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क्या है चमकी बुखार, जिससे अब तक 57 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है

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हिंदी में चमकी बुखार कह लीजिए या फिर अंग्रेजी में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम. दोनों का एक ही मतलब है, मौत. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि बिहार में इन दिनों ये चमकी बुखार कहर बरपा रहा है. रोज बच्चों के मरने की खबरें आ रही हैं. डॉक्टरों के मुताबिक इस बीमारी का सबसे ज्यादा कहर सीतामढ़ी, शिवहर, मोतिहारी, बेतिया और वैशाली ज़िले में है. चूंकि इन ज़िलों में अस्पताल की स्थिति अच्छी नहीं है इसीलिए सभी इलाज के लिए मुज़फ्फरपुर की तरफ ही भाग रहे हैं. हालत ये है कि मुज़फ्फरपुर के एसकेएमसीएच यानी श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में भर्ती होने वाले ज्यादातर बच्चे इन्हीं ज़िलों के हैं.

सिर्फ 10 जून के आंकड़ों के मुताबिक एक दिन में एसकेएमसीएच में 44 बच्चे भर्ती किए गए. जिनमें से 25 बच्चों की मौत हो गई. डॉक्टरों के मुताबिक इस बुखार से पीड़ित और मरने वाले सभी बच्चों की उम्र 5 से 10 साल के बीच की है. एसकेएमसीएच के सुपरिटेंडेंट सुनील शाही के मुताबिक 13 जून तक अस्पताल में 137 बच्चे भर्ती किए गए. जिनमें से 50 बच्चों की मौत हो गई. उन्होंने बताया कि स्थिति से निबटने के लिए केंद्रीय टीम भी मुज़फ्फरपुर पहुंच चुकी है. दूसरी तरफ एक अफवाह ये भी है कि लीची की वजह से बच्चे बीमार पड़ रहे हैं, डॉक्टर्स जिसकी जांच करने की बात कर रहे हैं.

अफवाह ये भी है कि बच्चे लीची की वजह से मर रहे हैं, डॉक्टरों ने मामले की जांच की बात की है.
अफवाह ये भी है कि बच्चे लीची की वजह से मर रहे हैं, डॉक्टरों ने मामले की जांच की बात की है.

# मौतें क्यों हो रही हैं?

इसका जवाब है एईएस. जिसका फुल फॉर्म होता है एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम. बोलचाल की भाषा में लोग चमकी बुखार कहते हैं. लेकिन जब एसकेएमसीएच के डॉक्टर से सवाल पूछा गया कि ये चमकी बुखार हो कैसे जाता है? इसकी वजह क्या है? लगातार मौते क्यों हो रही हैं? मरने वालों की संख्या रुक क्यों नहीं रही है? तब इसके जवाब में एसकेएमसीएच के सुपरिटेंडेंट चुप हो गए. फिर बोले:

इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए केंद्रीय टीम मुज़फ्फरपुर पहुंची है. केंद्रीय बाल आयोग के साथ स्वास्थ्य विभाग की टीम भी एसकेएमसीएच पहुंची है. वरिष्ठ डॉक्टरों की टीम मामले की जांच कर रही है. हम हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि अब एक भी बच्चे की जान ना जाए.

हालांकि डॉक्टर और सरकारी अधिकारी बच्चों की मौत का कारण सीधे तौर पर इंसेफेलाइटिस कहने से बच रहे हैं. शुरुआती तौर पर मौत की वजह पहले हाइपोग्लाइसीमिया यानी कि खून में अचानक शुगर की कमी या सोडियम की कमी बता रहे हैं. बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे के मुताबिक चमकी बुखार से मरने वालों बच्चों की संख्या 57 हो चुकी है. जबकि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 60 से 65 बच्चों की मौत हुई है.

#सरकारें क्या कर रही है?

बिहार और केंद्र दोनों में एनडीए की सरकार है. लेकिन ना तो राज्य सरकार की तरफ से और ना ही केंद्र सरकार की तरफ से कोई खास कदम उठाए गए हैं. 50 बच्चों की मौत के बाद केंद्र की टीम बिहार पहुंची है. जबकी दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सिर्फ मामले पर चिंता जाहिर की है. पटना में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि हालात पर खास ध्यान देने के लिए स्वास्थ्य विभाग के सचिव को खास निर्देश दिए गए हैं.

# पिछले कुछ सालों में कितनी मौतें हुई?

एसकेएमसीएच के आंकड़ों के मुताबिक इस बीमारी से साल 2012 में सबसे ज्यादा 120 मौतें हुई. साल 2013 में 39, साल 2014 में 90, फिर साल 2015 में 11, उसके अगले साल यानी कि 2016 में 4 मौतें, वहीं साल 2017 में 11 मौतें जबकि पिछले साल 7 बच्चों की जान गई थी. लेकिन इस साल ये आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं.

