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चीतल डायरीज़: जिन कारीगरों ने मोदी और शी जिनपिंग के बैठने के लिए झूला तैयार किया था उनके साथ बहुत बुरा हुआ

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12 सितंबर, 2014. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को लेने अहमदाबाद के हवाई अड्डे पहुंच गए. उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद यह किसी विदेशी नेता की पहली भारत यात्रा थी. मोदी विदेश नीति पर अपनी अलग छाप छोड़ना चाहते थे इसलिए दोनों नेताओं की मुलाकात दिल्ली के बजाय गांधी नगर की नर्मदा रिवर फ्रंट पर हो रही थी. दोनों नेता नर्मदा के किनारे झूला झूलते दिखाई दिए.

इसके ठीक तीन साल बाद चीन के पड़ोसी देश जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे का भारत आना हुआ. पिछले 70 दिन से डोकलाम में भारत और चीन के सैनिक हाथ में बन्दूक लिए एक-दूसरे पर पत्थरों से हमला कर रहे थे. चीन, जापान का पड़ोसी मुल्क है. दक्षिण चीन सागर में दोनों के ‘प्यार’ के बारे में हम सब जानते हैं. डोकलाम विवाद के वक्त जापानी प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के कई मायने थे. दोनों यात्रा में दो चीज एक जैसी थीं. पहली दोनों विदेशी नेता दिल्ली के बजाय अहमदाबाद आए थे. दूसरी का जिक्र थोड़ी देर बाद.

vinay cheetal diaries

चीतल दरअसल उमरकोट के राणा महेंद्र के तेज़ चाल वाले ऊंट का नाम था जिस पर बैठकर वो रेगिस्तान चीरते हुए,
रात को लौद्रवा (जैसलमेर) अपनी प्रेमिका मूमल से मिलने जाता था और सुबह होते-होते फिर उमरकोट (सिंध) लौट आता था.
उस चीतल ने न सिर्फ इस एपिक लव स्टोरी को विटनेस किया बल्कि जहां-जहां उसके पैर पड़े, वहां का समय
और कहानियां देखीं. चीतल डायरीज़ सीरीज़ के जरिए हम गुजरात से ऐसी कहानियां लेकर आ रहे हैं 
जो इस समय और काल में आप तक पहुंचनी चाहिए.

1990 के दशक का आखिरी हिस्सा केंद्र में सियासी उठा-पटक का गवाह रहा था. मंडल के जवाब में आए कमंडल के चलते विश्वनाथ प्रताप सिंह को सत्ता गंवानी पड़ी थी. चन्द्रशेखर जनता दल का एक धड़ा लेकर अलग हो गए. उन्होंने कांग्रेस से समर्थन लिया और अपनी सरकार बनाने में कामयाब रहे. 6 मार्च 1991 के रोज चन्द्रशेखर ने नाटकीय अंदाज़ में लोकसभा में अपने इस्तीफे का एेलान कर दिया. गुजरात में उस समय चिमनभाई जनता दल और कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार चला रहे थे. उन्होंने रातों-रात जनता दल (गुजरात) का विलय कांग्रेस में करवा दिया और दो साल में तीसरी मर्तबा अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे. इस पूरे घटनाक्रम का जिक्र करते हुए उस समय इंडिया टुडे में चिमनभाई के बारे में एक लेख छपा था. इसका शीर्षक था, “ए स्किलफुल सर्वाइवर”. चिमनभाई का इससे बेहतर परिचय नहीं हो सकता. वो गुजरात की राजनीति सबसे बड़े खिलाड़ी थे.

गुजरात के मुख्यमंत्री रहे चिमनभाई पटेल संखेडा के एक गांव चकोदरा से आते थे. 
गुजरात के मुख्यमंत्री रहे चिमनभाई पटेल संखेडा के एक गांव चकोदरा से आते थे.

