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चीतल डायरीज़: 'अमूल' की कामयाबी के कसीदों में खेड़ा-आणंद इलाके की ये सच्चाई छुप जाती है

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अहमदाबाद से वडोदरा की तरफ बढ़ते समय आपका साबका स्वर्णिम चतुर्भुज के एक कतरे से पड़ता है. यह वाजपेयी सरकार के समय में शुरू हुई महत्वाकांक्षी परियोजना थी जिसके जरिए देश के चारों कोनों को एक-दूसरे से जोड़ा जाना था. छह लेन वाली अद्भुत सड़क. आप मन में सोचते हैं, “तो यह है विकास का गुजरात मॉडल.” इस सड़क पर थोड़ी-थोड़ी दूरी के बाद गुजराती में एक इबारत लिखी हुई है जिसका अंग्रेजी तर्जुमा भी नीचे लिखा हुआ होता है, “डाइवर्ज़न अहेड”.

अहमदाबाद से आगे बढ़ते हुए जब मील का पत्थर नडियाड की दूरी 19 किलोमीटर बता रहा होता है, ठीक उसी समय सामने चढ़ते फ्लाईओवर के बगल में बायीं तरफ वाला डाइवर्ज़न आपको खम्बात की तरफ ले जाता है. इस रोड पर तकरीबन 12 किलोमीटर आगे बढ़ने पर आप लिम्बासी पहुंचते हैं. यहां से बाएं मुड़कर करीब छह किलोमीटर आगे पहुंचने पर आप मालावाड़ा नाम के गांव के सामने होते हैं.

vinay cheetal diaries

चीतल दरअसल उमरकोट के राणा महेंद्र के तेज़ चाल वाले ऊंट का नाम था जिस पर बैठकर वो रेगिस्तान चीरते हुए,
रात को लौद्रवा (जैसलमेर) अपनी प्रेमिका मूमल से मिलने जाता था और सुबह होते-होते फिर उमरकोट (सिंध) लौट आता था.
उस चीतल ने न सिर्फ इस एपिक लव स्टोरी को विटनेस किया बल्कि जहां-जहां उसके पैर पड़े, वहां का समय
और कहानियां देखीं. चीतल डायरीज़ सीरीज़ के जरिए हम गुजरात से ऐसी कहानियां लेकर आ रहे हैं 
जो इस समय और काल में आप तक पहुंचनी चाहिए.

गुजरात में एक बिरादरी होती है रबारी. परम्परागत पेशा, पशुपालन. यह उस दौर की बात है जब रबारी मवेशियों के झुंड लिए चलते-फिरते गांवों में रहा करते थे. रबारियों के ऐसे ही एक कारवां में माला नाम की एक अधेड़ औरत थी. एक सुबह दातून करते हुए उसे पता नहीं क्या सूझा कि उसने अपने दातून को जमीन पर रोप दिया. चरोतर (हाल का खेड़ा और आणंद जिला) की जमीन बहुत हरी-भरी है. मवेशियों के लिए चारे की कोई कमी नहीं. डेरे आने वाले कुछ दिन यहीं टिके रहे. इस बीच माला ने देखा कि जो दातून उसने जमीन पर रोपी थी, उसने जड़ें पकड़ ली हैं और उसमें से कोपलें फूटने लगी हैं. डेरे के दूसरे लोगों ने इसे भगवान का चमत्कार माना और वहीं बस गए.

मालावाड़ा में माला का लगाया हुआ ऐतिहासिक बरगद (फोटोः विनय सुलतान / दी लल्लनटॉप)
मालावाड़ा में माला का लगाया हुआ ऐतिहासिक बरगद (फोटोः विनय सुलतान / दी लल्लनटॉप)

मवेशियों को बांधने की जगह को गुजराती में ‘वाड़ा’ कहते हैं. इस तरह गांव का नाम पड़ा मालावाड़ा. माला की दातून आज कई मीटर में फैले बड़ के पेड़ में तब्दील हो चुकी है. यह कब की बात है, इसकी तस्दीक इस पेड़ की कार्बन डेटिंग करके की जा सकती है लेकिन फिलहाल वो आंकड़ा हमारे पास मौजूद नहीं है. इस गांव में माला का कोई वारिस नहीं रहता. गांव वालों के पास सिर्फ एक जानकारी है कि किसी माला रबारी ने यह गांव बसाया था. वो औरत थी या मर्द इसकी भी ठीक-ठीक जानकारी उनके पास नहीं है. इतिहास का यह पूरा प्रसंग दर्ज है ‘चरोतर सर्वसंग्रह’ नाम की गुजराती पुस्तक में.

