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गोधरा के नाम से अगर दंगे याद आते हैं, तो ये तस्वीरें देखिए

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गोधरा नाम लेते ही हमारे जेहन में एक खास तस्वीर उभरती है. कुछ जलने की महक सी आती है. ऐसा लगता है आस-पास कुछ अदृश्य सा तैर रहा है. कोई चीख उठ रही है. पूरे माहौल में मातम छा जाता है जैसे. सोचो तो गोधरा ऐसा लगता है. मगर गोधरा में गोधरा को देखो, तो एक अलग ही तस्वीर दिखती है. किसी भी आम शहर जितना आम है गोधरा भी. कम से कम ऊपर-ऊपर से तो सब ठीक ही लगता है. वो तो जब अंदर कोंचो, तब मालूम चलता है कि हिंदू-मुस्लिम का बंटवारा अभी तक बना हुआ है. एक गाना है. Us ऐंड देम. यानी, हम बनाम वो. ऐसा ही है गोधरा में. मगर अंदर-अंदर. जैसा कि मैंने कहा, ऊपर से तो सब ठीक ही दिखता है.

गोधरा में होटल की खिड़की से परदा हटाया, तो कबूतर का ये जोड़ा दिखा. न जाने क्या बात कर रहा होगा...
गोधरा में होटल की खिड़की से परदा हटाया, तो कबूतर का ये जोड़ा दिखा. न जाने क्या बात कर रहा होगा (फोटो: लल्लनटॉप)
हो सकता है कि आप इस तस्वीर में वो सारी चीजें न देख पा रहे हों, जो मैंने देखी-महसूस की. इस वक्त गोधरा रेलवे स्टेशन से किसी ट्रेन का हॉर्न सुनाई दे रहा था. दोपहर थी. धूप थी. छत पर बच्ची एक महिला से कंघी करवा रही थी. एक घर की छत पर कोने में दो बच्चे पॉलिथिन में धागा बांधकर उसे लटकाते, फिर उसे खींचते और दौड़कर उड़ाने की कोशिश करते. कोई पक्षी उड़ रहा था. कोई पतंग उड़ रही थी.
हो सकता है कि आप इस तस्वीर में वो सारी चीजें न देख पा रहे हों, जो मैंने देखी-महसूस की. इस वक्त गोधरा रेलवे स्टेशन से किसी ट्रेन का हॉर्न सुनाई दे रहा था. दोपहर थी. धूप थी. छत पर बच्ची एक महिला से कंघी करवा रही थी. एक घर की छत पर कोने में दो बच्चे पॉलिथिन में धागा बांधकर उसे लटकाते, फिर उसे खींचते और दौड़कर उड़ाने की कोशिश करते. कोई पक्षी उड़ रहा था. कोई पतंग उड़ रही थी. (फोटो: लल्लनटॉप)
दिखने में उतना ही सामान्य. किसी भी आम शहर की आम सड़क जैसा.
दिखने में उतना ही सामान्य. किसी भी आम शहर की आम सड़क जैसा. (फोटो: लल्लनटॉप)
मैं न बताऊं कि ये गोधरा की सड़क है, तो शायद आप इसे अपने शहर की ही सड़क समझ बैठेंगे.
मैं न बताऊं कि ये गोधरा की सड़क है, तो शायद आप इसे अपने शहर की ही सड़क समझ बैठेंगे. (फोटो: लल्लनटॉप)
वहां सड़क किनारे कुछ दुकानें हैं. किसी में छोटे बच्चों के कपड़े बिकते होंगे, तो कोई बिगड़ी प्रेस बनाता होगा. कहीं चाय बिकती होगी, तो कहीं कोई पजामे के नाड़े सिलता होगा.
वहां सड़क किनारे कुछ दुकानें हैं. किसी में छोटे बच्चों के कपड़े बिकते होंगे, तो कोई बिगड़ी प्रेस बनाता होगा. कहीं चाय बिकती होगी, तो कहीं कोई पजामे के नाड़े सिलता होगा. (फोटो: लल्लनटॉप)
गोधरा में कदम रखते ही एक किस्म की दहशत महसूस हुई. लगा, कोई पुरानी बात याद आ गई हो. फिर शहर में घूमकर तलाशता रहा. आंखों को जो मिला, एकदम सामान्य ही मिला.
गोधरा में कदम रखते ही एक किस्म की दहशत महसूस हुई. लगा, कोई पुरानी बात याद आ गई हो. अखबारों की कतरनें, रेडियो पर गूंजती आवाज. कई किस्म की यादें याद आईं. फिर शहर में घूमकर तलाशता रहा. आंखों को जो मिला, एकदम सामान्य ही मिला. (फोटो: लल्लनटॉप)
शाम का धुंधलका था. हवा में सर्दी महसूस नहीं हो रही थी. हां, कुछ देर बाद जब रात हो जाएगी तब हल्की सी ठंड महसूस होगी. उसको ही गुलाबी ठंड कहते हैं शायद.
शाम का धुंधलका था. हवा में सर्दी महसूस नहीं हो रही थी. हां, कुछ देर बाद जब रात हो जाएगी तब हल्की सी ठंड महसूस होगी. उसको ही गुलाबी ठंड कहते हैं शायद. ये जो गाड़ी से लाइट निकल रही है, उसको गुलाबी नहीं कहते मगर. वो लाल है. (फोटो: लल्लनटॉप)
रफ्तार को जब कैमरे में कैद करो, तब ऐसा लगता है कि वो सरपट दौड़ता हुआ फोटो से भी बाहर भागता जा रहा है. वो कार देखिए. कई घंटों पहले जैसी मुझे दिखी थी, वैसी ही अभी आपको दिख रही होगी.
