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ये पीने वाला पानी खरीद के आता है? यहां पानी बेचा जाता है?

...पर ये दिल्ली थी. गांव नहीं.

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1 मार्च 2019 (अपडेटेड: 1 मार्च 2019, 01:35 PM IST)
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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं.  उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल 'बिदेसिया फोरम' नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी 'शादी लड्डू मोतीचूर' लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसकी ग्यारहवीं किस्त- -

Shadi Laddu Motichoor - Banner

भाग 1 - दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 - दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 - हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 - सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5 - ये तो आंखें हैं किसी की... पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6 - डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7 - घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी

भाग 8 - काश! उसने अम्मा की सुन ली होती

भाग 9 - औरतों को मायके से मिले एक चम्मच से भी लगाव होता है

भाग 10सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर इतना साहस नहीं था कि होस्टल की बाउंडरी पार कर सके



भाग 11 - दिल्ली में पूनम

दिल्ली की सड़कें एक पिता सदृश अपनी बाहें फैलाए उनकी राहों में खड़ी थीं. पूनम तो इन लंबी-चौड़ी सड़कों की खूबसूरती में ही खो गई. लगातार स्ट्रीट लाइट्स की कतारें और कहीं-कहीं डिवाइडर पर लगे पेड़-पौधे देख वो विस्मित थी. वो सोच रही थी हमारे गांव में तो शाम होते ही सड़कें भूत-प्रेतों की कहानियों के लिए सॉलिड प्लॉट बन जाती हैं. यहां की सड़कें तो रात में इंद्रलोक का मायाजाल बन जाती होंगी.
ट्रेन ने आते-आते बहुत विलंब कर दिया था. ऊपर से जाम ही जाम. घर पहुंचते-पहुंचते तो दुपहरिया हो आई. ऑटो ने चौड़ी सड़कों को छोड़ अब गली में उतरना शुरू किया और साथ ही साथ पूनम की आंखें आश्चर्य से फैलने लगीं. एक की छाती पर चढ़ा दूसरा घर. एक की बालकनी में घुसती दूसरी बालकनी. पूनम हैरान रह गई. आख़िर एक घर के सामने ऑटो रुका. चन्दर ने पहले खुद पर लदे एक बड़े थैले को ज़ोर लगाकर घर की सीढ़ी की ओर उछाला और फिर अपनी एक टांग ऑटो से बाहर निकाली. उसके बाद चावल के बड़े बोरे को निकाला और तब दूसरी टांग को बाहर निकलने का मौका मिला. इस जद्दोजहद में उसकी सांस फूल गई. बाहर निकल सबसे पहले उसी बोरे पर बैठकर उसने पहले तो अपनी सांसे बहाल कीं फिर ऑटो वाले से सामान निकालने में मदद की गुहार लगाई. ऑटोवाला तैयार तो हो गया पर कुछ पेशगी बढाने की शर्त पर. पूनम को अपना गांव याद आ गया. अगर बहु-बेटियां ससुराल आ-जा रही हों तो हर घर की लड़कियां यूं ही गाड़ी के पास आकर खड़ी हो जातीं. कोई भाभी की चूनर सम्भालती तो कोई उसके बच्चे को थाम लेती. सामान चढ़ाने-उतरवाने में तो कोई भी हाथ लगवा देता. पर ये दिल्ली थी.