गांव को बसाने वाली माला बस कहानियों का हिस्सा है जिसका कोई दर्ज इतिहास नहीं है. गांव का जो आखिरी दर्ज इतिहास है वो हमें 1899 तक ही ले जाता है. 1899 का साल अकाल का साल था. अंग्रेजों के गजेटियर में यह अकाल ‘दी ग्रेट इंडियन फैमिन 1899’ के नाम से दर्ज है. राजस्थान-गुजरात की लोक परम्परा में इसके किस्से ‘छप्पनिया काळ’ के तौर पर दर्ज हैं. मारवाड़ में कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित की जाती है कि छाप्पनिए काळ के वक़्त हमारे बड़ेरे (पुरखे) खेजड़ी की छाल उबालकर पिया करते थे और उसी के दम पर जिंदा रहे. अगर कोई किसी खाने की चीज पर टूट पड़ता है तो उससे मजाकिया अंदाज में पूछा जाता है कि कहीं वो छाप्पनिए काळ में तो पैदा नहीं हुआ है? यह कुव्वत लोक परम्परा में ही हो सकती है कि वो त्रासदियों को लतीफों के तौर पर दर्ज कर लेती है.

अहमदाबाद में अकाल-पीड़ितों को दी जाती सरकारी मदद. साल 1901. यही वो समय था, जब मालावाड़ा आधिकारिक तौर पर इतिहास में दर्ज हुआ. (फोटोःविकिपीडिया कॉमन्स)
अहमदाबाद में अकाल-पीड़ितों को दी जाती सरकारी मदद. साल 1901. यही वो समय था, जब मालावाड़ा आधिकारिक तौर पर इतिहास में दर्ज हुआ. (फोटोःविकिपीडिया कॉमन्स)

1899 के दुर्भिक्ष में भारत में ब्रिटिश राज में पड़ने वाले इलाकों में ही लगभग 10 लाख लोग मारे गए थे. चरोतर उस समय बड़ोदा के गायकवाड़ राजाओं का इलाका हुआ करता था. उस समय बड़ोदा की गद्द्दी पर हुआ करते थे सयाजीराव गायकवाड़ (तृतीय). बड़ोदा स्टेट के आधुनिकीकरण में उनके योगदान की स्मृति वडोदरा शहर में ‘काला घोड़ा सर्किल’ के तौर पर दर्ज की जा चुकी है. भीम राव अम्बेडकर को पढ़ने के लिए वजीफा देने वाले सयाजीराव दुर्भिक्ष के समय ‘काम के बदले अनाज’ टाइप की योजना के तहत राहतकार्य खाते में तालाब खुदवा रहे थे.

इस राहत कार्य योजना का एक कतरा मालावाड़ा में भी पड़ा. इस गांव के लोगों ने खूब बड़ा तालाब खोदा. आज भी यह तालाब गांव के मुहाने पर है. इसके एक सिरे पर दलितों की बस्ती बसी हुई है. आज इसका पानी मवेशियों को नहलाने और कपड़े धोने के काम आता है. ये राहत कार्य उस दौर में कितना सफल था इसका सबूत हमें बड़ोदा स्टेट के दस्तावेजों में मिलता है. बड़ोदा स्टेट के खसरा-खतौनी में दर्ज है कि खेड़ा में जहां 1899 तक औसतन 13000 जमीन के टुकड़े खरीदे और बेचे जाते थे, 1900 से 1903 के बीच यह आंकड़ा उछलकर 65000 के करीब पहुंच गया. इसकी वजह थी साहूकारों से अकाल के समय ऊंची ब्याज दर पर ली गई कर्जे की रकम. तीन साल में ब्याज मूल से ज्यादा हो गया और रेहन पर रखी गईं जमीनों के खसरे के सामने साहूकार के नाम चढ़ा दिए गए.