गुजरात में एक जिला है छोटा उदयपुर. आजादी के पहले यह रेवाकांठा एजेंसी का हिस्सा था. ‘रेवा’ नर्मदा का पुराना नाम है. कांठा का मतलब होता है किनारा. मालवा की पहाड़ी से तापी नदी के बीच पड़ने वाले 60 से ज्यादा छोटे-मोटे रजवाड़ों को अंग्रेजों ने सामूहिक रूप से रेवाकांठा बुलाना शुरू किया. 2013 तक यह जिला वडोदरा का हिस्सा था. इसके बाद इसे अलग जिला बना दिया गया. छोटा उदयपुर और वडोदरा की सीमा पर ओरसंग नदी के किनारे बसा हुआ एक कस्बा है संखेडा. गुजरात की राजनीति में सरकार बनाने और गिराने के खेल में माहिर सबसे बड़े खिलाड़ी इसी तहसील के गांव चकोदरा में पैदा हुए थे. कमाल बात यह है कि संखेडा आज चिमनभाई पटेल की वजह से नहीं पहचाना जाता. वो पहचाना जाता है अपने ‘गोल्डन फर्नीचर’ की वजह से. ऊपर शिंजो आबे और शी जिनपिंग के भारत दौरे में दो कॉमन बातों का जिक्र किया था. पहला कि उनके दौरे की शुरुआत दिल्ली के बजाय अहमदाबाद से हुई और दूसरी अहमदाबाद में आने पर दोनों को जिन कुर्सियों पर बैठाया गया वो संखेडा में बनी हुई थीं.

संखेडा का मशहूर फर्नीचर. ये सुंदर होने के बावजूद सस्ता होता है और सालों-साल चलता है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
संखेडा का मशहूर फर्नीचर. ये सुंदर होने के बावजूद सस्ता होता है और सालों-साल चलता है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

एक अफलातूनी कीमियागर

संखेडा में करीब सौ-डेढ़ सौ साल पहले जांगिड़ बिरादरी के 20 घर हुआ करते थे. ये लोग लकड़ी के छोटे-मोटे काम कर लेते थे लेकिन जीविका का कोई ठोस जुगाड़ नहीं था. कहते हैं कि 100 साल पहले एक संन्यासी यहां से गुज़रा. उसे कीमियागिरी (रसायन शास्त्र) में महारत हासिल थी. ओरसंग नदी के किनारे उसने अपना डेरा डाल दिया. ओरसंग नदी की पास ही जांगिड़ों की बस्ती थी. बस्ती के लोगों ने बाबा के भोजन-पानी का अच्छा प्रबंध कर दिया. बाबा ने इससे खुश होकर अपनी उम्रभर का हासिल इन लोगों को सौंप दिया.
बाबा कमाल के कीमियागर थे. उन्होंने कुसुम के पेड़ के फलों और जस्ते को एक साथ कूटना शुरू किया. बीच-बीच में कई और चीजें मिलाईं.

करीब तीन घंटे कूटने के बाद उसने जस्ते को रोटी की शक्ल में फैला दिया. इसके बाद बाबा ने गांव वालों से एक लोटा पानी लाने के लिए कहा. बाबा ने जस्ते की रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा और उसे पानी में डालकर हिलाना शुरू किया. देखते ही देखते जस्ता पानी में घुल गया और पानी चांदी के रंग में तब्दील हो गया. बाबा ने पास ही पड़ी अपनी दातून उठाई और लोटे में डुबोकर लकड़ी पर फेर दिया. लकड़ी पर चांदी के रंग की लीक खिंच गई. इसे कुछ घंटे के लिए सूखने दिया गया. सूखने के बाद भी जस्ता मजबूती के साथ रंग की तरह ही चिपका रहा. उसकी पपड़ी नहीं बनी.

बाबा ने तकरीबन 20 परिवारों को जस्ते को पानी में बदलने की तरकीब सिखाई. अब बस्ती के लोगों के पास नया रंग था. उन्होंने सुंदर-सुंदर खिलौने और घरेलू सामान गढ़ने शुरू किए. रोजगार चल निकला. लेकिन कुछ ही दिनों में चांदी सा चमकता जस्ता हवा लगने की वजह से काला पड़ने लगता. इससे बचने के लिए नई तरकीब सोची गई. लाख को खूब तपाकर लकड़ी के ऊपर चढ़ाया जाने लगा. यह एक किस्म का लेमिनेशन था. इससे जस्ता हवा के संपर्क में नहीं आता और लकड़ी भी चमकदार हो जाती.