खैर, एकदम सीधी खड़ी अनगिनत सीढ़ियों को देख पूनम ने चढ़ाई से पहले ढेर सारा ऑक्सीजन अपने फेफड़ों में भरा. चन्दर ने सबसे ऊपरी मंज़िल पर टू रूम सेटअप किराए पर ले रखा था. ऑटो वाले ने सारे सामान वहीं छत पर पटके और भागने को हुआ. आधी खुली छत थी जहां दो कुर्सियां धूप-बारिश और सारे मौसमों के रंग देखती बूढ़ी हो रही थीं. वहीं एक गमला था जिसकी सूखी डाली से लगी छोटी लाल चुनरी ये बता रही थी कि ये तुलसीजी हैं.
चन्दर ने ताला खोला और खुलते दरवाज़े के साथ ही खांसी की तेज लहर उस पर सवार हो गई. पिछले कुछ दिनों से बंद कमरे विद्रोह पर उतारू हो गए थे. अंदर के दमघोंटू वातावरण ने चन्दर को वापस छत पर ठेल दिया. उसने हंसते हुए पूनम से कहा-
बहुत दिनों से बंद है न,तो बदबू सी आ रही है कमरे से...चलो, तुम अंदर तो आओ.
कमरे में घुसते ही पूनम को दुआर पर बने अपने घारी की याद आ गई. घारी यानी एक तरह का स्टोर जहां दो मचानों पर एक तरफ आलू तो दूसरी तरफ प्याज़ की परतें बिछाई गईं थीं. पूनम ने पूरे फ्लैट पर सरसरी निगाह दौड़ाई. एक डबल बेड पर तमाम कपड़े पड़े हुए थे. दूसरे कमरे में सिर्फ एक फोल्डिंग बेड था जिसपर किताबें ही किताबे थीं. किचन की हालत तो कुछ यूं थी मानो बर्तन सदियों से किसी के स्पर्श को तरस कर रह गए हों. बेड के नीचे अखबारों के बंडल पड़े हुए थे और चप्पलों ने सोफ़े के नीचे का जगह घेर रखा था. पूनम फ्लैट के बीचों-बीच खड़ी ये सोच रही थी कि वो कहां से शुरुआत करे.
अचानक उसे लगा उसे बड़े जोरों की प्यास लगी है. उसने किचन में जाकर नल खोला पर पानी नदारद था. चन्दर ने कहा-
पानी नहीं आ रहा? रुको, नीचे आंटी को मोटर चलाने को कहकर आते हैं. वैसे, नल का पानी मत पीना. बहुत बेकार होता है.बीमार हो जाओगी. अभी पानी वाले को फ़ोन करते हैं.
पूनम वहीं सोफे पर कुछ जगह बना कर बैठ गई. ये सब उसके लिए बड़ा अजीब था. तभी धम-धम करता बड़े से बीस लीटर वाले कैन को कंधे पर टांगे एक लड़का आया- 'बड़े दिनों बाद याद किया भैया. घर गए थे क्या?' चन्दर ने पच्चीस रुपये उसकी ओर बढाते हुए कहा- 'हां यार, बस अभी -अभी तो आ रहा हूं.' लड़के ने पैसे जेब के हवाले करते हुए कहा- 'भैया आपके पचास रुपये अभी बाकी हैं. कोई ना, कल दे देना.'
चन्दर को पानी खरीदते देख पूनम पर तो जैसे घड़ों पानी पड़ गया. आंखों में आश्चर्य का सागर लहराते उसने चन्दर से पूछा- 'ये पीने वाला पानी खरीद के आता है? यहां पानी बेचा जाता है?' चन्दर ने हंसते हुए उसके कंधों पर हाथ रखा और आंखों में झांकते हुए कहा- 'जी मैडम.'
आश्चर्यचकित पूनम ने कमर पर हाथ रखा और रसोई का रुख किया. यही से काम की शुरुआत करना सही होगा. खाली बोतलों से रसोई भरी हुई थी. कुछ सिग्रेट की डिब्बियां भी उधर ही पड़ी हुई थीं. उसका कलेजा धक से रह गया. उसने इन सारे खाली बोतलों को एक बोरे में ठूंसा और जानबूझ के चन्दर के सामने से गुज़री. चन्दर ने जल्दी से कहा- 'अरे रुको रुको, कहीं तुम ये तो नहीं समझ रही न कि मैं ये सब...'
