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'काश! उसने अम्मा की सुन ली होती'

शादी लड्डू मोतीचूर - 8 (आजू सुहाग के रात)

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28 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 28 दिसंबर 2018, 12:07 PM IST)
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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल 'बिदेसिया फोरम' नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी 'शादी लड्डू मोतीचूर' लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसका आठवां भाग -

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 - दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 - दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 - हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 - सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5 - ये तो आंखें हैं किसी की... पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6 - डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7 - घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी



भाग 8 - तुम देना साथ मेरा ओ हमनवा

चन्दर ने देखा पूनम की रुलाई का सुर सिसकियों की लय में बंधता जा रहा है. ये सुर में रोने का मतलब वो बचपन से अब तक  समझ नही पाया. रुदन अक्सर गेय क्यों हो जाता है? उसे याद आई गांव में विदाई के समय बुआओं, भाभियों और बहनों द्वारा रोई गई धुनें... हां नितांत अलग-अलग धुन... सबका अलग स्वर... अपना आरोह-अवरोह... बेटी के गले से लिपट कर हर कंठ एक अलग सुर पकड़ लेता. तब वो बच्चा था तो खूब हंसता था. दादी की आंखें कैसी लाल-लाल हो जाती थीं रोते समय. और क्या पिपहिरी जैसी रुलाई निकलती थी छोटकी चाची के गले से. बड़की अम्मा तो मोटी आवाज़ में ऐसा भोंय-भोंय करके रोती कि लगता ही नहीं कि उन्हीं के गले से आवाज़ निकल रही है. सबसे मज़ेदार तो बतासा फुआ रोती थीं. आंखों में आंसू का एक कतरा भी नहीं पर रोते-रोते पूरी कथा बांच के रख देतीं -
बबी हो बबी.. हमार कपरवा में तेलवा के लगाई ए बबी sss..रतिया के गोड़वा के दबाई ए बबी ssss.
चन्दर अब जानता है कि रुदन तो आत्मा के झंकृत होने का ही कारुणिक स्वर है. आज इतने सालों बाद भी, गांवों में बेटियां विदाई के समय ऐसे ही बिलख कर रोती हैं. शहरी लड़कियों की तरह उन्हें मेकअप खराब होने की चिंता नहीं होती. ना ही विदाई के समय कैसे रोएं का पंद्रह दिनी कोर्स करने की आवश्यकता है. उसे मझली फुआ का गाया वो गीत याद आने लगा जिसे जब-जब वो गातीं, उनकी आंखें झरने लगती -
'झहरेला हो बेटी बेली के फुलवा
रोवे लगली काने लगली, बेटी हो कवन बेटी
छूटल जाला हो हमरा बाबा के नगरिया
झहरेला हो बेटी बेली के फुलवा'
गांव का सीवान पीछे छूट जाने के बाद पूनम कुछ शांत हुई. चन्दर ने माहौल हल्का करने के लिए मोबाइल पर उसका पसंदीदा गाना लगा दिया -
जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए,तुम देना साथ मेरा ओ हमनवा.