# चमकी बुखार के लक्षण क्या हैं?

लगातार मर रहे बच्चों की संख्या के बीच जब हमने डॉक्टर से पूछा कि चमकी बुखार के लक्षण क्या है? लोग ये कैसे अंतर कर पाएंगे कि उनके बच्चे को चमकी बुखार है आम बुखार नहीं. तब मुज़फ्फरपुर के चाइल्ड स्पेस्लिस्ट डॉक्टर अरुण शाह ने बताया. चमकी बुखार में बच्चे को लगातार तेज़ बुखार चढ़ा ही रहता है. बदन में ऐंठन होती है. बच्चे दांत पर दांत चढ़ाए रहते हैं. कमज़ोरी की वजह से बच्चा बार-बार बेहोश होता है. यहां तक कि शरीर भी सुन्न हो जाता है. कई मौकों पर ऐसा भी होता है कि अगर बच्चों को चिकोटी काटेंगे तो उसे पता भी नहीं चलेगा. जबकि आम बुखार में ऐसा नहीं होता है.

मुज़फ्फरपुर में मामले की जांच के लिए केंद्रीय टीम पहुंची है.
मुज़फ्फरपुर में मामले की जांच के लिए केंद्रीय टीम पहुंची है.

# गर्मियों के दौरान ही मौतें क्यों?

डॉक्टरों की मानें तो गर्मी और चमकी बुखार का सीधा कनेक्शन होता है. पुरानें कुछ सालों के पन्नों को पलट कर देखें, तो इससे ये साफ हो जाता है कि दिमागी बुखार से जितने बच्चे मरे हैं, वो सभी मई, जून और जुलाई के महीने में ही मरे हैं. लेकिन और ज्यादा गहराई से देखेंगे तो पता चलेगा कि मरनेवालों में ज्यादातर निम्न आय वर्ग के परिवार के ही बच्चे थे. आसान शब्दों में कहें तो जो बच्चे भरी दोपहरी में नंग-धड़ंग गांव के खेत खलिहान में खेलने निकल जाते हैं. जो पानी कम पीते हैं. तो सूर्य की गर्मी सीधा उनके शरीर को हिट करती है. तो वे दिमागी बुखार के गिरफ्त में पड़ जाते हैं.

# बच्चे ही क्यों होते हैं शिकार?

एसकेएमसीएच के डॉक्टर से बात करने पर पता चला कि इस केस में ज्यादातर बच्चे ही दिमागी बीमारी के शिकार होते हैं. चूंकि बच्चों के शरीर की इम्युनिटी कम होती है, वो शरीर के ऊपर पड़ रही धूप को नहीं झेल पाते हैं. यहां तक कि शरीर में पानी की कमी होने पर बच्चे जल्दी हाइपोग्लाइसीमिया के शिकार हो जाते हैं. कई मामलों में बच्चों के शरीर में सोडियम की भी कमी हो जाती है. हालांकि कई डॉक्टर इस थ्योरी से इनकार भी करते हैं. 3 साल पहले भी जब मुज़फ्फरपुर में दिमागी बुखार से बच्चे मर रहे थे तब मामले की जांच करने मुंबई के मशहूर डॉक्टर जैकब गए. उन्होंने भी इस थ्योरी पर जांच करने की कोशिश की, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए.

मुज़फ्फरपुर में हर साल गर्मी के दौरान बच्चों की मौतें होती हैं
मुज़फ्फरपुर में हर साल गर्मी के दौरान बच्चों की मौतें होती हैं.

# कैसी सावधानी बरती जाए?

गर्मी के मौसम में फल और खाना जल्दी खराब होता है. घरवाले इस बात का खास ख्याल रखें कि बच्चे किसी भी हाल में जूठे और सड़े हुए फल नहीं खाए. बच्चों को गंदगी से बिल्कुल दूर रखें. खास कर गांव-देहात में जो बच्चे सूअर और गाय के पास जाते हैं गर्मियों में दूरी बना कर रखें. खाने से पहले और खाने के बाद हाथ ज़रूर धुलवाएं. बच्चे नहीं मान रहे हैं तो कान पकड़ कर हाथ धुलवाएं. साफ पानी पिएं, बच्चों के नाखून नहीं बढ़ने दें. और गर्मियों के मौसम में धूप में खेलने से मना करें.

# बीमारी का इलाज क्या है?

चमकी बुखार से पीड़ित इंसान के शरीर में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए. हेल्दी फूड के साथ थोड़ी-थोड़ी देर पर मीठा देते रहना चाहिए. डॉक्टरों के मुताबिक चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों में शुगर की कमी देखी जाती है. इसीलिए इस बात का भी खास ध्यान रखना चाहिए. बच्चों को थोड़-थोड़ी देर में लिक्विड फूड भी देते रहे ताकि उनके शरीर में पानी की कमी न हो. दूसरी तरफ डॉक्टर इस बीमारी का कारगर इलाज़ नहीं ढूंढ पाए हैं. चूंकि इस बीमारी में मृत्युदर सबसे ज्यादा 35 प्रतिशत है. इसीलिए डॉक्टर्स सावधानी को ही दूसरा इलाज बनाते है.


डॉक्टर ने मरीज़ को धुन दिया, लेकिन उससे पहले ये हुआ था

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