अकाल के वक्त सयाजीराव गायकवड़ (तृतीय) के कराए कामों में से एक मालावाड़ा में खोदा गया तालाब भी था. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
अकाल के वक्त सयाजीराव गायकवड़ (तृतीय) के कराए कामों में से एक मालावाड़ा में खोदा गया तालाब भी था. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

बहरहाल इसके बाद अकाल की चीजें ढर्रे पर आने लगी. देश आजाद हुआ. तालाब अपनी जगह पर बना रहा और उसके किनारे पर बसी दलित आबादी भी अपनी जगह पर बसी रही. गुजरात राज्य बनने के बाद धीरे-धीरे औद्योगिकीकरण शुरू हुआ. खेड़ा मुंबई और अहमदाबाद को जोड़ने वाली सड़क के किनारे बसा हुआ है. खम्भात महज चालीस किलोमीटर दूर है. ऐसे में जिले के 20-30 किलोमीटर के दायरे में कई उद्योग लगे. आजादी के बाद पी.जी. कुरियन यहां आ चुके थे. परम्परागत तौर पर दूसरों के खेतों में काम करने वाले दलितों के पास अब रोजगार के दूसरे विकल्प भी थे. इसने दलितों की आर्थिक स्थिति में सुधार किया लेकिन सामाजिक हैसियत जस की तस बनी रही.

वो पानी लेने गई थीं लेकिन पानी उतरवा कर आईं

चीजें अपनी गति से चल रही थीं. दलित खेतों में मजदूरी भी करते और फैक्ट्री में भी. ऐसे में आया 2014 का साल. अक्टूबर का महीना था. 21 अक्टूबर से दलित बस्ती में पानी आना बंद हो गया था. खरीफ की कटाई का समय था. बस्ती की औरतें सवेरे घर से निकलतीं तो देर रात तक घर लौटतीं. काम से थकी-हारी औरतों को घर आकर खाना बनाने के लिए पानी नहीं मिलता. एक बार के लिए वो कुएं से पानी भरकर भी ला सकती थीं पर जब यह काम उनकी शाम की दिनचर्या का स्थाई हिस्सा बनने लगा तो उन्होंने इसका विरोध शुरू कर दिया.

मालावाड़ा में आज भी दलित बस्तियों में पानी की सप्लाई इस तरह के नलों से होती है (फोटोःविनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)
मालावाड़ा में आज भी दलित बस्तियों में पानी की सप्लाई इस तरह के नलों से होती है (फोटोःविनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

एक शाम को औरतें काम से लौटीं और पानी भरने के लिए कुएं पर जुटने लगीं. कुएं पर ही यह तय हुआ कि ये सब बहुत दिन तक चल नहीं पाएगा. ऐसे में उन्होंने अपने खाली बर्तन उठाए और गांव के सरपंच विजयभाई परमार के घर की तरफ निकल गईं. कुआं अपनी जगह खड़ा-खड़ा सोचता रहा कि क्या दस साल बाद एक बार फिर से दलित लड़-झगड़कर अपना हक हासिल कर लेंगे? उसे अचानक से 1994 की घटना याद आ गई.

मार्च 1994 के दूसरे सप्ताह में आणंद की अमूल डेयरी ने तीन टेम्पो मालावाड़ा भेजे थे. मकसद था कि गांव-गांव से दूध भेजने वाले मेम्बरों को प्लांट दिखाया जाए कि कैसे उनका दूध पैक होकर देश के दूसरे हिस्सों में जाता है. मालावाड़ा के दलित भी गांव के दूसरे लोगों की तरह अमूल डेयरी के मेंबर थे. वो भी गांव के बाहर बने बस स्टॉप पर अमूल के टेम्पो का इंतजार कर रहे थे. गांव के दूसरे लोगों ने दलितों को यह कहते हुए टैम्पो से उतार दिया कि नीच जात के लोग उनके बराबर एक टेम्पो में नहीं बैठ सकते. बस स्टॉप पर ही काफी देर बकझक हुई लेकिन दलितों को बैरंग घर लौटना पड़ा.

आणंद की अमूल डेयरी, जहां मालावाड़ा के दलितों को दूध की प्रॉसेसिंद देखने जाना था
आणंद की अमूल डेयरी, जहां मालावाड़ा के दलितों को दूध की प्रॉसेसिंद देखने जाना था (फोटोःअमूल)

दलितों ने इस बेइज्जती के बदले में अमूल को दूध देना बंद कर दिया. जब यह बात अमूल के प्रबंधकों को पता लगी तो उन्होंने इस बात के लिए माफ़ी मांगकर मामला शांत किया. लेकिन गांव में रुकावट जस की तस बनी रही. दोनों गुटों में खूब जुबानी जंग हुई. दलितों ने इस छुआछूत के खिलाफ पास ही के लिम्बासी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवा दी.

