जहां गांधी की झोपड़ी के बगल में दो टूटे चरखे एक दूसरे को घूरते हैं
क्या आप जानते हैं कि गांधी जी के घर का बिल कौन भरता है आज?
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दांडी में नमक सत्याग्रह के बाद गांधी जी कराड़ी गए थे. जहां वो रुके थे, उस झोंपड़ी के बगल में आज एक हॉल बस है जिसमें दो टूटे चरखों के अलावा कुछ नहीं है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
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नवसारी. कई ऐतिहासिक बातें इससे जुड़ी हुई हैं. जमशेदजी टाटा और दादाभाई नौरोजी की पैदाइश का शहर. दांडी भी नवसारी में आता है. जहां महात्मा गांधी ने दांडी मार्च यानी नमक सत्याग्रह किया था.
12 मार्च, 1930 को महात्मा गांधी अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से एक जत्थे के साथ चले. 24 दिन बाद 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुंचे. नमक उठाया. नमक पर अंग्रेजों के टैक्स के खिलाफ आंदोलन था ये. महात्मा गांधी इसके बाद कुछ दिन वहीं रुके. दाऊदी बोहरा धर्मगुरु के घर में. जिसका नाम सैफी विला है.
काफी बाद में जवाहरलाल नेहरू वहां गए और उस घर के मालिक ने उसे नेशनल हेरिटेज मानकर देश को दे दिया. लेकिन देश ने क्या किया?

सैफी विला, जहां गांधी जी नमक सत्याग्रह के बाद रुके थे. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
दांडी में उस घर की देख-भाल रमणभाई करते हैं. रमणभाई को इस काम के लिए कहीं से कोई पैसा नहीं मिलता है. पुराने पड़ चुके इस घर का एक बार पूरा हुलिया बदल दिया गया. बाद में सोचा गया कि उसे उसके पुराने स्वरूप में वापस लाया जाए. उसे ASI को दिया गया. ASI ने 3 साल तक रेनोवेशन का काम किया, फिर से उसे गुजरात सरकार को दे दिया. जब तक वो जगह ASI के पास थी, ASI रमण भाई को देख-रेख के लिए पैसे देती थी. फिर ASI ने रमण भाई को आखिरी सैलरी देते हुए बताया कि वो इसे हैंडओवर कर रहे हैं.
रमण भाई को पता भी नहीं कि ये प्रॉपर्टी अब किसके पास है और कैसे क्या हुआ. उनके पास ASI के किन्हीं जौहरी साहब का फोन नंबर था. मैंने जौहरी साहब को फोन किया और उन्होंने पूरा मामला बताते हुए कहा कि अब ये प्रॉपर्टी गुजरात सरकार के माहिती विभाग यानी इन्फॉर्मेशन डिपार्टमेंट के पास है.
Video: दांडी में ऐतिहासिक जगह की ऐसी बेकद्री
इस वक्त इस घर का प्लास्टर जगह-जगह से उधड़ रहा है. छत की खपरैलें टूट रही हैं. लेकिन रमण भाई से जितना हो सकता है, वो करते हैं. रमण भाई ने एक बात और बताई. इस ऐतिहासिक जगह का कई सालों का बिजली का बिल बकाया था. फिर कोई आया, उन्हें पता चला, उन्होंने पिछला सारा बकाया बिल भर दिया और अभी भी भरते हैं. उन्होंने रमण भाई से कह रखा है कि वो उनका नाम किसी को न बताएं.
दांडी से 6 किलोमीटर दूर पड़ता है कराड़ी गांव. दांडी से महात्मा गांधी यहां आए थे और करीब 20-25 दिन यहां एक झोपड़ी में रहे. फिर अंग्रेजों की पुलिस उन्हें यहीं से गिरफ्तार करके ले गई थी. झोपड़ी के नाम पर किसी तरह से केवल पत्ते रखे हुए हैं. बगल में बड़ी सी बिल्डिंग है, जिसमें केवल एक बड़ा सा हॉल है. उसमें दो टूटे चरखे पड़े हैं. चारों तरफ कबूतर की बीट. कोई आदमी नहीं, जिससे कुछ पूछा जा सके वहां के बारे में.

