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'कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है' वाले ख़य्याम को भाई ने थप्पड़ मारकर क्यों घर से निकाल दिया था?

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दुनिया भर के सिनेमा में ऐसा बहुत ही कम होता होगा कि किसी किरदार को गाना गाते हुए फिल्माया जाए. लेकिन आप भारत में बनी किसी फिल्म में गाने ना होने की कल्पना नहीं कर सकते. इसकी एक वजह पारसी थियेटर को बताया जाता है, जिसका भारतीय सिनेमा पर गहरा असर रहा. पारसी थियेटर में भर-भरकर गानों का इस्तेमाल होता था और वहां से ही ये परम्परा हिंदी सिनेमा में भी आ गई. किसी भी म्यूजिक डाइरेक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है अदाकार और गायक की आवाज के बीच के अंतर को पाट पाना. फर्ज कीजिए कि किसी अदाकारा की आवाज पतली है और उस पर मोटी आवाज़ में गाया गाना फिल्माया जाए तो यह परदे पर अंतर्विरोध पैदा करेगा. यह एक जटिल संतुलन था और 1981 के साल में ख़य्याम इसे साधने की मशक्कत कर रहे थे.

1899 में छपे मिर्ज़ा हादी रुस्वा के तारीखी नॉवेल ‘उमराव जान अदा’ पर मुज़फ्फर अली फिल्म बना रहे थे. यह अवध की एक ज़हीन तवायफ़ की कहानी थी, जिसे परदे पर उतारने की जिम्मेदारी रेखा के कंधों पर थी. फिल्म में शहयार की लिखी नज्मों का इस्तेमाल होना था और इसके लिए सुर-ताल बुनने की जिम्मेदारी खैय्याम को दी गई थी. कहानी अवध की थी. लिहाज़ा आवाज़ और उर्दू दोनों में नफ़ासत, किरदार की मांग थी.

दीनानाथ मंगेशकर की दो बेटियां लता और आशा उस दौर में हिंदी सिनेमा की सबसे सुरीली आवाज हुआ करती थीं. लेकिन दोनों एक दूसरे से अलहदा. जहां लता की पहचान अपनी पतली और नाजुक आवाज़ की वजह से थी, उनकी बहन आशा ऊंचे सुर में गाने की मुरीद थीं. ख़य्याम ने इस फिल्म के सबसे चर्चित गाने ‘दिल चीज़ क्या है?’ को आवाज देने के लिए आशा को लेने का फैसला किया.

जैसे ही गाने की रिकॉर्डिंग शुरू हुई आशा खिसिया गईं. उन्होंने ख़य्याम की बीवी यानी साथी गायिका जगजीत को बुलाकर कहा कि ‘ख़य्याम साहब ने कौन सा सुर रख लिया है? मेरा सुर भूल गए हैं? मैं गा नहीं पा रही हूं.”

ख़य्याम शोर-शराबे को सुनकर मौके पर पहुंचे. बेहद धीमी लेकिन फैसलाकुन आवाज में उन्होंने कहा,

‘मैंने जानबूझकर सुर नीचे रखा है, क्योंकि आप आशा नहीं हैं, उमराव जान हैं.

स्टूडियो में एकदम सन्नाटा छा गया. ख़य्याम, जगजीत और आशा में सुरों को लेकर डिफरेंसेज थे. सबको डर था कि कहीं आशा जी वॉकआउट न कर जाएं. आखिर में गाने की रिकॉर्डिंग पूरी हुई. रिकॉर्डिंग रूम का दरवाजा जैसे ही खुला. आशा जी बाहर आईं और अचरज में बोलीं, ये मेरी आवाज थी? क्या ये मैं गा रही थी? ख़य्याम साहब आज के बाद आप मेरे गाने इसी सुर पर रिकॉर्ड कीजिएगा. ’  

गाना जब पब्लिक में आया तो इतिहास बना, आशा भोसले को इस फिल्म के गानों के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला. इसी फिल्म के लिए ‘ख़य्याम साहब’ को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला. सोमवार रात, करीब 9 बजे, मुंबई के अस्पताल में हिंदी सिनेमा का ये नायाब तारा हमेशा के लिए दूर चला गया. ख़य्याम साहब हिंदी गीतों में ‘शेरों-शायरी’ और गजल लाने वाले शुरुआती पैगम्बर थे. तो जानते हैं उनकी जिन्दगी के दूसरे किस्से..