फिर आया एक रंगसाज

जो बाबा जस्ते को पानी में बदलने की तरकीब सिखाकर गए थे, दो पीढ़ी बाद बस्ती ने उनका नाम भुला दिया लेकिन तरकीब जस की तस याद रही. करीब पांच दशक बाद बस्ती फिर से खड़ी थी. खिलौने, चकले और बेलन बेचकर गुजारा करना मुश्किल हो रहा था. जो तकनीक इन लोगों के पास थी उसमें न नए रंग थे और न ही नई डिजाइन. ऐसे में इनके बनाए खिलौनों की मांग कम होने लगी. इधर ईंट और सीमेंट का चलन बढ़ रहा था. समृद्ध परिवारों ने लकड़ी की मेहराबों में निवेश करना छोड़ दिया. ऐसे में रोजगार का भयंकर संकट चल रहा था. गांव के कालिदास जांगिड़ ने बेलन और खिलौने बनाना छोड़ दिया. वो बैलगाड़ी के पहिए बनाने लगे. अपने काम में माहिर आदमी थे. आस-पास के गांवों में नाम हो गया और कई गाड़ीवान पहिया बनवाने के लिए उनके दरवाजे पर पहुंचने लगे. ऐसे में कालिदास की आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक हो गई.

 

एक वक्त था जब समृद्ध परिवार अपने घरों में संखेडा के कारीगरों से मेहराबें बनवाते थे. (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)
एक वक्त था जब समृद्ध परिवार अपने घरों में संखेडा के कारीगरों से मेहराबें बनवाते थे. (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

कालिदास खुद अनपढ़ आदमी थे लेकिन पढ़ाई की कीमत जानते थे. ऐसे में उन्होंने अपने सबसे बड़े बेटे द्वारका को बड़ोदा भेजा आई.टी.आई करने. यहां द्वारका का नाम बदला और उन्होंने अपने नाम को स्थानवाचक से बदल व्यक्तिवाचक कर लिया. नया नाम हुआ ‘द्वारकेश कालिदास मिस्त्री’. साल था 1966 का.

इससे करीब आठ साल पहले पंडित नेहरू के आमंत्रण पर एक अमेरिकन जोड़ा भारत आया. नाम था चार्ल्स ऑरमॉन्ड ईम्स और बर्नीस एलैग्ज़ैंड्रा रे. इस अमेरिकन जोड़े ने साथ मिलकर डिजाइनिंग की दुनिया पर अपनी छाप छोड़ी थी. भारत आकर इन्होंने लघु और कुटीर उद्योगों के लिए डिजाइनिंग प्रोग्राम का मसौदा तैयार किया. इसे बाद में ‘दी इंडिया रिपोर्ट’ के नाम से जाना गया. इसी मसौदे के आधार पर 1961 में अहमदाबाद में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिजाइन खोला गया.

द्वारकेश एक स्पेशल केस के तौर पर एनआईडी अहमदाबाद में दाखिल किए गए. यहीं से उनके विदेश जाने का रास्ता खुला. (फोटोः एनआईडी)
द्वारकेश एक स्पेशल केस के तौर पर एनआईडी अहमदाबाद में दाखिल किए गए. यहीं से उनके विदेश जाने का रास्ता खुला. (फोटोः एनआईडी)

1969 में बड़ोदा से आईटीआई करने के बाद द्वारकेश को खबर लगी कि एनआईडी में नए दाखिले लिए जा रहे हैं. वो दाखिला लेने अहमदाबाद पहुंच गए. एनआईडी डिजाइनिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन प्रोग्राम चलाता था. ऐसे में एक डिप्लोमा किए हुए छात्र को दाखिला कैसे मिले? द्वारकेश सबकुछ दांव पर लगाकर अहमदाबाद पहुंचे थे. सो वो अड़कर बैठ गए. बड़ी मिन्नतों के बाद उन्हें खुद को साबित करने का मौका मिल गया. उन्होंने जरूरत के सारे सामान जुटाए और काम पर लग गए.

संखेडा में उनके पिता कालिदास मिस्त्री तो बैलगाड़ी के पहिए बनाने का काम करते थे. जस्ते की पेंटिंग न तो वो करते थे और न ही उन्होंने अपने बेटे को सिखाई. द्वारकेश अहमदाबाद में जस्ता पीट रहे थे और अपनी बस्ती के ही दलसुख काका को लाख-लाख बार शुक्रिया अदा कर रहे थे. पिता को बिना बताए ऐसे ही लड़कपने में उन्होंने दलसुख काका से जस्ते की पेंटिंग का काम सीख लिया था. जैसे ही उन्होंने जस्ते को पानी में घोलकर उसमें कूंची डुबोई, एनआईडी के सचिव दशरथ पटेल ने उनके दाखिले के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए. इस तरह द्वारकेश एक ‘स्पेशल केस’ के तौर पर एनआईडी में दाखिला लेने में कामयाब रहे.