पूनम ने कोई जवाब न देकर आंखें चुरा लिया. चन्दर ने कहा-
पूनम,ये दिल्ली है. यहां के लिए ये चीज़ें उतनी ही नॉर्मल हैं जितनी हमारे यहां भांग का गिलास. पर मैं नहीं पीता. ये तो मेरे दोस्तों का काम है. यकीन करो!
पूनम ने कुछ कहा नहीं पर दिल चन्दर की बातों को सुन हल्का-फुल्का तो हो ही गया. वो जानती थी कि दिल्ली जैसी जगहों पर पीना आम बात है पर वो जिस जगह से आई थी उस परिवार की घुट्टी में था कि पीना अपराध है. चन्दर ने कहा-
अच्छा सुनो, मैं यूं गया और यूं आया दूध ले के. अभी अपने हाथ की स्पेशल चाय पिलाता हूं तुम्हें.
पूनम मुस्कुरा उठी. चन्दर सेकंडों में उसके सामने दुबारा मौजूद था. पर रसोई में जाते ही शीघ्र पता चल गया कि गैस भी असहयोग पर उतारू है. अब इधर गैस भरवाने सिलेंडर को लुढ़काता जाता चन्दर है तो उधर कमर में साड़ी का पल्लू खोंसे धूल में नहाई पूनम है. पूरे घर में गंदगी का साम्राज्य था. न जाने कितने गंदे कपड़े यूं ही पड़े थे जिनका कोई इस्तेमाल न था. छत के एक कोने में पूनम ने इन रद्दी सामानों का ढेर खड़ा कर दिया. किताबों को अलमारी में करीने से लगाया. पूरे घर को धो-पोंछ के चमकाने के चक्कर मे पूनम निढाल हो चुकी थी.
बाथरूम देख उसके रोंगटे खड़े हो गए. कहां गांव में सोने वाले कमरों से बहुत दूर दक्षिण कोने में गुसलखाने हुआ करते हैं और कहां यहां बेडरूम से अटैच बाथरूम. उसका मन न मान रहा था पर किसी तरह जल्दी-जल्दी नहाने के बाद उसने पूरे घर को अगरबत्ती की खुशबू से महका दिया. अब घर, घर लग रहा था. और अब, अपना घर और ज़्यादा याद आ रहा था. उसे इस कमरे में घुटन हो रही थी. उसका मन हो रहा था वो दरवाज़े को खोल दे. कुछ तो ताज़ी हवा अंदर आए पर ये दिल्ली थी. उसका गांव नहीं.
देखते ही देखते रात घिर आई. गैस भरवाने गए चन्दर ने इतना दिमाग लगाया कि वो खाना बाहर से लेकर आया. घर को देख एकबारगी चन्दर को विश्वास ही नहीं हुआ कि ये वही घर है. उसने खाने की थैली पूनम को पकड़ाई और नहाने चला. थोड़ी देर बाद चन्दर बाहर आकर देखता है कि पूनम सो चुकी है! वो कुछ देर उसे देखता रहा और फिर खुद भी एक तरफ बैठ गया. एक तो सफर की थकान, दूजा दिन भर की जी तोड़ मेहनत. वो दोनों इतना थक गए कि बिन खाए-पिए ही न जाने कब एक दूसरे की ओर पीठ कर सो गए.
होना तो ये था कि अपने छोटे से घोंसले में पहली बार मिले इन दोनों पंछियों को अपने हाथों एक दूजे को हर कौर खिलाना था. होना तो ये था कि साल भर इंतज़ार के बाद मिले ये प्रेमी-युगल एक दूजे में खोकर रह जाते. लेकिन इन निःशब्द लम्हों को तो इस खामोश रात की बलि चढ़नी थी. न जाने कब से जिस अनमोल घड़ी के आने का इंतज़ार तरंगित हृदयों से किया था, उस पल में ये पति-पत्नी यूं बेसुध सोए हुए थे जैसे दो थके-हारे अजनबी किसी सराय में पड़े हो.


…टू बी कंटीन्यूड!


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