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ये किन दो नेताओं को चुनाव से ठीक पहले योगी आदित्यनाथ ने बड़ा काम दे दिया है?

यूपी में विधानसभा चुनाव के पहले नियुक्तियां हो रही हैं. प्रदेश सरकार ने रामबाबू हरित को अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग का और जसवंत सिंह सैनी को पिछड़ा आयोग का चेयरमैन बनाया है. इसके अलावा भी नियुक्तियां हुई हैं. इन आयोगों में सदस्य बने हैं. और भाजपा में MLC अरविंद कुमार शर्मा के उपाध्यक्ष बन जाने की चर्चा भी है. लेकिन हम इस ख़बर में रामबाबू हरित और जसवंत सैनी को थोड़ा क़रीब से जानने की कोशिश करेंगे कि ये नेता कौन हैं. 

रामबाबू हरित

Rambabu Harit
रामबाबू हरित

आगरा और आसपास के क्षेत्रों की राजनीति करने वालों को ये नाम बीते कुछ सालों से ज़रूर ज़ेहन में होगा. रामबाबू हरित को अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग का चेयरमैन बनाया गया है. पेशे से डॉक्टर हैं. डिग्री है एमबीबीएस की. और भाजपा की उत्तर प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं.

ख़बरों के मुताबिक़, रामबाबू मूलतः शाहगंज के रहने वाले हैं. मेडिकल की पढ़ाई के बाद रामबाबू हरित ने कुछ समय तक बतौर रेसीडेंट डॉक्टर अपनी सेवाएं दीं, और इसी बीच नौकरी छोड़कर आगरा लौट आए. मां-बाप के पास. फिर धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में हाथ आज़माया.

साल 1989 में पहली बार चुनावी राजनीति में आए, जब सभासदी में रामबाबू को जीत मिली. फिर आया साल 1992, जब रामबाबू आगरा के डिप्टी मेयर बने और फिर इसी साल आगरा पश्चिमी से बने विधायक. साल 1996 में चुनाव हुए तो रामबाबू हरित ने फिर से ये सीट हथिया ली.

जब साल 2000 में राजनाथ सिंह सूबे के मुख्यमंत्री बने थे, उस समय रामबाबू हरित को एक महत्त्वपूर्ण पद दिया गया. स्वास्थ्य राज्य मंत्री का. पत्रकार बताते हैं कि अपने मंत्रीकाल में रामबाबू हरित ने अपने रहन-सहन को लेकर सुर्ख़ियाँ बटोरी थीं. रामबाबू हरित स्कूटर से चलते देखे जाते थे. साल आया 2002. राजनाथ सिंह सत्ता से गए, रामबाबू हरित का मंत्री पद भी. लेकिन इस साल के विधानसभा चुनाव में रामबाबू हरित ने अपनी आगरा पश्चिम विधानसभा सीट फिर से जीत ली. लेकिन साल 2007 में चुनाव हार गये. ग्राफ़ गिरने के संकेत मिलने लगे थे. शायद इन संकेतों को देखते हुए ही रामबाबू हरित ने पाला बदल लिया. चले गए बसपा में. 

लेकिन कुछ ही दिनों बाद वापिस भी आ गये अपनी पार्टी में. लेकिन पाला बदलकर आए थे, तो संगठन में काम करने की ज़िम्मेदारी मिली. 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों के पहले भाजपा ने उत्तर प्रदेश में धम्म चेतना यात्रा निकाली थी. भाजपा कार्यकर्ता शहर शहर जाते, रैलियां निकालते. साथ में कुछ बौद्ध भिक्षु भी दिखते. बसपा ने आरोप लगाए कि भाजपा बौद्ध भिक्षुओं का प्रयोग करके अंबेडकरवादी नवबौद्धों का अपमान कर रही है. टिप्पणीकारों ने कहा कि ये भाजपा की दलित समाज में पैठ बनाने की कोशिश है. भाजपा ने कहा कि ये दलितों को आंबेडकर के नाम पर नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा विकसित किए जा रहे पंचतीर्थों से अवगत कराने का प्रयास है. जिन कुछ लोगों को केशव प्रसाद मौर्य की अगुवाई में इस यात्रा की ज़िम्मेदारी दी गयी, उसमें एक नाम रामबाबू हरित का भी है. ‘पत्रिका’ में छपी ख़बर बताती है कि जब ये यात्रा अलीगढ़ पहुंची, तो बसपा समर्थकों ने बहुत विरोध किया. तब रामबाबू हरित ने जो बयान दिया था, उस पर बहुत हल्ला मचा था. उन्होंने कहा था, ‘दलित समाज कुएं का मेंढक है.” और अब यूपी चुनाव के ठीक पहले रामबाबू हरित को थमायी गयी है अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग की कमान.