द्वारकेश का डेनमार्क से हासिल किया डिप्लोमा. स्कैंडिनेविया के अपने अनुभवों से द्वारकेश ने संखेडा फर्नीचर को नई ज़िंदगी दी.
द्वारकेश का डेनमार्क से हासिल किया डिप्लोमा. स्कैंडिनेविया के अपने अनुभवों से द्वारकेश ने संखेडा फर्नीचर को नई ज़िंदगी दी.

उस समय नए-नए खुले एनआईडी और डेनमार्क के रॉयल कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स के बीच एक्सचेंज प्रोग्राम चलता था. द्वारकेश का चयन इस प्रोग्राम के लिए भी हो गया. वो आठ महीने के डिप्लोमा के लिए कोपनहेगन गए. यहां डिप्लोमा के दौरान उन्हें ‘लो कॉस्ट फर्नीचर’ पर एक पेपर समिट करना था. इस विषय पर पढ़ाई के दौरान उनका साबका पड़ा स्कैंडेनेवियन फर्नीचर से. 1950 में स्कैंडेनेविया (डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन) डिजाइनिंग की दुनिया में उभरता सितारा था. स्कैंडेनेवियन डिजाइन का मूलमंत्र था सस्ता, सरल और टिकाऊ. द्वारकेश स्कैंडेनेवियन डिजाइन के इस मूलमंत्र को आत्मसात कर रहे थे.

रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट्स से निकलने के बाद द्वारकेश ने कुछ वक्त पैरिस में काम किया. फिर लौट गए हिंदुस्तान
रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट्स से निकलने के बाद द्वारकेश ने कुछ वक्त पैरिस में काम किया. फिर लौट गए हिंदुस्तान.

रॉयल कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स से निकलने के बाद उन्हें पेरिस में काम मिल गया. अभी पेरिस में काम करते हुए तीन महीने ही बीते थे कि पिता कालिदास के नाम की पाती मिली. इसमें लिखा था कि अकेले खुद का भला करने से क्या होगा. इतना पढ़ने-लिखने के बाद गांव में मौजूद अपने समाज के लोगों का भला करने में ही जीवन की सार्थकता है. द्वारकेश वापस भारत लौट आए. आने के बाद कुछ समय तक अहमदाबाद में टिके रहे. जब गांव लौटे तो अटैची में कपड़ों की जगह कागज भरे हुए थे जिन पर जगह-जगह के रंग के दाग थे.
गांव लौटने के बाद सारा काम नए सिरे से शुरू किया. फर्नीचर के 500 डिजाइन तैयार किए. इन्हें बनाने वाले औजारों को नए सिरे से गढ़ा. अब तक संखेडा के पास लकड़ी पर पोतने के लिए महज़ तीन ही रंग थे. द्वारकेश ने बाजार के रंगों को अपने रंग में ढालना शुरू किया. कीमियागर बाबा के जाने के दशकों बाद संखेडा के पास नया रंग था और नए डिजाइन.

संखेड़ा फर्नीचर पर पारंपरिक रूप से कुछ ही रंगों का इस्तेमाल होता था. द्वारकेश इनके लिए नए रंग लेकर आए. (फोटोःअमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
संखेड़ा फर्नीचर पर पारंपरिक रूप से कुछ ही रंगों का इस्तेमाल होता था. द्वारकेश इनके लिए नए रंग लेकर आए. (फोटोःअमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

अपने तीन भाइयों मधुसूदन, जयेश और जगदीश के साथ मिलकर उन्होंने 1972 के साल में नई फर्म बनाई, ‘DEV फर्नीचर’. यह नाम देवताओं में आस्था की बजाय स्कैंडेनेवियन डिजाइन में आस्था के चलते रखा गया. फर्म के नाम के तीनों अक्षर अपने अलहदा मतलब रखते थे. D माने ड्यूरेबल, E माने इकोनॉमिक और V माने वैराइटी. द्वारकेश ने भाइयों के साथ-साथ दूसरे लोगों को भी सिखाना शुरू किया. धीरे-धीरे पूरा गांव इस काम को सीख गया. फर्म बनाने के छह महीने बाद ही उन्हें पहला बड़ा ऑर्डर मिला इस्कॉन टेम्पल बॉम्बे से. बस फिर क्या था, देव फर्नीचर चल निकला. आज भी दुनिया के किसी भी कोने में इस्कॉन टेम्पल में अगर फर्नीचर बनता है तो वो संखेडा से ही जाता है. इस्कॉन के जरिए संखेडा के फर्नीचर को विदेशों में और ग्राहक मिलने लगे. आज यहां का फर्नीचर यूरोप और अमेरिका जा रहा है.