पूनम ने कनखियों से उसे देखा और मुस्कुरा पड़ी. वो दोनों कुल जमा दो ही दिन तो  साथ मे रहे थे. शादी के बाद  रस्मों को निबाहते मियां-बीवी ने आंख भर एक दूसरे को देखा भी नही था कि नौकरी की मज़बूरी ने चंदर को दिल्ली जल्दी बुला लिया था. ससुराल में पूनम क़रीब आठ महीनों तक घर के क़ायदे-कानून, तहज़ीब और मिज़ाज को भांपती-समझती और सीखती रही. दोंगे की रस्म के बाद वापस ससुराल जा रही पूनम का गृहस्थ जीवन में असली प्रवेश तो तब होगा जब चन्दर के साथ वो दो दिनों बाद दिल्ली जाएगी.
पर्स के शीशे में अपना चेहरा निहारती पूनम रोने से बह आई काजल की लकीर ठीक करती हुई मंत्रमुग्ध निहारते चन्दर को अनदेखा करने की कोशिश कर रही थी. पर गालों की गहराती लाली उसके शर्म को बेपर्दा कर रही थी. रास्ता खुशगवार हुआ जाता था और मंज़िल पर पहुंचने की जल्दी दोनों को न थी.
गांव आते ही चन्दर संभल कर बैठ गया. दूर से ही पीली कोठी दिख रही थी. पूनम ने जल्दी से ब्याह वाली चुनर माथे पर रखी और हाथ भर लंबा घूंघट कर लिया. लोहे के भारी गेट के खुलने की आवाज़ आई और देखते ही देखते ननदों-देवरों ने गाड़ी को घेर लिया. हंसती खिलखिलाती शादीशुदा और कुंवारी ननदों ने भावज को अंकवारी में ले लिया. किसी ने पर्स पकड़ा तो किसी ने भारी चूनर को सम्भाला. घूंघट में कुछ दिख तो रहा नहीं था. उन्हीं लोगों के सहारे धीरे-धीरे पग बढ़ाती पूनम आंगन की ओर बढ़ ही रही थी कि उसने सुना -
बनारसी नहीं है!
दूसरी ओर से एक तीव्र नाटकीय स्वर सुनाई पड़ा -
बनारसी में विदाई नहीं की?
पूनम रुआंसी हो उठी. वह बताना चाहती थी कि उसी ने बनारसी साड़ी के लिए मना किया था. इक्का-दुक्का शादियों में पहन कर बक्से में रखने के अलावा बनारसी साड़ियों का भला इस्तेमाल ही क्या होता है? अब ऐसी साड़ियां तो फैशन में भी नहीं रहीं. वह कुछ बोल न सकी. अम्मा ने कितना कहा था -
गौना और दोंगे में बनारसी पर ही विदाई होती है बिटिया!
काश! उसने अम्मा की सुन ली होती.
ननदों की चुहलबाजियों से नवकी भौजी के कमरे की दीवारें हंस रही थीं. अंतरंग मज़ाकों पर उसकी आंखें झुक जातीं और कपोल रक्तवर्णी हो जाते पर ननदें मानतीं ही नहीं. एक शादीशुदा ननद ने अपना गुलगोथना बच्चा उसकी गोद मे डालते हुए कहा -
ऐसा है भाभी, अब छोटे चन्दर को बुलाने की तैयारी में लग जाओ.
दो बड़ी थालियां भर कर भाभी के लिए खाना लाती छोटी ननद ने मुस्कुराते हुए कहा -
थोड़ा खा-पी भी लेने दो भाभी को...तब तो.
एक बार फिर कमरा ठहाकों से गूंज उठा. ननद ने भारी चूनर सिर से उतारा और साड़ी के पल्लू को माथे पर जमाती भाभी को खाने की ओर इशारा किया. दाल भरी बड़ी-बड़ी पूरियां, आलू-परवल की रसेदार तरकारी, कढ़ी, सतमेझरा का साग, रसियाव(गुड़ में पगी खीर), कोहड़े की सब्ज़ी, साथ मे तली तिलौरियां और दाल की कचरी. मछली सहित शुभ-साइत पर ये चीज़ें ज़रूर बनती हैं.
वो खा ही रही थी कि सासुओं की झुण्ड ने कमरे में प्रवेश किया. वो हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई.
अरे खाना ख़त्म तो कर लो दुलहिन...
- सबने कितना कहा पर वह शर्म से सर झुकाए खड़ी रही. झुकी आंखों वाली ये बहुरिया सबको पसंद थी. बार-बार बैठने को कहने के बावजूद पूनम सास लोगों के बराबर पलंग या सोफे पर नहीं बैठी. बड़ी ननद ने मुस्कुराते हुए एक छोटा मोढ़ा लाकर कमरे में रखा -
लो भाभी, इसपर तो बैठ सकती हो न!
लजाई-सकुचाई पूनम सिमटती हुई बैठ गई. सास लोग उसे सर से पैर तक देखती मायके का हाल-चाल लेती रहीं. आशीषों से उसका आंचल भरा और बलैया ली. दादी ने कदमों पर झुकी पूनम के माथे पर स्नेह भरा हाथ रख कर पोपले मुंह से आशीर्वादों की झड़ी लगा दी -