रफ्तार को जब कैमरे में कैद करो, तब ऐसा लगता है कि वो सरपट दौड़ता हुआ फोटो से भी बाहर भागता जा रहा है. वो बाइक देखिए. दाहिनी ओर वाली. कई घंटों पहले जैसी मुझे दिखी थी, वैसी ही अभी आपको दिख रही होगी. (फोटो: लल्लनटॉप)
कुर्सियां खाली पड़ी हैं. थोड़ी देर पहले कोई बैठा था उसपर. तीन यार थे शायद. खेलने के बाद सुस्ता रहे होंगे. अब वो किसी घर के किसी कमरे के अंदर होंगे. स्कूल का होमवर्क कर रहे होंगे. मैंने जब तस्वीर ली, वो वक्त शायद उनके पढ़ने का था. तभी तो कुर्सियां खाली पड़ी हैं.
उन खाली कुर्सियों पर थोड़ी देर पहले कोई बैठा था. तीन यार थे शायद. खेलने के बाद सुस्ता रहे होंगे. अब वो किसी घर के किसी कमरे में बैठे स्कूल का होमवर्क कर रहे होंगे. मैंने जब तस्वीर ली, वो वक्त शायद उनके पढ़ने का था. तभी तो कुर्सियां खाली पड़ी हैं. (फोटो: लल्लनटॉप)
अपनी बेस्ट फ्रेंड के साथ कहीं जा रही हैं आंटी. बेस्ट फ्रेंड ही तो होता है, मैं चलूं तो तू चले टाइप.
अपनी बेस्ट फ्रेंड के साथ कहीं जा रही हैं आंटी. बेस्ट फ्रेंड ही तो होता है, मैं चलूं तो तू चले टाइप. (फोटो: लल्लनटॉप)
ये लोग हैं क्या? जम गए थे ये लोग? जैसे उन तिलिस्मी कहानियों में होता है. किसी झरने का जादुई पानी पीकर सब पत्थर बन जाते हैं! वैसा ही हुआ क्या इनके साथ? तो क्या फिर कोई राजकुमार आएगा और इन्हें फिर से इंसान बना देगा? पता नहीं. मगर एक बात अच्छी है. पत्थर बनने से पहले भी ये सब साथ थे. एक-दूसरे का हाथ थामे. पत्थर बनने के बाद भी ये साथ हैं. वैसे ही हाथ थामे. गांव में एक घर के बाहर लिखा देखा था- एकता में शक्ति है.
नगर निगम पर काबिज बीजेपी ने गांधी की ये मूर्ति लगवाई, तो कांग्रेस को इस बात पर विरोध करना पड़ा कि दो लोग ज्यादा कैसे आ गए. (फोटो: लल्लनटॉप)
गोधरा के 10 इलाकों में अशांत धारा यानी डिस्टर्बेंस एरिया ऐक्ट लगा हुआ है. इसका ये मतलब है कि इन इलाकों में एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को अपनी प्रॉपर्टी बिना जिलाधिकारी की इजाजत के नहीं बेच सकते. लेकिन जमीन पर इसका मतलब ये है कि हिंदू अपनी प्रॉपर्टी मुसलमान को नहीं बेच सकते. बीजेपी-वीएचपी नेताओं ने ये करवाया है. ऐसे ही एक इलाके जहूपुरा में दुकान किए हुए विजय कुमार से मैं मिला, तो उनकी बातें बहुत विरोधाभासी लगीं. उन्होंने पहले कहा कि मुस्लिम हिंदू इलाकों में प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं. उनके आका उनको पैसा दे रहे हैं इसके लिए. मैंने पूछा कि प्रॉपर्टी खरीदने से क्या दिक्कत है, उन्होंने बगल की दुकान दिखाते हुए कहा कि वो दुकान के आगे इस तरह रास्ते पर बाइक खड़ी करते हैं. जबकि खुद उनकी दुकान के आगे बाइक खड़ी थी. फिर वो खुद पर बहुत गर्व करते हुए बताते हैं कि वो भी पूरा रास्ता बंद करके गणपति मनाते थे और यहां के मुसलमान उसमें शामिल होते थे. उस दिन इतवार था और ज्यादातर दुकानें बंद थीं. अगले दिन जब मैं वहां गया और सारी दुकानें थीं. सभी हिंदू-मुसलमान दुकानदार वहां थे, तो उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही. न जाने ये उनका डर था या चालाकी. लेकिन अशांत धारा की जरूरत क्यों पड़ी? लोग जहूपुरा से वाकई दुकानें बेचकर दूसरे इलाकों में जा रहे हैं. लोग अपनी प्रॉपर्टी तो उसे ही बेचेंगे, जो अच्छी कीमत देगा. लेकिन लोग अपनी प्रॉपर्टी बेचकर क्यों जा रहे हैं? दूसरे इलाकों का तो नहीं पता, लेकिन जहूपुरा के हिंदू-मुसलमान दुकानदारों ने जो बताया वो ये था कि कभी वहां पास में रोडवेज स्टैंड था. बसें वहीं से आती-जाती थीं, तो वहां भीड़ रहती थी.
इनकी दुकान है जहूपुरा में. मुसलमान अगर अपनी दुकान के बाहर बाइक लगाए, तो इनको दिक्कत होती है. मगर अपनी दुकान के बाहर बाइक लगाने और गणपति की मूर्ति स्थापित करने में इनको कोई खराबी नहीं दिखती. (फोटो: लल्लनटॉप)