द्वारकेश कालिदास मिस्त्री ने संखेडा को नई पहचान दी. आज वो इस दुनिया में नहीं हैं. 20 दिसम्बर 1993 को हार्ट अटैक के चलते उनका देहांत हो गया. जिस एनआईडी में उन्होंने 1969 में बड़ी मिन्नत के बाद दाखिला हासिल किया था वहां के छात्र उनके और उनके डिजाइन के बारे में पढ़ रहे हैं. द्वारकेश ने तीन लकड़ियों की मदद से क्रॉस जॉइंट तैयार किया था. यह ‘डीके जॉइंट’ के नाम से एनआईडी के सिलेबस का हिस्सा है.

द्वारकेश का तीन लकड़ियों की मदद से बनाया क्रॉस जॉइंट ‘डीके जॉइंट’ नाम से एनआईडी के सिलेबस में आज भी पढ़ाया जाता है. (फोटोःविनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)
द्वारकेश का तीन लकड़ियों की मदद से बनाया क्रॉस जॉइंट ‘डीके जॉइंट’ नाम से एनआईडी के सिलेबस में आज भी पढ़ाया जाता है. (फोटोःविनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

फिर संकट में संखेडा

14 सितम्बर 2017 चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग गांधीनगर में थे. संखेडा में लोग उन्हें अपने बनाए फर्नीचर पर बैठा हुआ देख रहे थे. जीएसटी को लगे हुए डेढ़ महीने से ज्यादा का वक़्त हो गया था. संखेडा के गोल्डन फर्नीचर पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा था. आज भी यहां का फर्नीचर बाजार जीएसटी की मार झेल रहा है. मनोज जांगिड़ संखेडा के हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के सचिव हैं. बकौल मनोजभाई पिछले छह महीने में बाजार घटकर आधा रह गया है. वो इस धंधे को बचाने के लिए तमाम कागजी जद्दोजहद कर रहे हैं. वो कहते हैं-

“कई पीढ़ियों से हम यह काम कर रहे हैं. दुनिया में हमारी डिजाइन वाला फर्नीचर कोई नहीं बना सकता. हमने पीढ़ियों से इसे अपने हिसाब से बचाकर रखा है. हमारे यहां परम्परा है कि हम अपनी बेटियों तक को यह काम नहीं सिखाते. कल को वो किसी और घर जाएंगी तो हमारा काम भी वहां पहुंच जाएगा. हम मजदूरों की भी एक तय सीमा तक ही मदद लेते हैं. यह काम एक आदमी के बस का नहीं है. ऐसे में घर की औरतें इस काम में बराबर का हिस्सा बनती हैं. आज यह काम खतरे में पड़ गया है.

मनोज जांगिड़ संखेडा के हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के सचिव हैं. बकौल मनोजभाई पिछले छह महीने में बाजार घटकर आधा रह गया है.
मनोज जांगिड़ संखेडा के हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के सचिव हैं. बकौल मनोजभाई पिछले छह महीने में बाजार घटकर आधा रह गया है. (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

आप फर्ज कीजिए कि आपको एक सोफा सेट बाजार से खरीदना हो तो कम से कम कितने में मिल जाएगा? मानकर चलिए एक कायदे का सोफासेट आपको 50 हजार से कम में नहीं मिलेगा. हम आपको तीस हजार में पूरा सोफासेट और दो एक्स्ट्रा चेयर दे रहे हैं. हम मार्केट में इसलिए टिक पा रहे क्योंकि हम दूसरे के मुकाबले बेहतर हैं और सस्ते भी.”

जीएसटी उनके व्यापारिक गणित को कैसे बिगाड़ रही है? इसका जवाब मनोज इस तरह से देते हैं-

“जो बड़ी कम्पनियां हैं वो हर दिन हजारों यूनिट बना रही हैं. हमारे काम में मेहनत बहुत है. फिर मजदूरों की भी उतनी मदद ले नहीं सकते. सारा काम हाथ से होता है. एक सोफासेट बनाने में कम से कम तीन से चार दिन लग जाते हैं. अब वो भी 18 फीसदी टैक्स दे रहे हैं और हम भी 18 फीसदी टैक्स दे रहे हैं. उनकी कीमत पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ रहा है. मांग कम होने पर वो ऑफर निकालकर ज्यादा यूनिट बेच सकते हैं. हमारे साथ वो नहीं है. हम 10 से 15 फीसदी मार्जिन पर धंधा कर रहे हैं. ऐसे में यह जीएसटी हमें भारी पड़ रही है.

