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बिहार का वो सीएम, जिसका एक लड़की के किडनैप होने के चलते करियर खत्म हो गया

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का दौर. भागलपुर के सुल्तानगंज इलाके में कुछ नौजवानों को खबर लगी कि सरकारी असलहों से लदी एक ट्रेन दिल्ली से कलकत्ता जाएगा. इसे लूटने का प्लान बनने लगा. योजना ये थी कि शहर के बाहर सुनसान इलाके में रेलवे लाइन की फिश प्लेट खोली जाए. फिश प्लेट दो पटरियों को जोड़ती है. जोड़ खुला तो ट्रेन पटरी से उतरी. और फिर लूट आसान हो जाएगी.

इस प्लान की जानकारी वक्त रहते ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों को लग गई. उन्होंने मौके पर दबिश दी तो लड़के नजर आ गए. पुलिस ने फायर खोल दिया. कई प्रदर्शनकारी जख्मी हुए. इनमें भागलपुर के टीएनबी कॉलेज का एक लड़का भी था. भागवत झा. उसे जांघ पर गोली लगी और फिर जो गिरा तो सर पर भी जबरदस्त चोट. भागवत बेहोश हो गया. लेकिन आसपास खबर फैल गई कि भागवत मर गया. तमाशबीनों और जानने वालों की भीड़. पुलिस पहले जख्मी प्रदर्शनकारियों को गिरफ्त में लेकर अस्पताल रवाना हो रही थी. तय हुआ कि जो मरे, उन्हें बाद में उठाया जाएगा. लेकिन उससे पहले ही भागवत को होश आ गया. फिर जानने वालों की मदद से जख्मी भागवत वहां से रफू चक्कर हो गए. बाकी गिरफ्तार, मगर वो रहे आजाद.

और यहीं से आजाद शब्द उनके नाम के आगे जुड़ गया. ये आजाद तबीयत आदमी एक दिन बिहार का मुख्यमंत्री बना. जबकि इस पद पर न कभी उसकी दावेदारी थी, न हसरत. मगर जब कुर्सी मिली तो उसने किसी की नहीं सुनी. पैरवी और करप्शन करने वालों को झिड़का और इसीलिए उसकी छवि घूसट मगर ईमानदार बूढ़े की हो गई. क्या थी उनकी इस पद पर पहुंचने की कहानी. और फिर भागलपुर से एक लड़की के किडनैप होने ने कैसे उनका करियर खत्म कर दिया.

अंक 1

नेहरू की पर्ची वाली हिदायत

दिल्ली के तीन मूर्ति भवन की बात है. 1951 का साल खत्म होने का था. प्रधानमंत्री नेहरू उस दिन लोकसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक टिकटार्थियों से मिल रहे थे. इसमें अविभाजित बिहार के गोड्डा जिले के महगामा के रहने वाले भगवत भी थे. उनकी पर्ची पर लिखा था, भागवत झा. नेहरू ने टेरा लगाया और पूछा, बायोडेटा में तो भागवत झा आजाद लिखा है, तुम वही हो क्या.

फिर भागवत ने उन्हें इस आजाद का किस्सा सुनाया. तब नेहरू बोले,

अब अपने नाम से आजाद शब्द कभी मत हटाना. पर्ची में भी नहीं.

फिर भागवत झा आजाद को गोड्डा का टिकट मिल गया. आजाद ने नेहरू को दिए कौल को याद रखा और इसी नाम से पर्चा भरा. जीत भी गए. लेकिन 1957 का चुनाव वह हार गए. इसके दो बरस बाद उनकी किस्मत चमकी. 1959 में नेहरू प्रधानमंत्री थे और उनकी बेटी इंदिरा यूएन ढेबर के बाद कांग्रेस अध्यक्ष बन गई थीं. ऐसे में नेहरू ने इंदिरा की मदद के लिए भागवत को उनका सचिव बना दिया. पार्टी के काम से अब भागवत को रोजाना तीन मूर्ति भवन जाना होता था. यहीं से उनकी गांधी परिवार के साथ पक्की नजदीकी हो गई.

अगले लोकसभा चुनाव में आजाद ने गोड्डा के बजाय बगल की भागलपुर सीट से पर्चा भरा. यहां से वो आसानी से जीत गए. एक 1977 का अपवाद छोड़कर हमेशा. 1989 तक सांसद रहे. फिर चुनाव नहीं लड़े. इंदिरा गांधी की पहली दो सरकारों में राज्यमंत्री भी रहे. लेकिन इन्हीं इंदिरा के एक फैसले से भागवत कुपित भी हुए. और फिर जो हुआ वो अभूतपूर्व था.