जसवंत सैनी

Jaswant Saini
जसवंत सैनी

रामबाबू हरित के बाद अब नाम आता है जसवंत सैनी का. सहारनपुर के नेता, जिन्हें बनाया गया है उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा आयोग का चेयरमैन. जसवंत अभी तक इस आयोग के डिप्टी चेयरमैन के पद पर क़ाबिज़ थे. जिस समय जसवंत सैनी को पिछड़ा आयोग की कमान दी गयी — जिसको बीते साल तक फागू सिंह चौहान (अब बिहार के गवर्नर) सम्हालते थे — उस समय ये चर्चा शुरू हो गयी कि भाजपा ने किसान आंदोलन से बमके हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मज़बूत करने की कोशिश शुरू कर दी है.

बात जसवंत सैनी की करें तो बात उनके दादा से शुरू करनी होगी. दादा का नाम चौधरी सुरजन सिंह सैनी. सुरजन सिंह सैनी साल आपातकाल के समय जनसंघ के सहारनपुर अध्यक्ष हुआ करते थे. और जसवंत सैनी के पिता भी विश्व हिंदू परिषद के कर्मठ कार्यकर्ता. पिता और दादा की शह पाकर जसवंत सैनी ने भी राजनीति शुरू की. साथ पकड़ा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का. कुछ दिनों तक फुटकर रोल्स निभाने के बाद संघ में ज़िम्मेदारी मिलनी शुरू हुई. सबसे पहले शाखा कार्यवाह और फिर मंडल कार्यवाह.

साल आया 1991. संघ वाली पारी ख़त्म. नाम जुड़ा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से. साल 1997 तक जसवंत सिंह सैनी ABVP में कभी तहसील प्रमुख तो कभी ज़िला प्रमुख के पदों पर रहे. कई रोल में काम किया. फिर ABVP से साथ छूटा साल 1997 में. और इस साल जसवंत सिंह सैनी को बनाया गया भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) का ज़िला महामंत्री. साल 2001 में बना दिया गया BJYM ज़िलाध्यक्ष. 

अब बारी थी बड़े प्रोफ़ाइल की. जूनियर संगठनों में रहने के बाद साल 2004 में जसवंत को बनाया गया भाजपा का ज़िला महामंत्री और 2005 में सहारनपुर ज़िलाध्यक्ष. इस समय तक जसवंत सैनी की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएँ शायद उफान पर थीं. लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी थी. साल 2009 में जसवंत सैनी सहारनपुर लोकसभा चुनाव लड़ गए. हार गए. लेकिन इस हार से पार्टी में उनके क़द में कोई कमी नहीं हुई. साल 2010 में जसवंत सैनी को बनाया गया संगठन का प्रदेश मंत्री. ये वही समय था जब भाजपा के नेतृत्त्व से लालकृष्ण आडवाणी की विदाई हो रही थी और नरेंद्र मोदी की बतौर प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार ब्रांडिंग हो रही थी. इस बदलती भाजपा में जसवंत सैनी की भी चुनाव लड़ने की इच्छा हुई. प्रदेश मंत्री पद से किनारा हुआ और जसवंत सैनी टिकटार्थियों की लाइन में लग गए. सहारनपुर लोकसभा का टिकट चाहिए था. नहीं मिला. लोकसभा चुनाव हुए. नरेंद्र मोदी PM बने और 4-5 महीने बाद जसवंत सैनी फिर से संगठन के प्रदेश मंत्री बना दिए गए.

साल 2016 तक प्रदेश मंत्री रहे. अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले थे. टीम बन रही थी. टीम में सैनी को ले लिया गया. उन्हें भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया गया. साल 2019 में इसी पिछड़ा आयोग में जसवंत उपाध्यक्ष बनकर आए. जब साल 2020 में फागू सिंह चौहान गवर्नर बनाकर बिहार रवाना किए गए, जसवंत सैनी कार्यकारी अध्यक्ष बनकर आए. फिर 2021 वाली नियुक्ति तो है ही सामने. संगठन के दूसरे नेता बताते हैं 2009 वाला पीरियड छोड़ दें तो जसवंत सैनी हमेशा संगठन के ही कार्यकर्ता रहे हैं. और 2022 में विधानसभा लड़ने की ख़्वाहिश है या नहीं, इस पर जसवंत सैनी लल्लनटॉप से कहते हैं, “जो होगा, पता चल ही जाएगा.”


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