हिंदू दुकानदार मुसलमानों को नहीं बेच सकते अपनी जमीन-दुकान
गोधरा के 10 इलाकों में अशांत धारा यानी डिस्टर्बेंस एरिया ऐक्ट लगा हुआ है. इसका ये मतलब है कि इन इलाकों में एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को अपनी प्रॉपर्टी बिना जिलाधिकारी की इजाजत के नहीं बेच सकते. इसका असल मतलब ये है कि हिंदू अपनी प्रॉपर्टी मुसलमान को नहीं बेच सकते. बीजेपी-वीएचपी नेताओं ने ये करवाया है. ऐसे ही एक इलाके जहूपुरा में दुकान चलाने वाले विजय कुमार से मैं मिला, तो उनकी बातें बहुत विरोधाभासी लगीं. उन्होंने पहले कहा कि मुस्लिम हिंदू इलाकों में प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं. उनके आका उनको पैसा दे रहे हैं इसके लिए. मैंने पूछा कि प्रॉपर्टी खरीदने से क्या दिक्कत है, उन्होंने बगल की दुकान दिखाते हुए कहा कि वो दुकान के आगे इस तरह रास्ते पर बाइक खड़ी करते हैं. जबकि खुद इनकी दुकान के आगे बाइक खड़ी थी. फिर वो खुद पर बहुत गर्व करते हुए बताते हैं कि वो भी पूरा रास्ता बंद करके गणपति मनाते थे और यहां के मुसलमान उसमें शामिल होते थे. उस दिन इतवार था और ज्यादातर दुकानें बंद थीं. अगले दिन जब मैं वहां गया, तब सारी दुकानें खुली मिलीं. उस वक्त सभी हिंदू-मुसलमान दुकानदार वहां थे. शायद इसीलिए इन जनाब ने पहले जैसी कोई बात नहीं दोहराई. न जाने ये उनका डर था या चालाकी.

लेकिन अशांत धारा की जरूरत क्यों पड़ी? लोग जहूपुरा से वाकई दुकानें बेचकर दूसरे इलाकों में जा रहे हैं. लोग अपनी प्रॉपर्टी तो उसे ही बेचेंगे, जो अच्छी कीमत देगा. लेकिन लोग अपनी प्रॉपर्टी बेचकर क्यों जा रहे हैं? दूसरे इलाकों का तो नहीं पता, लेकिन जहूपुरा के हिंदू-मुसलमान दुकानदारों ने जो बताया वो ये था कि कभी वहां पास में रोडवेज स्टैंड था. बसें वहीं से आती-जाती थीं, तो वहां भीड़ रहती थी. अब नहीं रहती, तो दुकानदारी में भी मंदी आ गई है.


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