गांधी के नाम पर करोड़ों फूंकने वाली सरकार कराड़ी में गांधी जी की झोंपड़ी के बगल में बने हॉल से कबूतर की बीट नहीं हटवा पा रही है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
ज्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि दांडी और कराड़ी साढ़े तीन साल पहले मुझे इसी हालत में मिले थे. ये तब है, जब अहमदाबाद से दांडी के बीच गांधी जी जिन 24 जगहों पर रुके थे, सरकार वहां मेमोरियल बनवा रही है और अलग से निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं. लेकिन जो पहले से है, जो चीजें वास्तविक रूप से जुड़ी रही हैं, उनकी कोई कद्र नहीं है.
नवसारी में लुंसीकुई के पास बैठे बुजुर्ग भाजपा की बहुत तारीफ करते हैं. कहते हैं कि भाजपा ने बहुत काम किया है. पहले के कांग्रेस शासन को कोसते हैं कि कभी भी कहीं भी कर्फ्यू लग जाता था. लाइव खत्म होने के बाद एक नौजवान ने आकर कहा कि ये जगह बहुत पॉश है. यहां के लोगों को कोई दिक्कत महसूस नहीं होगी. उसने कुछ दूसरे इलाकों के नाम बताते हुए कहा कि उन इलाकों में आपको अलग बात मिलेगी.
Video: गांधी जी से जुड़ी ऐतिहासिक जगह पर टूटा चरखा, कबूतर की बीट
कोई भी शहर ऐसा ही होता है. कुछ पॉश इलाका, कुछ दोयम दर्जे का. कुछ की सोच ये, तो कुछ की सोच वो.
लेकिन बीजेपी के पीयूषभाई की पकड़ अच्छी दिखती है. लोग उन्हें जानते हैं, मानते हैं. उनके सामने कांग्रेस की भावनाबेन को बहुत से लोग जानते-पहचानते तक नहीं. यहां राहुल गांधी की रैली हुई थी, जिसके बाद कांग्रेस के पक्ष में कुछ माहौल बना था, लेकिन रैली काफी पहले हो गई थी. राहुल की रैली के एक महीने बाद पीएम मोदी की रैली हुई और सब बराबर हुआ बताया गया.
राजनीति है, कोई न कोई जीतता-हारता रहता है. लेकिन दांडी, कराडी जैसी जगहों की ऐसी हालत बता देती है कि गांधी का बात-बात में जिक्र करने वाली सरकारों, राजनीतिक पार्टियों की ऐतिहासिक विरासत को लेकर नीयत क्या है.
गुजरात चुनाव-2017 की लल्लनटॉप कवरेजः
ग्राउंड रिपोर्ट वलसाडः वो जगह जहां से जीतने वाली पार्टी की गुजरात में सरकार बनती है
गुजरात के वो तीन ज़िले जहां ‘विकास’ इसलिए नहीं गया कि मोबाइल नेटवर्क नहीं पकड़ता
गुजरात का वो गांव जो सरकार की नाकामी के कारण आत्मदाह करने वाला है
जिन कारीगरों ने मोदी और शी जिनपिंग के बैठने के लिए झूला तैयार किया था उनके साथ बहुत बुरा हुआ
क्या गोधरा कांड की शुरुआत एक स्टेशन पहले हो गई थी?
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चीतल डायरीज़ः ‘अमूल’ की कामयाबी के कसीदों में खेड़ा-आणंद इलाके की ये सच्चाई छुप जाती है
Video: राजकोट के गौंडल को आज़ादी के पहले के दिन क्यों याद आ रहे हैं
12 मार्च, 1930 को महात्मा गांधी अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से एक जत्थे के साथ चले. 24 दिन बाद 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुंचे. नमक उठाया. नमक पर अंग्रेजों के टैक्स के खिलाफ आंदोलन था ये. महात्मा गांधी इसके बाद कुछ दिन वहीं रुके. दाऊदी बोहरा धर्मगुरु के घर में. जिसका नाम सैफी विला है.
काफी बाद में जवाहरलाल नेहरू वहां गए और उस घर के मालिक ने उसे नेशनल हेरिटेज मानकर देश को दे दिया. लेकिन देश ने क्या किया?

सैफी विला, जहां गांधी जी नमक सत्याग्रह के बाद रुके थे. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
दांडी में उस घर की देख-भाल रमणभाई करते हैं. रमणभाई को इस काम के लिए कहीं से कोई पैसा नहीं मिलता है. पुराने पड़ चुके इस घर का एक बार पूरा हुलिया बदल दिया गया. बाद में सोचा गया कि उसे उसके पुराने स्वरूप में वापस लाया जाए. उसे ASI को दिया गया. ASI ने 3 साल तक रेनोवेशन का काम किया, फिर से उसे गुजरात सरकार को दे दिया. जब तक वो जगह ASI के पास थी, ASI रमण भाई को देख-रेख के लिए पैसे देती थी. फिर ASI ने रमण भाई को आखिरी सैलरी देते हुए बताया कि वो इसे हैंडओवर कर रहे हैं.