अंक 2

पर्चा पढ़ा और शपथ से खिसक लिए

1980 के पहले हफ्ते में लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके थे. इंदिरा गांधी मंत्रिपरिषद के साथ शपथ लेने को तैयार थीं. मंत्रियों की सूची में भागलपुर सांसद भागवत झा भी थे. लेकिन राष्ट्रपति भवन के अशोक हॉल पहुंचने पर उन्होंने कुछ पढ़ा और फिर गोलमाल हो गए. दरअसल मंत्री पद के लिए चुने गए नेताओं को शपथ पत्र दिया जाता है. भावत ने अपना पत्र पढ़ा तो उन्हें पता चला कि राज्यमंत्री बनाए जा रहे हैं. लेकिन ये ओहदा तो उन्हें 13 साल पहले मिल चुका था. अब उनकी उम्मीद कैबिनेट की थी.

आजाद ने कुछ मिनट गुणा गणित किया और फिर चुपचाप अशोक हॉल से निकलकर संसद के सेंट्रल हॉल में आ गए. वहां उन्हें बिहार से आने वाले हरिकिशोर सिंह, महंत श्याम सुंदर दास जैसे नेता एक मेज पर दिखे. आजाद वहीं पहुंच गए. उन्हें देख कुछ पत्रकार भी आ गए. आजाद अब खुलने लगे. बोले,

“मैं पाँचवी बार जीतकर आया हूँ. कोई बैक डोर (राज्यसभा) की राजनीति नहीं करता. पहली लोकसभा से संसद पहुँच रहा हूँ. लेकिन मुझे राज्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाने की बात करना मेरी तौहीन नहीं तो और क्या है?.”

इंदिरा ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी. कुछ नहीं. 10 महीने बाद नवंबर 1980 में इन्दिरा गांधी ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तब समझा बुझा कर भागवत झा आजाद को मंत्री बनने के लिए तैयार किया. लेकिन याद रखिए, कैबिनेट मंत्री उन्हें अब भी नहीं बनाया गया. उन्हें राज्य मंत्री के तौर पर ही शपथ दिलाई गई लेकिन श्रम मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दे दिया गया.

अंक 3

जब भागवत झा आजाद मुख्यमंत्री बने

1988 आते आते बिहार में जगन्नाथ मिश्र, चंद्रशेखर सिंह के बाद बिंदेश्वरी दुबे सीएम बन चुके थे. उनके राज में जातीय नरसंहार, गुटबाजी और प्रशासनिक अक्षमता चरम पर थी. ऐसे में प्रधानमंत्री और इंका अध्यक्ष राजीव गांधी ने उन्हें हटाने का फैसला किया. अगला फैसला होना था, किसे चुना जाए.

पहले दावेदार थे जगन्नाथ मिश्र, विधायक दल पर तगड़ी पकड़. मगर राजीव उनसे सख्त नापसंद करते थे भ्रष्ट छवि के चलते.

दूसरे दावेदार थे भीष्म नारायण सिंह, लेकिन राजीव उन्हें कैबिनेट से असम भेज चुके थे गवर्नर बनाकर. वहां के हालात संवेदनशील थे.

तीसरे दावेदार, पार्टी के कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी. मगर उनके नाम पर विधायक सहमत नहीं होते और फिर लोकसभा चुनाव के दौरान फंड मैनेजमेंट भी देखना था.

चौथे दावेदार थे, सतेंद्र नारायण सिंह. दशकों पुराने कांग्रेसी. मगर इंदिरा के जमाने में हुए विभाजन के बाद वो संगठन कांग्रेस में रह गए थे और कुछ बरस पहले ही इंका में लौटे थे.

पांचवे दावेदार थे बक्सर के सांसद और राजीव के मुंहलगे विदेश राज्यमंत्री केके तिवारी.

राजीव ने सबकी दावेदारी किनारे धर दी और अपने एक बुजुर्ग मंत्री को तलब किया और कहा,

“आप मुख्यमंत्री बनकर पटना जाइए और बिहार को संभालिए. हम यहां दिल्ली में आपके बेटे को एडजस्ट कर लेंगे.”

मंत्री ने जवाब दिया,

“पटना तो मैं चला जाऊँगा लेकिन यह एडजस्ट करने वाली बात न करें. मैं उस टाइप का आदमी नहीं हूं, जिसकी सोच सिर्फ अपने परिवार तक सीमित होती है.”

