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क्या गोधरा कांड की शुरुआत एक स्टेशन पहले हो गई थी?

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2002 के गोधरा कांड की शुरुआत को लेकर तमाम अपुष्ट कहानियां हैं. लेकिन एक ऐसी भी बात है, जो दाहोद के एक ऐसे पत्रकार बताते हैं, जिनका नाम हर पत्रकार लेता है. कुछ और पत्रकार भी इससे सहमत हैं. इस कहानी के मुताबिक-

साबरमती एक्सप्रेस पहले दाहोद पहुंची. दाहोद पर एक मुस्लिम-घांची चायवाले ने ट्रेन के डिब्बे में चढ़ने की कोशिश की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी घांची समुदाय से आते हैं, लेकिन घांची हिंदू और मुस्लिम दोनों में होते हैं. उस चायवाले को ट्रेन के उस डिब्बे में नहीं चढ़ने दिया गया. इसकी वजह से थोड़ा-बहुत झगड़ा भी हुआ. फिर उसने यहां से गोधरा फोन कर दिया. दाहोद से करीब डेढ़ घंटे बाद ट्रेन गोधरा पहुंचती है…

27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग में चार डिब्बे जल गए थे और 59 लोगों की मौत हुई थी.
27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग में चार डिब्बे जल गए थे और 59 लोगों की मौत हुई थी.

उन्होंने ये भी बताया था कि साबरमती एक्सप्रेस के साथ एक गोधरा कांड बहुत पहले हो सकता था. 1971-73 में गोधरा में दंगा हुआ था. उस वक्त साबरमती ट्रेन दूसरी तरफ से आ रही थी. लेकिन उसे गोधरा में रोका नहीं गया. जिन्हें गोधरा उतरना था, वो लोग दाहोद में उतरे थे.

मुझे ये कहानी बताने वाले पत्रकार ने ये भी कहा कि इसे इतना बड़ा बनाने वाली कांग्रेस ही है. उनके मुताबिक कांग्रेस के लोगों को दाहोद वाली घटना से गोधरा कांड के होने की बात पता थी, लेकिन जांच में ये बात दबा दी गई. वो मानते हैं कि कांग्रेस ये सोचती थी कि इससे दंगों के आरोप में फंसकर मोदी खत्म हो जाएंगे, लेकिन हुआ इसका उलटा.

पता नहीं, ये कहानी कितनी सच्ची है. लेकिन अगर ऐसा हुआ है तो मन में बस यही आता है कि अगर उस थोड़े से गुस्से को काबू में कर लिया गया होता. तो…

15 साल बाद भी गोधरा के कई इलाकों में 'अशांत धारा' लगी है. इसके चलते हिंदू-मुसलमान आपसे में प्रॉपर्टी का लेनदेन नहीं कर सकते. गोधरा के लोग इसे गैरज़रूरी बताते हैं
15 साल बाद भी गोधरा के कई इलाकों में ‘अशांत धारा’ लगी है. इसके चलते हिंदू-मुसलमान आपस में प्रॉपर्टी का लेन-देन नहीं कर सकते. दी लल्लनटॉप से बातचीत में गोधरा के लोगों ने इसे गैरज़रूरी बताया.

जिन्होंने ये कहानी बताई, वो भाजपा की जीत को लेकर बहुत आश्वस्त थे. ईवीएम के सहारे. मैं भले ही उनकी दाहोद से गोधरा कांड के शुरुआत वाली बात मान लूं. ईवीएम वाली बात पर मुझे यकीन नहीं होता.

दाहोद जिले में छह सीटें हैं. 3 कांग्रेस के पास, 3 भाजपा के पास. कोई भी ये दावा नहीं करता कि इस बार सारी सीटें कोई एक पार्टी ले जाएगी. हर कोई यही कहता है कि दोनों को सीटें मिलेंगी. लेकिन हर पार्टी का समर्थक अपनी-अपनी पार्टी की एक-एक सीटें बढ़ाकर मेरे जैसे लोगों के समझने के लिए मुश्किल कर देता है.

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मुझे पता चला था कि मोदी जी के कपड़े सिलने वाले दर्जी दाहोद में ही रहते हैं. मैं उनसे मिलकर पूछना चाहता था कि मोदी जी का सीना कितने इंच का है. पता चला कि उनका इंतकाल हो चुका है.

दाहोद स्मार्टसिटी की लिस्ट में है. अगर कभी ये सरकारी ऐलान हुआ कि दाहोद स्मार्टसिटी बन गया है तो मैं एक बार फिर दाहोद आकर इसे देखना चाहूंगा. फिलहाल मैं ये देख रहा हूं कि राहुल गांधी दाहोद में एक बस पर सवार होकर निकले. वो गेट पर खड़े थे और हाथ बाहर निकाल रखा था. बाहर खड़े लोगों के उठे हाथ से वो हाथ छूता था. लोग अपने हाथ को निहारते थे.

मैं वाकई दाहोद के स्मार्टसिटी बन जाने पर इसे देखने आना चाहूंगा.


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