रमण भाई को पता भी नहीं कि ये प्रॉपर्टी अब किसके पास है और कैसे क्या हुआ. उनके पास ASI के किन्हीं जौहरी साहब का फोन नंबर था. मैंने जौहरी साहब को फोन किया और उन्होंने पूरा मामला बताते हुए कहा कि अब ये प्रॉपर्टी गुजरात सरकार के माहिती विभाग यानी इन्फॉर्मेशन डिपार्टमेंट के पास है.
Video: दांडी में ऐतिहासिक जगह की ऐसी बेकद्री
इस वक्त इस घर का प्लास्टर जगह-जगह से उधड़ रहा है. छत की खपरैलें टूट रही हैं. लेकिन रमण भाई से जितना हो सकता है, वो करते हैं. रमण भाई ने एक बात और बताई. इस ऐतिहासिक जगह का कई सालों का बिजली का बिल बकाया था. फिर कोई आया, उन्हें पता चला, उन्होंने पिछला सारा बकाया बिल भर दिया और अभी भी भरते हैं. उन्होंने रमण भाई से कह रखा है कि वो उनका नाम किसी को न बताएं.
दांडी से 6 किलोमीटर दूर पड़ता है कराड़ी गांव. दांडी से महात्मा गांधी यहां आए थे और करीब 20-25 दिन यहां एक झोपड़ी में रहे. फिर अंग्रेजों की पुलिस उन्हें यहीं से गिरफ्तार करके ले गई थी. झोपड़ी के नाम पर किसी तरह से केवल पत्ते रखे हुए हैं. बगल में बड़ी सी बिल्डिंग है, जिसमें केवल एक बड़ा सा हॉल है. उसमें दो टूटे चरखे पड़े हैं. चारों तरफ कबूतर की बीट. कोई आदमी नहीं, जिससे कुछ पूछा जा सके वहां के बारे में.

गांधी के नाम पर करोड़ों फूंकने वाली सरकार कराड़ी में गांधी जी की झोंपड़ी के बगल में बने हॉल से कबूतर की बीट नहीं हटवा पा रही है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
ज्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि दांडी और कराड़ी साढ़े तीन साल पहले मुझे इसी हालत में मिले थे. ये तब है, जब अहमदाबाद से दांडी के बीच गांधी जी जिन 24 जगहों पर रुके थे, सरकार वहां मेमोरियल बनवा रही है और अलग से निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं. लेकिन जो पहले से है, जो चीजें वास्तविक रूप से जुड़ी रही हैं, उनकी कोई कद्र नहीं है.
नवसारी में लुंसीकुई के पास बैठे बुजुर्ग भाजपा की बहुत तारीफ करते हैं. कहते हैं कि भाजपा ने बहुत काम किया है. पहले के कांग्रेस शासन को कोसते हैं कि कभी भी कहीं भी कर्फ्यू लग जाता था. लाइव खत्म होने के बाद एक नौजवान ने आकर कहा कि ये जगह बहुत पॉश है. यहां के लोगों को कोई दिक्कत महसूस नहीं होगी. उसने कुछ दूसरे इलाकों के नाम बताते हुए कहा कि उन इलाकों में आपको अलग बात मिलेगी.
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कोई भी शहर ऐसा ही होता है. कुछ पॉश इलाका, कुछ दोयम दर्जे का. कुछ की सोच ये, तो कुछ की सोच वो.
लेकिन बीजेपी के पीयूषभाई की पकड़ अच्छी दिखती है. लोग उन्हें जानते हैं, मानते हैं. उनके सामने कांग्रेस की भावनाबेन को बहुत से लोग जानते-पहचानते तक नहीं. यहां राहुल गांधी की रैली हुई थी, जिसके बाद कांग्रेस के पक्ष में कुछ माहौल बना था, लेकिन रैली काफी पहले हो गई थी. राहुल की रैली के एक महीने बाद पीएम मोदी की रैली हुई और सब बराबर हुआ बताया गया.
राजनीति है, कोई न कोई जीतता-हारता रहता है. लेकिन दांडी, कराडी जैसी जगहों की ऐसी हालत बता देती है कि गांधी का बात-बात में जिक्र करने वाली सरकारों, राजनीतिक पार्टियों की ऐतिहासिक विरासत को लेकर नीयत क्या है.
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