खय्याम साहब और सोनू निगम
ख़य्याम साहब और सोनू निगम

#1. फिल्में देखने पर टोका तो घर से भाग गए
ख़य्याम साहब कक्षा 5 में पढ़ा करते थे. उनका फ़िल्में देखना घर वालों को बिल्कुल भी पसंद नहीं था. तो उनकी रोज-रोज की किच-किच से परेशान होकर ख़य्याम घर से भाग निकले. सीधे अपने चाचा के यहां दिल्ली पहुंच गए. यहीं पर पंडित अमरनाथ और पंडित हंसलाल भगतराम से उन्होंने संगीत की तालीम ली. चूंकि उनका बचपन का सपना तो फिल्म एक्टर बनना था, इसलिए लाहौर पहुंच गए. उस दौर में लाहौर बम्बई के बाद दूसरा बड़ा शहर हुआ करता था, जहां हिन्दुस्तानी ज़बान में फिल्में बना करती थीं. लेकिन वहां किसी ने भी उन्हें नहीं पूछा. एक्टर बनने का उनका सपना धुंधला पड़ गया. लेकिन लाहौर में एक अच्छी बात हुई. फाकाकशी के दौर में उनकी मुलाकात बाबा चिश्ती से हो गई. बाबा चिश्ती उस समय के टॉप के ‘म्यूजिक डायरेक्टर’ हुआ करते थे. उन्हें ख़य्याम खूब पसंद आए. उन्होंने ख़य्याम को अपना पर्सनल असिस्टैंट बनने का ऑफर दिया. लेकिन दिक्कत ये थी कि इसके बदले कुछ भी पैसे नहीं मिलने थे. ख़य्याम साहब ने मुफ्त में ही काम करने को मंजूर कर लिया. इस तरह संगीत की दुनिया के इतने बड़े नायक का सफर मुफ्त में खटने से शुरू हुआ था.

#2. जब भाई ने कहा फूटी कौड़ी नहीं दूंगा
बाबा चिश्ती के यहां काम करते समय उन्हें केवल खाना-पीना और रहना भर ही मिलता था. पैसे नहीं मिलते थे, इसलिए उन्हें पैसों का ‘टोटा’ लगा ही रहता था. जब भी किसी रेस्टोरेंट में जाते थे, तो उनके दोस्त ही उनका पेमेंट किया करते थे. ख़य्याम को दूसरों द्वारा उनके पैसे देना अच्छा नहीं लगता था. लेकिन घर में से कोई भी उनके सपोर्ट में था नहीं, इसलिए घर से पैसे मांगने की, उनकी हिम्मत ही नहीं होती थी. लास्ट में उन्होंने अपने भाई से पैसे मांगने की सोची. ख़य्याम अपने भाई के घर पहुंच गए, उन्होंने अपने भाई को बताया कि उन्हें फिल्मों में काम मिल गया, शुरू में उनका भाई खूब इम्प्रेस हुआ, लेकिन थोड़ी ही देर में ही मामला एकदम पलट गया जब उनके भाई ने पूछा ‘कितने कमाते हो?’

ख़य्याम ने जैसे ही बताया कि फ़िलहाल तो फोकट में ही ख़ट रहा हूं, तो भाई ने ख़य्याम पर खिसियाते हुए कहा –
‘फिल्म के चक्कर ने तुम्हारी जिन्दगी बर्बाद कर दी है, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता’ 

भाई यहीं पर नहीं रुका. ख़य्याम के कान के नीचे एक तमाचा रसीद करते हुए कहा –
‘बेगार में खटने वाले को तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा’

खय्याम बचपन से ही हीरो बनना चाहते थे लेकिन बन गए संगीतकार
ख़य्याम बचपन से ही हीरो बनना चाहते थे लेकिन बन गए संगीतकार.

#3. दूसरे वर्ल्ड वॉर में सैनिक बन गए थे
अपने भाई की इस प्रतिक्रिया से ख़य्याम ने बड़ा अपमानित महसूस किया. यह वह समय था जब पूरी दुनिया में द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था. ख़य्याम अंग्रेजों की सेना में भर्ती हो गए. तीन साल काम किया. कुछ पैसे भी जमा कर लिए. लेकिन वहां भी उनका मन नहीं लगा, उन्होंने दोबारा से सिनेमा में ही काम खोजने का मन बना लिया. और फ़ौज की नौकरी छोड़ दोबारा से अपने गुरु बाबा चिश्ती के पास ही पहुंच गए. बाबा चिश्ती ने उनको दोबारा से अपने यहां असिस्टैंट बना लिया. 

#4. जब बी.आर. चोपड़ा उनके हक के पैसे के लिए लड़े
साल 1947 के आसपास बी. आर. चोपड़ा एक फिल्म बना रहे थे. इस फिल्म का संगीत बाबा चिश्ती को तैयार करना था. तब ख़य्याम साहब उनके असिस्टैंट हुआ करते थे. एक दिन की बात है सबको पेमेंट दिया जा रहा था, लेकिन ख़य्याम साहब को नहीं दिया गया. बी. आर. चोपड़ा ने ये देखा तो उन्होंने बाबा चिश्ती से इसके बारे में पूछा. बाबा चिश्ती ने जवाब दिया कि ख़य्याम अभी अनपेड है. इस बात को सुनकर चोपड़ा ने कहा, ‘ये लड़का मेहनती है, सबसे पहले स्टूडियो में पहुंचता है, इसे पैसे दिए जाने चाहिए’. आखिर में चोपड़ा ने ही ख़य्याम के लिए 125 रुपए महीने के बांध दिए. यही ख़य्याम की पहली कमाई थी. उस समय 125 रुपए पर्याप्त रकम हुआ करती थी. ख़य्याम साहब ने एक इंटरव्यू में बताया कि यही वो वक्त था जब उन्हें लगा कि हां! म्यूजिक से भी एक ठीक-ठाक जिन्दगी काटी जा सकती है.

