वाले के जीवन की क्षति की भरपाई के लिए मुआवजा राशि कम से कम 1 करोड़ रुपए होनी चाहिए.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अधिकारियों से दिवंगत न्यायमूर्ति वी.के. श्रीवास्तव के इलाज पर भी रिपोर्ट तलब की. जस्टिस श्रीवास्तव का 21 अप्रैल को कोरोना की वजह से निधन हो गया था. पता चला था कि उन्हें समय पर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ (SGPGI) में भर्ती नहीं किया गया. उनके इलाज में लापरवाही का पता लगाने के लिए कोर्ट ने सरकार से 3 दिन के अंदर कमिटी बनाने को कहा है. इस कमिटी में लखनऊ बेंच का एक सीनियर रजिस्ट्रार, राज्य सरकार, SGPGI, लखनऊ और अवध बार एसोसिएशन के साथ समन्वय करेगा. दो हफ्ते के भीतर कोर्ट में रिपोर्ट पेश की जाएगी.

बता दें कि 7 मई को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने योगी सरकार को निर्देश दिया था कि वे वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित करें ताकि राज्य में हर किसी को 3-4 महीने के भीतर टीका मिल सके. अदालत ने अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी पर अधिकारियों को कड़ी फटकार भी लगाई थी. ऑक्सीजन की कमी से होने वाली मौतों को आपराधिक कृत्य और नरसंहार तक बता दिया था.


वीडियो – इलाहाबाद हाई कोर्ट ने UP में कोरोना के हालात सुधारने के लिए योगी सरकार को क्या निर्देश दिए?

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