ये मंत्री भागवत झा आजाद थे. आजाद पटना पहुंचे. 11 फरवरी 1988 को इंका विधायक दल की बैठक हुई. दो सौ में 80 के लगभग विधायक आए और नेता चयन की औपचारिकता पूरी हो गई.

14 फरवरी को जब उन्होंने शपथ ली तो पाटलिपुत्र के घाघ सकते में आ गए. आजाद ने बिंदेश्वरी दुबे मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे कई मंत्रियों को चलता कर दिया. इसमें रामाश्रय प्रसाद सिंह और रामलखन सिंह यादव जैसे कद्दावर नाम भी थे.

कुछ दिनों बाद मंत्री पद के आदी हो चले एक नेता जी फूलों की माला ले आजाद के घर पहुंच गए. आजाद ने उन्हें बुरी तरह झिड़कते हुए कहा,

“आप तीसरी बार माला लेकर आए हैं. ये सब करने से आप कोई मंत्री बन जाइयेगा क्या? जाइए, अपना काम करिए.”

ये ट्रेलर था, पिक्चर अभी बाकी थी.

 भागवत झा की न तो कभी सीएम पद की हसरत थी और न दावेदारी, मगर जब कुर्सी मिली तो उसने किसी की नहीं सुनी.
भागवत झा की न तो कभी सीएम पद की हसरत थी और न दावेदारी, मगर जब कुर्सी मिली तो उसने किसी की नहीं सुनी.

अंक 4

माफियाओं का नया काल

भागवत झा आजाद ने पहला वार किया को-ऑपरेटिव माफियाओं के खिलाफ. उस वक्त प्रदेश इंका के अनेक प्रभावशाली लोग और उनके सगे-संबंधी राज्य के अलग-अलग जिलों में फैले को-ऑपरेटिव बैंको और सोसाइटियों पर कुंडली मारकर बैठे थे. को-ऑपरेटिव बैंकों पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का कोई सीधा नियंत्रण नहीं होता इसलिए यहाँ घपलेबाजी आसान थी. इसे रोकने के लिए सीएम ने तीन सख्त आईएएस तैनात किए बीके, पीके और आरके.

1. बिहार स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक : इसकी जिम्मेदारी बी के सिन्हा को दी गई.

2. बिहार स्टेट को-ऑपरेटिव मार्केटिंग यूनियन – इसे पी के बसु के हवाले किया गया.

3. बिहार स्टेट को-ऑपरेटिव लैंड डेवलपमेंट – इसकी कमान मोदी सरकार में एनर्जी मिनिस्टर और आरा के सांसद और उस वक्त आइएएस आरके सिंह को दी गई.

इंकाई दिल्ली तक दौड़ लगाने लगे. को ऑपरेटिव गया तो संगठन हिल जाएगा. मगर राजीव ने आजाद को फ्री हैंड देकर भेजा था.

दूसरा वार हुआ धनबाद को कोल माफिया और दूसरे जिलों के संगठित अपराधियों पर. इसमें भी शुरुआती सफलता मिली. इसे मुकम्मल करने के लिए आजाद एमपी काडर के आईपीएस अधिकारी एस. एम. कुरैशी को डीजीपी बनाकर बिहार ले आए. इससे बिहार काडर के अधिकारियों में कुछ रोष भी हुआ.

आजाद ने नक्सली और जातीय हिंसा से प्रभावित गया, औरंगाबाद, जहानाबाद में ऑपरेशन सिद्धार्थ भी शुरु किया. इस ऑपरेशन के तहत इन जिलों में समाज के कमजोर तबके के लोगों की तरक्की के लिए कदम उठाए जाने थे. इसमें सबसे जरूरी था भूमि सुधार. इसका जिक्र आते ही जमींदार भड़क उठे. उनका इंका पर अच्छा होल्ड था. ऐसे में आजाद को थमना पड़ा.

अंक 5

गवर्नर से मोटर बोट का झगड़ा

आजाद जब ये सब सख्त कदम उठा रहे थे तो कई वर्गों से उनके सींग फंस भी रहे थे. विधायक ट्रांसफर, पोस्टिंग या पैरवी लेकर आते तो आजाद उन्हें झिड़क देते. कई बार बात गाली गुल्ला के अंदाज में भी हो जाती. बिहार में शिक्षा महकमे की अपनी पॉलिटिक्स थी. आजाद ने जगन्नाथ मिश्र खेमे के दो वीसी चलता किए तो नेता जी और भड़क गए. मिश्र ने अपने पाले के अल्पसंख्यक नेताओं से आजाद के खिलाफ बयान दिलवाने शुरू कर दिए.