तीन-चार दिन तक चली तनातनी के बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ. एक स्टाम्प पर समझौते का मसौदा लिखा गया. इसके मुताबिक तारीख 21 मार्च, 1994 के बाद से गांव के हर दलित को कुएं, मंदिर, दुकान, गाड़ी में बाकी गांववालों के बराबर बैठने का हक होगा. इस मसौदे पर हर गांव वाले ने हस्ताक्षर किए. इस तरह दलित महिलाएं पहली मर्तबा इस कुएं पर चढ़ पाईं.

मालावाड़ा में दलित बस्ती में पानी की किल्लत पर औरतों के प्रदर्शन पर एक गुजराती अखबार की रपट
मालावाड़ा में दलित बस्ती में पानी की किल्लत पर औरतों के प्रदर्शन पर एक गुजराती अखबार की रपट (2014)

दस साल बाद यानी 28 अक्टूबर 2014 को दलित महिलाओं की एक टुकड़ी गांव के सरपंच विजय भाई परमार के घर के सामने थी. वो उस वक़्त घर पर नहीं थे. उनकी मां और पत्नी ने महिलाओं से मुलाकात की. पानी की शिकायत से शुरू हुई बात जातिवादी बहस में बदल गई. महिलाओं का कहना है कि सरपंच की मां ने उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दीं. सरपंच के घर से महिलाएं बेइज्जत होकर लौटीं. ताव-ताव में रास्ते में पड़ने वाली पानी की सप्लाई लाइन फोड़ दी.

महिलाओं ने सारा वाकया रमन भाई मकवाना को आकर बताया. रमनभाई ग्राम पंचायत में उनके वार्ड की तरफ से पंच हुआ करते थे. उन्होंने मामला शांत करने के लिए सरपंच विजय भाई को फोन किया. विजय भाई ने उन्हें फोन पर ही भद्दी-भद्दी गलियां दीं. रमनभाई को समझ में आ गया कि माहौल काफी बिगड़ गया है. इसके बाद उन्होंने बस्ती के कुछ और लोगों के साथ जाकर पास ही के लिम्बासी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवा दी कि उनकी बस्ती पर हमला होने का खतरा है और उन्हें पुलिस सुरक्षा दी जाए.

मालावाड़ा में रहने वाले अमित मकवाना कहते हैं कि इस बार मैं किसी को भी वोट दूं लेकिन बीजेपी को वोट नहीं दूंगा.
मालावाड़ा में रहने वाले अमित मकवाना कहते हैं कि इस बार मैं किसी को भी वोट दूं लेकिन बीजेपी को वोट नहीं दूंगा.  (फोटोःविनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने के बाद बस्ती के लोग पुलिस सुरक्षा की बाट देख रहे थे. एक दिन बाद माने 29 अक्टूबर 2014 की शाम ढलते ही पुलिस बस्ती में आई. उनके हाथ में एक एफआईआर थी जिस पर बस्ती के चार लोगों अमित, राकेश, विपिन और रमनभाई का नाम दर्ज था. इन पर गांव की सरकारी पाइप लाइन को क्षति पहुंचाने का आरोप था. बस्ती के लोगों ने पुलिस का जमकर विरोध किया. उस रात चारों लोगों की कोई गिरफ्तारी न हो सकी. इसके बाद यह तय हुआ कि अगली सुबह सब लोग जिला मुख्यालय नडियाड जाएंगे.

30 तारीख की सुबह गांव की दलित बस्ती के हर घर से एक आदमी नडियाड पहुंचा. जब वो एसपी दफ्तर पहुंचे तो उन्हें पता लगा कि एसपी साहब किसी काम से कपडवंज गए हुए हैं. इसके बाद ये लोग डिप्टी एसपी के दफ्तर पहुंचे. यहां करीब डेढ़ घंटे की बातचीत के बाद यह फैसला हुआ कि दलितों के पानी की समस्या का जल्द से जल्द निराकरण किया जाएगा. चार लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर हटा ली जाएगी. दलितों की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा जाएगा. डिप्टी एसपी ने उन्हें समझौते को आखिरी रूप देने के लिए लिम्बासी पुलिस स्टेशन जाने की सलाह दी जहां इस मामले की सारी शिकायतें दर्ज थीं. शाम करीब छह बजे ये लोग लिम्बासी पहुंचे. दूसरी तरफ से विजयभाई परमार आए हुए थे. एसपी दफ्तर में तय हुआ मौसदा यहां समझौते में तब्दील हो गया. दलित पुरसुकून अपनी बस्ती की तरफ चले गए.

