Submit your post

रोजाना लल्लनटॉप न्यूज चिट्ठी पाने के लिए अपना ईमेल आईडी बताएं !

Follow Us

गुजरात के वो तीन ज़िले जहां 'विकास' इसलिए नहीं गया कि मोबाइल नेटवर्क नहीं पकड़ता

गुजरात के नर्मदा, तापी और डांग ज़िलों में कई इलाके ऐसे हैं जहां आज भी मोबाइल नेटवर्क नहीं है. और ये यहां कि सबसे छोटी समस्या है. वहां की और समस्याओं पर रोशनी डालती रिपोर्ट पेश है.

163
शेयर्स

सरदार सरोवर डैम और कर्जन डैम बगल में हैं, लेकिन तमाम गांववालों को पानी नहीं मिलता.

डिजिटल इंडिया है, लेकिन नेशनल हाइवे पर 50 किलोमीटर तक फोन का कोई नेटवर्क नहीं. जबकि उस दायरे में 60-70 गांव रहते हैं.

1972 में खपरैल से बना स्कूल, जिसमें बारिश में पानी चूता है.

अगर आप ये सब दिक्कतें नहीं झेल रहे, तो मुबारक हो, आप इस आदिवासी इलाके में नहीं रहते, जो नर्मदा जिले में है, जो कि गुजरात में ही पड़ता है.

या फिर आप इसी इलाके में रहते हुए छोटू वसावा हो जाएं.

छोटू वसावा कद्दावर आदिवासी नेता हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उनके साथ हाथ मिलाया है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उनके साथ हाथ मिलाया है. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

छोटू वसावा. आदिवासियों के कद्दावर नेता. इनकी झगड़िया सीट भड़ूच में लगती है, लेकिन नितांत आदिवासी इलाका है. छोटू वसावा ही वो शख्स हैं, जिनकी वजह से अहमद पटेल को राज्य सभा चुनाव में जीत मिली और अमित शाह की किरकिरी हुई.

मेन रोड से बहुत भीतर छोटू वसावा का घर था. सड़क के किनारे दोनों तरफ के तमाम खेत छोटू वसावा के बताए गए, जो तार से घिरे हुए हैं. बहुत पिछड़े और जंगल जैसे इलाके में आलीशान घर. ऑडी जैसी महंगी गाड़ियां पड़ी धूल खा रही हैं. शानदार कुत्ते जंजीर से बंधे हुए हैं. हॉल में एक बड़ी सी कुर्सी और उसके सामने रखी छोटी कुर्सियां, देखने में सामंती व्यवस्था.

मेरे कई सवालों पर छोटू वसावा भड़कते से दिखते हैं. न जाने क्यों.

सरदार पटेल के नाम पर मूर्ति जहां बन रही है, वहां पहले एक पहाड़ था जिसे आदिवासी पूजते थे. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
सरदार पटेल के नाम पर मूर्ति जहां बन रही है, वहां पहले एक पहाड़ था साधु हिल नाम का, जिसे आदिवासी पूजते थे. (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

इस देश में जिसे विकास कहा और समझ लिया जाता है, उसकी बड़ी कीमत आदिवासियों ने चुकाई है. हमें थोड़ी पारदर्शिता बरतते हुए और थोड़ा कृतज्ञ होते हुए सरदार सरोवर बांध जैसी परियोजनाओं के पास एक बोर्ड लगाना चाहिए. जिसमें इस बात की साफगोई हो कि इस परियोजना से किन-किन लोगों का विस्थापन हुआ और आज वो किस हालत में रह रहे हैं.

मगर मैं भी क्या अपेक्षा कर रहा हूं. जबकि जानता हूं कि कागजों में अक्सर रीसेटलमेंट का काम पूरा हो चुका होता है. कागजों में विस्थापितों को उनकी गई जमीन से कई गुना ज्यादा संपत्ति दी जा चुकी होती है. कागजों में उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में जाने लगते हैं और वो कागजों में अच्छे-अच्छे पार्क में झूला झूल रहे होते हैं.

आदिवासियों के बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ते हैं जहां कैमरा पहुंचने से पहले टाट पट्टी नदी में धोने के लिए भेज दी जाती है और फर्नीचर बस 'उस दिन' वहां मौजूद नहीं होता (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)
आदिवासियों के बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ते हैं जहां कैमरा पहुंचने से पहले टाट पट्टी नदी में धोने के लिए भेज दी जाती है और फर्नीचर बस ‘उस दिन’ वहां मौजूद नहीं होता (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

सरदार सरोवर बांध से कुछ दूर सरदार पटेल की मूर्ति का काम जारी है. दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति. अक्टूबर 2018 में बनकर तैयार हो जाएगी. 2019 में लोकसभा चुनाव हैं. इस प्रोजेक्ट की लागत शायद 3000 करोड़ रुपए है. हो सकता है कि कुछ कम-ज्यादा हो, वैसे भी ऐसे काम में कुछ सौ करोड़ कोई मायने नहीं रखते.

कुछ दिन बाद शायद कोई याद न रखे कि जिस पहाड़ी पर ये मूर्ति बनाई जा रही है, उसका नाम साधु हिल था और आदिवासी उसकी पूजा करते थे. साढ़े तीन साल पहले जब यहां एक ईंट तक नहीं रखी गई थी, तब भी पुलिस-सुरक्षाबल के 4-6 लोग यहां पहरा देते थे, डर था कि आदिवासी विरोध-प्रदर्शन करने आ सकते हैं. शायद इसी डर की वजह से साढ़े तीन साल पहले हमें प्रशासन ने पड़ोस के थावड़िया गांव नहीं जाने दिया था. इस बार वहां जाने के लिए माथापच्ची करने का मन नहीं हुआ.