मांग-कोख अचल रहे, धन-वंश के बढोत्तरी हो, अर्धवाय-एहवात बनल रहो.
दूर तक फैले इस घर-आंगन में गुसलखाना भी बड़ी दूर एक कोने में था. ननद के साथ आंगन में जाती पूनम ने अंधेरे में थोड़ा सा घूंघट सरकाया. बरसात से धुले बहुत बड़े आंगन में चांदनी पसरी हुई थी. चार आंगन वाले इस बड़े से घर को अभी ढंग से देखा भी नहीं था उसने. लौटते वक्त उसे उसके कमरे के पास पहुंचा कर ननद चली गई. पूनम कमरे में जाने ही वाली थी कि बगल के कमरे से आ रही धीमी आवाज़ों ने उसके कदम रोक लिए -
आज तक किसी बहुरिया का विदाई बिन बनारसी नहीं हुआ है. ऊपर से सिर्फ एगो झुमका पहना के भेज दिया है सब दोंगा में. बाकी सब तो जो वो पहनी है वो सब बियाह के समय का ही गहना है. अजीत-बहु तो दोंगा में भी पतला हार का सेट पहीन के आई थी. अजीत की माई कैसे हंस-हंस के देख रही थी दुलहिन को. हम लोग आठ दउरा मिठाई-चूड़ा दिए तो इनलोगों को कम से कम सोलह दउरा देना चाहिए था न! यही न नियम है? दोंगा कवनो बेर-बेर होगा? एके बार न होता है. कैसे भी व्यवस्था कर के बेटी को ढंग से भेजता सब! अरे अभी तैयारी नहीं था तो हम दू-तीन महीना बाद का दिन रख लेते. अइसे आधा-अधूरा तैयारी के साथ तो बेटी को नहीं भेजता सब..!!
पूनम धीरे से कमरे में आ गई. उसकी सांसें भारी हो गईं थीं. वो रोना चाहती थी. उसे बाबूजी याद आ गए जिसे उसने खेत बेच कर काठ वाली अलमारी में रुपये रखते देखा था इसी दोंगे के लिए. उसे अपने हाथों झुमके पहनाती छोटी बहन याद आ गई जिसकी शादी अभी होनी थी. अम्मा याद आई और याद आया अपना घर. अब उसके रुदन में कोई आवाज़ नहीं थी.... एक गोला सा गले में अटका पड़ा था... बस.
उधर इन सब बातों से अनजान चन्दर विवाहोपरांत इस प्रथम रात्रि के स्वप्नों में खोया था. कमरे में प्रवेश करके उसने इधर-उधर की बातें करनी शुरू की. एक ही सांस में हज़ार बातें फ़ोन पर करने वाली पूनम मौन थी. उसने बार-बार पूछा
अरे! इतनी शांत क्यों बैठी हो?
पर पूनम का मौन न टूटा. थक हार कर पूनम की ठुड्डी ऊपर उठाते चन्दर ने जैसे ही उसकी आंखों मे देखा, वो हैरान रह गया. पूनम की आंखें लाल थीं. गंगा-जमुना निःशब्द बही जा रही थीं. वो घबरा उठा -
अरे, क्या हुआ?क्यों रो रही हो? कुछ तो बोलो..किसी ने कुछ कहा क्या?
पर पूनम ने कुछ न कहा. उसने अपनी अम्मा को देखा था हर बात चुपचाप सीने में कैद करते. दुख के आवेग को होंठों पर आने से पहले ही आंखों में बंद करते..
ससुराल में जुबान पर ताला लगा कर रखना बिटिया, तेरी हर एक चुप्पी नइहर और ससुराल दोनों कुलों की मर्यादा को बचा कर रखेगी...
चन्दर ने समझा पूनम को घर की याद आ रही है. उसने पूनम की हथेली पर अपना हाथ रख उसे संबल देने का प्रयास किया.
लालटेन की कम होकर बुझ चुकी लौ को देखती पूनम ने भींगी आंखें उठा कर खिड़की से आकाश में तैरते चाँद को देखा... कभी रेडियो में सुना ये गीत याद आ गया-
आजू सुहाग के रात,चंदा तू ही उगीहs
चंदा तू ही उगीहs हो,सुरूज मत उगीहs हो
आजू सुहाग के रात,चंदा तू ही उगीहs



…टू बी कंटीन्यूड!


Video देखें:

एक कविता रोज़: अज्ञेय की कविता 'चीनी चाय पीते हुए'

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