मालावाड़ा में दलितों की बस्ती पर अगड़ी जाति के लोगों के हमले में टूटा एक दरवाज़ा )
मालावाड़ा में दलितों की बस्ती पर अगड़ी जाति के लोगों के हमले में टूटा एक दरवाज़ा (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

और बत्ती कट गई

शाम आठ बजे के करीब बस्ती से थोड़ी सी दूर हनुमान जी के मंदिर के पास पटाखा दगने की आवाज सुनाई देने लगी. बस्ती के ही अमित मकवाना बताते हैं-

“हम तो अभी-अभी समझौता करके लौटे थे. हमारे दिमाग में कोई ऐसी बात आई ही नहीं कि हमला हो सकता है. दस दिन पहले ही दीपावली बीती थी. हमने सोचा कि बच्चे अपने बचे हुए पटाखों को ठिकाने लगा रहे हैं.”

बस्ती के घरों में खाना बन ही रहा था कि अचानक से हनुमान जी मंदिर के पास पचास से ज्यादा लोगों की समवेत स्वर में जय-जय की आवाज़ आने लगी. इसके बाद दलितों को समझ में आया कि असल में पूरी गोलबंदी उनके खिलाफ जुटी हुई है. बस्ती के दलितों के 60 के करीब घर थे. लोग तेजी से उठे और भीड़ आने पहले घर छोड़कर भागने लगे. कुछ गांव छोड़कर खेत की तरफ भागने लगे. कुछ लोगों ने बस्ती के पीछे जाकर शरण ली.

दलितों के घरों पर हमले के दौरान जो मिला, बरबाद कर दिया गया. एक टूटी हुई साइकिल.
दलितों के घरों पर हमले के दौरान जो मिला, बरबाद कर दिया गया. एक टूटी हुई साइकिल.

पांच मिनट के भीड़ बस्ती में घुस गई. जैसे-जैसे वो आगे बढ़ते रास्ते में पड़ने वाले हर स्ट्रीट लैम्प की लाइट काट ली जाती. जब वो बस्ती में पहुंचे तो चारों तरफ लगभग अंधेरा था. बस्ती में उस वक़्त ब्लॉक बिछाने के लिए रास्ता साफ़ किया जा रहा था. ऐसे में सड़क किनारे काफी तादाद में पत्थर एक जगह पर रखे हुए थे. ये पत्थर हमलावर भीड़ के हाथ लग गए और उन्होंने यह घरों पर बरसाने शुरू कर दिए. घरों के दरवाजे तोड़ दिए गए. घरों के अन्दर घुसकर तोड़-फोड़ की गई. हालांकि भीड़ के हाथ में महज 3-4 आदमी लगे जिनको मारा-पीटा जा सके लेकिन घरों में पर्याप्त आर्थिक नुकसान किया गया. भानुभाई मकवाना के घर से 23 हजार रुपए लूट लिए गए. एक भी घर का टीवी सलामत नहीं बचा था. दरवाजें तोड़ दिए गए. बर्तन-बिस्तर जो भी सामने पड़ा उसे बरबाद कर डाला गया. करीब एक घंटे से ज्यादा भीड़ बस्ती में रही. इसके एक घंटे बाद पुलिस गांव में पहुंची और उस रात इस हमले के खिलाफ नामजद मुक़दमा दर्ज किया गया.

अगले दिन गांव के दलित फिर से एसपी सचिन बादशाह के दफ्तर में थे. दो दिन पहले जिस हमले की आशंका वो जता रहे थे वो हो चुकी थी. एसपी के फोन करने के बाद लिम्बासी पुलिस स्टेशन में 19 लोगों की गिरफ्तारी की गई.