Video: दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति को बनता हुआ देखिए

नर्मदा जिले के ही देदियापाड़ा में एक सरकारी स्कूल. 45 साल पहले 1972 में बना. तब से एक बार रिपेयर हुआ. छत खपरैल की. खपरैल से पानी चूने के निशान दिखते हैं. घनघोर पिछड़े और घनघोर जंगल वाले इस इलाके में अच्छी बारिश होती है. ये बारिश पर निर्भर करता है कि बच्चे कब और कितनी दिक्कत झेलेंगे. लेकिन ये केवल बारिश पर ही निर्भर नहीं करता है. बच्चे नंगे फर्श पर बैठे हुए हैं. पूछने पर पता चलता है कि टाट-पट्टी धोने के लिए नदी पर भेजी गई हैं. जो प्लास्टिक का फर्निचर है कॉपी रखकर लिखने के लिए, उसे बस आज ही बच्चों को नहीं दिया गया. ये संयोग घटित होने के लिए गरीब आदिवासी बच्चों से मुफीद और कौन होगा भला!

Video: इस स्कूल को देखिए, यहां गुजरात का भविष्य पढ़ता है

बात यहीं तक नहीं रह जाती. दिक्कतें परतों में हैं. परत के भीतर परत. केवल परत और कुछ नहीं. जैसे प्याज.

पास में ही मरियम माता के मंदिर का पता चला. पता चला कि आदिवासियों को बताया गया है कि यहां स्पेन से मरियम माता आई थीं. आदिवासियों की एक देवी की जगह मरियम माता की पूजा होने लगी. मुर्गे-बकरे पहले की ही तरह कटते हैं. नारियल अब भी फूटते हैं. 20-25 साल के आदिवासी लड़कों को नहीं पता कि उनके परिवार ने ईसाई धर्म क्यों अपना लिया था.

तापी और डांग दो ऐसे जिले, जिनमें स्त्री-पुरुष अनुपात बेहतर है. 1000 पुरुषों पर 1000 से ज्यादा स्त्रियां. ये आदिवासी बहुल इलाके हैं. घने जंगल. पिछड़े इलाके. लेकिन विकसित हो चुके इलाकों के लिए कम से कम इस एक मामले में नजीर.

तापी में तमाम लोगों ने रोजगार की दिक्कत बताई. कागज की एक फैक्ट्री के बारे में बताया, जिसे पानी नहीं मुहैया कराया गया, तो वो बंद हो गई. एक चीनी मिल थी, वो भी बंद हो गई. पढ़े-लिखे लड़के तक बेरोजगार घूम रहे हैं. एक नौजवान लड़के ने बहुत सपाट तरीके से कह दिया कि केवल बिजली और सड़क का मतलब विकास नहीं होता है.

आदिवासी इलाकों में पढ़ाई और रोजगार बड़ी दिक्कतें हैं. लेकिन क्या फर्क पड़ता है, किसे फर्क पड़ता है, हैं तो वो आदिवासी ही!

Video: हाथ जोड़कर मोदी जी से क्या कह रहा है तापी का ये लड़का?


गुजरात चुनाव-2017 की लल्लनटॉप कवरेजः

गुजरात चुनावः उस ज़िले की कहानी जिसे अंग्रेज़ कभी नहीं जीत पाए
गुजरात का वो गांव जो सरकार की नाकामी के कारण आत्मदाह करने वाला है
जिन कारीगरों ने मोदी और शी जिनपिंग के बैठने के लिए झूला तैयार किया था उनके साथ बहुत बुरा हुआ
गुजरातः जहां आदिवासियों के इतने सुंदर घर देखकर कोई भी जल जाएगा
क्या गोधरा कांड की शुरुआत एक स्टेशन पहले हो गई थी?
गोधरा के नाम से अगर दंगे याद आते हैं, तो ये तस्वीरें देखिए
चीतल डायरीज़ः ‘अमूल’ की कामयाबी के कसीदों में खेड़ा-आणंद इलाके की ये सच्चाई छुप जाती है
चीतल डायरीज़ः गुजरात का ये मुसलमान क्यों पिछले 15 साल से वोट नहीं डाल रहा है?

Video: ये आदिवासी नेता बन सकता है गुजरात का किंगमेकर

लल्लनटॉप न्यूज चिट्ठी पाने के लिए अपना ईमेल आईडी बताएं !

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

हिमाचल चुनाव 2017

हिमाचल प्रदेश के बारे में एग्ज़िट पोल क्या बता रहे हैं?

एक बार तुम - एक बार हम वाला फॉर्मूला रिपीट होगा कि नहीं?

जब गुजरात का कॉल गर्ल रैकेट हिमाचल में चुनावी मुद्दा बन गया

दोनों पार्टियों का चुनाव प्रचार कभी भी इससे निचले स्तर पर नहीं गिरा होगा.

हिमाचल प्रदेश: एक चीज ने उम्मीदवारों की नींद उड़ा दी है

दोनों पार्टियों का चुनाव प्रचार कभी भी इससे निचले स्तर पर नहीं गिरा होगा.

तीन विधानसभाओं का हाल, बतकही के अंदाज में

हिमाचल की देहरा, ज्वालामुखी और नदौन से ग्राउंड रिपोर्ट.

101 साल के देश के पहले वोटर का इंटरव्यू

हिमाचल प्रदेश के रहने वाले श्यामसरण नेगी ने मोदी-राहुल पर भी कुछ खास बोला है.

सरकारी रेट की दुकान और एक अंगुली के 2600 रुपए

ऐसी फैक्ट्री जिसके बारे में शहर की नई पीढ़ी को नहीं पता, नए लोग यहां नहीं आते.