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गुजरात का वो गांव जो सरकार की नाकामी के कारण आत्मदाह करने वाला है

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महिसागर. पंचमहल और खेड़ा को काटकर 2013 में नया बना ज़िला. अब भी इतना नया है कि गूगल इसके बारे में सिर्फ इतना बता पाता है कि ज़िले का नाम माही नदी के नाम पर पड़ा जो पूरब से पश्चिम की ओर बहती है. पवित्र नदी है, तो लोग महिसागर को छोटी काशी कह लेते हैं. फिर एक ज़िक्र आता है 1980 के दशक में यहां मिले डायनोसॉर जीवाश्मों का. बस.

तो हम यहां आकर बहुत कुछ देखना चाहते थे, बहुत कुछ लिखना चाहते थे. लेकिन जब हमने यहां की ज़िंदगी कैमरे पर कैद करना शुरू किया, तो काफी कुछ ऐसा सामने आने लगा, जो वीडियो की लय तोड़ देता था. पूछने के लिए अगला सवाल कुछ देर तक दिमाग में आता नहीं था. इसलिए महिसागर का देखा-भोगा लिख देना दूभर है. इसलिए महिसागर की कहानी हम कुछ तस्वीरों के ज़रिए कहने की कोशिश कर रहे हैंः

1. भाजपा का सबसे बड़ा ‘शुक्रगुज़ार’

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ये लूनावाड़ा में हुई राहुल गांधी की रैली में आए पीयूष भगत हैं. PTC यानी प्राइमरी टीचर्स सर्टिफिकेट कोर्स किए हुए बेरोजगार. कहते हैं,

” मेरी 5 साल की उमर थी, तभी से यहां भाजपा है. अगर भाजपा न होती, तो मैं 5 साल का ही होता.

विकास ही नहीं होता न मेरा. ”

इनका एक सवाल भी है भाजपा की इलेक्शन मशीन चलाने वाले अमित शाह से,

” जो अमित शाह हिंदू-मुस्लिम बोलता है न, मेरा उससे सवाल है, तू हिंदू कब बनेगा, तू तो जैन है. ”

2. ‘आत्मविलोपन’ की बात के बाद की हंसी

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ये रमेश भाई बागड़िया हैं. कडाणा में पड़ने वाले बागड़ियानी अंधारी गांव के उपरपंच. इन्होंने गांव के बाहर ‘चूंटड़ी बहिष्कार’ का बैनर लगा रखा है. माने चुनाव बहिष्कार. नहीं चाहते कि कोई राजनैतिक पार्टी गांव आकर वोट मांगे. क्योंकि इनका गांव पृथ्वी पर तो है, लेकिन गुजरात सरकार के कागज़ों (और कंप्यूटरों में) नहीं है. तो खेड़ूत (किसान) को न बिजली मिलती है न कर्जा. पटवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक से आश्वासन मिला. अब आजिज़ आकर 2 या 3 दिसंबर को ‘आत्मविलोपन’ करने वाले हैं.

हमें मालूम नहीं था आत्मविलोपन माने क्या होता है. पूछा, तो बोले आत्मदाह. हमें कुछ देर सूझा नहीं कि इसके बाद क्या बोलें, क्या जोड़ें, क्या पूछें. थोड़ी देर बाद खुद ही हल्के से मुस्कुरा दिए, शायद हमें कुछ सहज करने के लिए. ये तभी की तस्वीर है.

3. ‘छत्रिस महिने मिला जॉब, बाद में मेरे को निकाल दिया वहां से. हम चार सौ आदमी थे.’ 

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छत्रिस माने छत्तीस होता है. राहुल गांधी की रैली में आए बेरोजगार वणकर कनु को माइक पर ये कहना था,

मैंने ग्रैजुएशन किया. CPEd किया. ITI किया. हलोल में GM में जॉब मिला. जनरल मोटर्स. शर्वले. बाद में निकाल दिया. 400 लोग ट्रेनिंग वाले थे, एक दिन बुलाकर सबको लेटर देकर निकाल दिया.

4. ‘सरकार है, वो तो पलट भी जाएगी’

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1989 में कडाना डैम पूरा हुआ. और इसी के साथ राठडा गांव के नाम में ‘बेट’ जुड़ गया. बेट माने द्वीप होता है. बांध के पानी ने गांव के एक हिस्से को दुनिया से काट दिया. तब से आज तक गांव में साइकिल भी नहीं आ सकी है. 2016 में आठ करोड़ की लागत से एक पुल बनाने का वादा किया गया. हमने पूछ लिया कि नहीं बना तो क्या करेंगे, तो मणिलाल बोले,

”नेता पुल नहीं बनवाएंगे, तो कोई बात नहीं. हम जैसे अभी नाव से जाते-आते हैं, वैसे ही जाते-आते रहेंगे.”

इस वाक्य में वो दंभ भी नहीं था, कि सरकार के रहम पर नहीं जीते हम. मणिलाल की आवाज़ में एक खनक थी, जो उस हताशा को बेमानी साबित कर रही थी, जो इस तरह के वाक्यों में स्थाई की तरह मौजूद रहती है. मणिलाल के कहे में वहां मौजूद पूरी बैठक ने आवाज़ मिलाई थी. ठीक मणिलाल की ही तरह.

5. ‘बंदर नचाने वाली सरकार नहीं चाहिए हमें’

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लूनावाड़ा में राहुल गांधी की रैली में आए ललित भाई पुलिस से रिटायर हुए हैं. अपनी बात रुपक में कहते हैं,

”वो मदारी का खेल आप सबने देखा है. मदारी क्या करता है, वो बंदर पकड़ता है. बंदर ऐसे पकड़ाता नहीं है. तो वो क्या करता है. एक घड़े के अंदर दाना रखता है. वो मुट्ठी अंदर डालता है, लेकिन हाथ बाहर नहीं निकलता. दाना तो मुट्ठी में आता है लेकिन वो छोड़ ही नहीं पाता, मुट्ठी बाहर नहीं आ पाती.”

ललित भाई का कहा आप समझिए. अपनी तरह से.

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