हाल के दिनों में दलितों पर अत्याचार की जो घटना ने सबसे ज़्यादा चर्चा का मुद्दा बनी, वो था ऊना में दलितों को बांध कर पीटा जाना. इसके बाद पूरे गुजरात में दलितों ने विरोध में रैलियां की थीं
हाल के दिनों में दलितों पर अत्याचार की जो घटना ने सबसे ज़्यादा चर्चा का मुद्दा बनी, वो था ऊना में दलितों को बांध कर पीटा जाना. इसके बाद पूरे गुजरात में दलितों ने विरोध में रैलियां की थीं

त्राज का दोराहा

लिम्बासी में गिरफ्तार किए गए 19 लोगों को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना जरूरी था. दिक्कत यह थी कि दो नवम्बर के रोज इतवार पड़ता था. कायदे के हिसाब से यह गांव मातर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में था लेकिन वो उस समय छुट्टी पर थे. दलित उत्पीड़न के मामले की सुनवाई करने के लिए न्यूनतम योग्यता फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट की होनी चाहिए. ऐसे में तय यह हुआ कि सभी आरोपियों को नडियाड कोर्ट में पेश किया जाएगा. नडियाड से एससी-एसटी सेल की डिप्टी एसपी फाल्गुनी पटेल आरोपियों को पेशी के लिए ले जाने लिम्बासी पहुंचीं.

लिम्बासी से यह बात तय होने के बाद किरीट भाई शॉर्टकट रास्ते से नडियाड पहुंचे. किरीट इसी गांव के रहने वाले थे और एक दलित अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था के साथ जुड़े हुए थे. नडियाड पहुंचकर उन्होंने जरूरी कानूनी दस्तावेज तैयार करवाए ताकि आरोपियों की जमानत रोकी जा सके.

इलाके में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं लगातार होती रहती हैं. अगस्त 2017 की द वीक की रिपोर्ट.
इलाके में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं लगातार होती रहती हैं. अगस्त 2017 की द वीक की रिपोर्ट.

किरीट याद करते हैं-

“उस दिन इतवार था. हमने कैसे-कैसे करके एक वकील को तैयार किया कि वो हमारे लिए जरूरी दस्तावेज बना दे. मैं सारे कागज लेकर नडियाड कोर्ट के बाहर खड़ा-खड़ा इन्तजार करता रहा. इस बीच मैंने डिप्टी एसपी फाल्गुनी पटेल को फोन भी किया. पटेल ने मेरा फोन काट दिया. करीब घंटे भर बाद मुझे खबर मिली कि उन लोगों को मातर कोर्ट में पेश कर दिया गया है  और सभी 19 आरोपियों को जमानत दे दी गई है. हमने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाने का फैसला किया.”

हाईकोर्ट में सुनवाई की दौरान फाल्गुनी पटेल अदालत के सामने पेश हुईं. उन्होंने जज के सामने बयान दिया कि उस दिन आखिर हुआ क्या था. दरअसल लिम्बासी और मालावाड़ा के बीच एक गांव पड़ता है त्राज. जैसे ही वो आरोपियों को लेकर आगे बढ़ रही थीं. मातर के स्थानीय बीजेपी विधायक केसरी सिंह सोलंकी वहां पहुंच गए. उन्होंने आरोपियों को मातर कोर्ट में पेश करने को कहा. इस पर कहासुनी शुरू हो गई. मातर विधायक ने फाल्गुनी को भद्दी-भद्दी गलियां दीं. यह बताते हुए फाल्गुनी अदालत में रोने लगीं. जब जज ने उनसे पूछा कि उन्हें क्या गलियां दी गईं तो फाल्गुनी का जवाब था कि वो कोर्टरूम में वो शब्द दोहरा नहीं सकतीं. इसके बाद जज का बयान अगले दिन की अखबारों की सुर्खियों में था. जज ने कहा-

“आपको सर्विस रिवॉल्वर क्यों दी जाती है?”

भाजपा नेता केसरी सिंह सोलंकी. इनपर खेड़ा डीएसपी से अभद्र भाषा में बात करने का आरोप लगा था. (फोटोःफेसबुक)
भाजपा नेता केसरी सिंह सोलंकी. इनपर खेड़ा डीएसपी से अभद्र भाषा में बात करने का आरोप लगा था. (फोटोःफेसबुक)

फाल्गुनी पटेल उस दिन अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाईं. इधर अमित मकवाना हैं जो 14 दिसम्बर के रोज अपना वोट डालने जाएंगे. उनके दिमाग में तीन साल पुराने इस किस्से ने गहरी छाप छोड़ी है. वो कहते हैं-

“वोट तो जरूर दूंगा. बस्ती के दूसरे लोगों को भी अपने साथ लेकर जाऊंगा. पिछली बार मोदी के नाम पर बीजेपी को वोट दिया था. बीजेपी ने इस बार फिर से केशरी सिंह को टिकट दिया है. उस आदमी ने हमारे मामले में अपनी जात के लोगों को बचाने के लिए जी-जान लगा दी थी. इस बार मैं किसी को भी वोट दूं लेकिन बीजेपी को वोट नहीं दूंगा.”