खय्याम साहब की पत्नी जगजीत कौर भी अपने समय में फेमस सिंगर रही हैं.
ख़य्याम साहब की पत्नी जगजीत कौर भी अपने समय में फेमस सिंगर रही हैं.

#5. अपने टैलेंट के बूते राज कपूर को मना लिया
फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद साहिर लुधियानवी और ख़य्याम अच्छे दोस्त बन गए थे. उस समय रमेश सहगल एक फिल्म बनाना चाहते थे जिसका नाम था फिर सुबह होगी (1958). ये फिल्म रशियन लेखक दोस्तोवस्की के अमर उपन्यास क्राइम एंड पनिशमेंट पर आधारित थी. इस फिल्म के हीरो थे राज कपूर. राज कपूर अपनी फिल्मों में संगीत के लिए नौशाद और शंकर जयकिशन के अलावा किसी और पर विश्वास नहीं करते थे. लेकिन साहिर लुधियानवी को लगता था कि इस फिल्म के संगीत को इन दोनों में से कोई भी उतने अच्छे से नहीं कर पाएगा, जितने अच्छे से ख़य्याम कर पाएंगे. साहिर उस दौर के अकेले शायर थे जो पहले बोल लिखा करते और म्यूजिक डाइरेक्टर बोल के हिसाब से धुन तैयार किया करते. सामान्य तौर पर पहले धुन तैयार होती है और गाना बाद में लिखा जाता है. इस बात को लेकर साहिर और शंकर-जयकिशन के बीच काफी हुज्जत होती थी. 

50 के दशक की शुरुआत में ख़य्याम संगीत की दुनिया में अपने पैर जमा रहे थे. इसलिए डायरेक्टर रमेश सहगल ने साहिर से कहा कि इसके लिए पहले राज कपूर को मनाना पड़ेगा. डायरेक्टर रमेश सहगल ने राज कपूर और ख़य्याम दोनों की एक मीटिंग सेट कर दी. ख़य्याम ने अपने टैलेंट के दम पर राज कपूर को कन्विंस कर लिया. ख़य्याम ने इस फिल्म में ऐसा संगीत दिया कि इसकी चारों ओर तारीफ हुई. इस किस्से को याद करते हुए खय्याम बताते हैं – ‘आशा जी इसी फिल्म के गाने, वो सुबह कभी तो आएगी… की रिहर्सल कर रही थीं. आशा बोलीं, ख़य्याम साहब आपकी सुबह तो हो गई.’

यह फिल्म सच में खैय्याम के करियर के लिए सुबह साबित हुई.

#6. फिल्मी हीरो की तरह शादी की
ख़य्याम मुस्लिम थे और उनकी प्रेमिका जगजीत कौर एक एलीट पंजाबी फैमिली से थीं. दोनों को प्यार हो गया. जगजीत के परिवार वाले नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी एक मुस्लिम से शादी करे. लेकिन लास्ट में दोनों के प्यार की ही जीत हुई. बॉलीवुड में भी इस लिहाज से ये कपल अनोखा था. ख़य्याम इतने प्रोग्रेसिव और खुले विचार वाले थे कि अपने कमरे में सब धर्मों की तस्वीरें लगाकर रखते थे. अपनी अलमारी में गीता, कुरआन, बाइबिल तीनों रखते थे. एक बार उनके बेटे प्रदीप ने ख़य्याम से पूछा – ‘पापा, आप मुस्लिम हैं, मम्मी सिख हैं तो क्या मैं हिन्दू धर्म अपना सकता हूं?
इस पर ख़य्याम ने उत्तर दिया – ‘क्यों नहीं?’
धर्म के नाम पर मारकाट कर देने के इस दौर में किसी परिवार का इससे अच्छा नजारा क्या ही हो सकता है?

अपनी पत्नी जगजीत के साथ खय्याम साहब
अपनी पत्नी जगजीत के साथ ख़य्याम साहब.

#7. आखिरी दिनों में भी इंसानियत वाला काम किया
पैसों के लिए अपने ही भाई से अपमानित होने वाले ख़य्याम नहीं चाहते थे कि आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों को ये अपमान सहना पड़े. इसके लिए ख़य्याम और उनकी पत्नी ने एक ट्रस्ट बनाया जिसका काम आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों की मदद करना है. 18 फरवरी 2016 को खय्याम ने अपनी सारी संपत्ति इसी ट्रस्ट को दान कर दी. उनकी संपत्ति की कीमत 10 करोड़ से ज्यादा थी.

‘कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है’ जैसा संगीत देने वाले ख़य्याम साहब अब ख्यालों में ही याद आएंगे, मुंबई के एक अस्पताल में ‘संगीत’ की दुनिया का ये सूरज हमेशा के लिए अस्त हो गया.


ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे श्याम ने की है.


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