संखेडा फर्नीचर के लिए सागौन की लकड़ी का इस्तेमाल होता है. लेकिन यहां इस लकड़ी का डीपो आजतक नहीं बना है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
संखेडा फर्नीचर के लिए सागौन की लकड़ी का इस्तेमाल होता है. लेकिन यहां इस लकड़ी का डीपो आजतक नहीं बना है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

2006 में जब वैट आया था तब हमें इससे बाहर रखा गया था. जितने भी हस्तशिल्प के उद्योग थे सबको बाहर रखा गया था. इस बार ऐसा नहीं है. यह सिर्फ संखेडा फर्नीचर की बात नहीं है. कश्मीर में लकड़ी पर बहुत अच्छा काम होता है. जोधपुर के नक्काशी के काम की मांग दुनिया भर में है. कहीं का भी हस्तशिल्प वहां की पहचान होता है. अब आप बताओ हम 18 फीसदी जीएसटी के साथ बड़ी-बड़ी कम्पनियों से कैसे मुकाबला करें.”

जीएसटी लागू होने के एक महीने के भीतर 27 जुलाई 2017 के रोज संखेडा फर्नीचर के कारीगर सूबे के उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल से मिले थे. उस समय उनको आश्वासन मिला था कि जल्द ही उनके मुद्दे पर कुछ किया जाएगा. इसके बाद से मनोज जांगिड़ कई दफे सरकार और जन प्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटा चुके हैं. अब उन्हें इंतजार है तो चुनाव के नतीजे आने का ताकि अाचार संहिता खत्म हो और इस मामले में कुछ हो पाए.

संखेडा का बना चूड़ी हैंगर (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
संखेडा का बना चूड़ी हैंगर. इस तरह के काम पर GST की बुरी मार पड़ी है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

मनोज कहते हैं-

“हमारा पूरा काम सागवान की लकड़ी पर होता है. इसके लिए हमें दलाल के मार्फ़त बाहर से लकड़ी मंगवानी पड़ती है. हम पिछले 20 साल से एक लकड़ी डिपो की मांग कर रहे हैं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. हम चाहते हैं कि सरकार हमारी कला को आगे बढ़ाने में मदद करे लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है.”

संखेडा से लौटते वक़्त मैं एकबार फिर से उस पुल पर हूं जिसके एक सिरे पर संखेडा है और दूसरे पर बहादुरपुर. इस पुल के नीचे से कभी ओरसांग नदी बहती थी. फिलहाल संखेडा के ही जोजवा गांव के पास एक बांध बना दिया गया और नदी में पानी कुछ गड्ढों तक सिमटकर रह गया है. यहां पर जेसीबी सरकारी इजाज़त से बालू खोद रही है. कहते हैं कि मुकेश अंबानी के 27 मंजिला घर एंटीलिया के लिए बालू संखेडा से ही गई थी.

कहा जाता है कि मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के लिए भी रेत संखेड़ा से ही गई थी
कहा जाता है कि मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के लिए भी रेत संखेड़ा से ही गई थी.

गुजरात की बालू गुजरात के बाहर नहीं जा सकती. संखेडा से अलीराजपुर (मध्य प्रदेश) की दूरी महज 80 किलोमीटर है. बालू ठेकेदार बालू में कुछ फीसदी सीमेंट मिलाकर इसे बॉर्डर पार करवा देगा. यह सब कानून के मुताबिक होगा क्योंकि बालू में कितने फीसदी सीमेंट मिलाने पर वो बालू की श्रेणी में नहीं आती यह भी कानून की ही किसी किताब में दर्ज है. वैसे भी बांध देश के लिए अच्छे हैं. इससे सिंचाई को पानी मिल जाता है और खोदने के लिए बालू.

देश में जीएसटी लागू है. संखेडा में फर्नीचर के धंधे की चूलें आवाज़ कर रही हैं. पिछले छह महीनों में धंधा आधा हो चुका है. जीएसटी इस चुनाव में कितना बड़ा मुद्दा है? इसका जवाब देते हुए मनोज भी कहते हैं,

 “जीएसटी देश के लिए अच्छा है.”


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बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.