भीमराव अम्बेडकर संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष थे. इस देश का लोकतंत्र उनके लिखे संविधान पर टिका हुआ है. वो आज देश में दलितों के सबसे बड़े आइकन हैं. तो आखिर इस लोकतंत्र ने दलितों का कितना भला किया? जवाब में किरीटभाई कहते हैं-

“ हमें लोकतंत्र आने के बाद कम से कम अपनी बात कहने का हक़ तो मिला. पहले हम लोग बेज़बान थे. आज हम लोग अपने हक़ के लिए लड़ सकते हैं. कानून के तमाम प्रावधान है जो इस लड़ाई में हमारी मदद करते हैं”

मालावाड़ा में पिछले दो दशकों से दलित अधिकारों के लिए काम करते किरीट भाई
मालावाड़ा में पिछले दो दशकों से दलित अधिकारों के लिए काम करते किरीट भाई (फोटोः विनय सुल्तान / दी लल्लनटॉप)

किरीट भाई पिछले 20 साल से दलित उत्पीड़न ले खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं. इन कानूनी लड़ाइयों से हासिल क्या है?

“यह एक कड़वा सच है लेकिन दलित उत्पीड़न के मामले में ज्यादातर आरोपी बरी हो जाते हैं. 2015 में नडियाड डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दलित उत्पीड़न के 37 मुकदमें दर्ज हुए थे. इसमें से एक भी आरोपी को सजा नहीं हुई. सब के सब छूट गए. अदालत में बैठे हुए मजिस्ट्रेट भी कई बार बेहद असंवेदनशील होते हैं. एक बार कुछ दलित मजदूरों ने जाति सूचक शब्दों के इस्तेमाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया था. जो जज इसकी सुनवाई कर रहे थे वो सिख थे. उन्होंने भरी अदालत में कहा कि जैसे मैं सिख हूं तो अगर कोई मुझे सिखड़ा कहता है तो इसका बुरा नहीं मानना चाहिए. अब आप ऐसे जज से न्याय की कितनी उम्मीद रख सकते हैं?”

गुजरात में जब दलितों को मूछ रखने पर पीटा गया, तो सोशल मीडिया पर 'सेल्फी विद मूस्टैश' कैंपेन चला.
गुजरात में जब दलितों को मूछ रखने पर पीटा गया, तो सोशल मीडिया पर ‘सेल्फी विद मूस्टैश’ कैंपेन चला.

गुजरात में दलितों का उस किस्म का राजनीतिकरण नहीं है जैसा आप महाराष्ट्र या उत्तर प्रदेश में देखते हैं. यहां दलितों के घर पर न तो नीले झंडे हैं और न ही घर के भीतर बुद्ध और अम्बेडकर की तस्वीरें. उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व परम्परागत तौर पर कांग्रेस के डैनों के नीचे छिपा हुआ है. बीजेपी गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश और अल्पेश के खिलाफ समाज को तोड़ने की राजनीति करने का आरोप लगा रही है. लेकिन क्या समाज असल में कभीएकजुट था भी? मालावाड़ा के दलित पिछले तीन साल से गांव के भीतर जाने से बचते हैं. उनकी दीपावली, होली और क्रिसमस बस्ती के भीतर सिमटकर रह जाती है.


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खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

अलग हाव-भाव के चलते हिजड़ा कहते थे लोग, समलैंगिक लड़के ने फेसबुक पोस्ट लिखकर सुसाइड कर लिया

'मैं लड़का हूं. सब जानते हैं ये. बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएं, मेरा बोलना, सब लड़कियों जैसा है.'

ब्लॉग: शराब पीकर 'टाइट' लड़कियां

यानी आउट ऑफ़ कंट्रोल, यौन शोषण के लिए आमंत्रित करते शरीर.

औरतों को बिना इजाज़त नग्न करती टेक्नोलॉजी

महिला पत्रकारों से मशहूर एक्ट्रेसेज तक, कोई इससे नहीं बचा.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.