विधानसभा के अंदर भी यही हाल था. स्पीकर थे भागलपुर से आने वाले शिवचंद्र झा. उनकी भागवत झा से बिलकुल भी नहीं बनती थी. शिवचंद्र पत्रकारों के सामने बोलते थे. मुख्यमंत्री के भागलपुर में बैठे पिट्ठू मेरे खिलाफ बयानबाजी करते रहते हैं और मैं बोलूं, तो आलाकमान के पास दौड़ लगा जाते हैं.

ये तो विधायकों की बात हो गई. मुख्यमंत्री की रार गवर्नर से भी ठन गई. आजाद के शपथ लेने के कुछ ही दिनों बाद एमपी के पूर्व सीएम गोविंद नारायण सिंह पटना के राजभवन में आए. और आते ही सक्रिय हो गए. सीएम और गवर्नर के बीच पहली मुठभेड़ हुई यूनिवर्सिटी में वीसी लगाने को लेकर. फिर गोविंद राज्य का दौरा करने लगे और हर जिले में कानून व्यवस्था की समीक्षा भी. आजाद ने इसकी शिकायत प्रभारी महासचिव ऑस्कर फर्नांडिस और प्रधानमंत्री राजीव गांधी से की. कुछ महीनों बाद छठ आया तो ये दोनों नेता मोटर बोट पर भिड़ गए.

छठ पर्व से पहले गवर्नर ने पटना के गंगा घाट पर व्यवस्थाओं का आकलन खुद जाकर करने का फैसला किया. प्रशासन ने कहा, सर मोटर बोट उपलब्ध नहीं है. गोविंद नारायण फिर भी पहुंच गए. उन्होंने देखा, गंगा की धार पर एक मोटरबोट घूम रही है और उस पर मुख्यमंत्री सवार हैं. महामहिम ने इसकी शिकायत गृह मंत्री बूटा सिंह तक पहुंचाई.

लेकिन ये शिकायतें आजाद को हटाने के लिए काफी नहीं थी.

भागलपुर से एक लड़की के किडनैप होने ने भागवत झा को अपना सीएम पद छोड़ना पड़ गया था.
भागलपुर से एक लड़की के किडनैप होने ने भागवत झा को अपना सीएम पद छोड़ना पड़ गया था.

अंक 6

पापरी बोस अपहरण कांड

तारीख थी 17 दिसंबर 1988. भागलपुर शहर के लिए ये सामान्य दिन जल्द ही सनसनीखेज हो गया. खबर फैली कि इंका के छात्र संगठन एनएसयूआई (N.S.U.I.) का जिला अध्यक्ष प्रवीण सिंह एक स्थानीय डॉक्टर के घर में घुसा. असलहों से लैस सिंह ने डॉक्टर की बेटी पापरी घोष का बंदूक की नोंक पर अपहरण कर लिया. कई लोगों ने प्रेम का दावा भी किया. लेकिन भागलपुर के बंगाली समाज और फिर सर्वसमाज के लोग इस जबरई से आंदोलनरत हो गए.

प्रवीण सिंह मुख्यमंत्री का खास माना जाता था. लड़की को लेकर वो सीधे पड़ोस के गोड्डा जिले में मुख्यमंत्री के मैन फ्राइडे ओंकारनाथ राम के घर गया. फिर वहीं से पापरी का कागजों के मार्फत बयान आया कि मैंने बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से प्रवीण सिंह से शादी की है.’

लेकिन भागलपुर के लोग इस सफाई को सुनने को तैयार नहीं थे. शहर 3 दिनों तक बंद रहा. आजाद सफाई देते रहे, ‘प्रवीण सिंह से मेरा कोई संबंध नहीं और पापरी जल्द बरामद होगी’. ऐसा हुआ भी. फिर घोष परिवार हमेशा के लिए शहर छोड़ चला गया. और राजीव ने आजाद को छोड़ने का फैसला कर लिया. मार्च 1989 में उनसे हाथ जोड़ लिए गए और कमान एक और वेटरन सतेंद्र नारायण सिंह को सौंप दी गई. इसके बाद आजादी की सियासत गुम गई. उन्होंने 1989 का लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ा.

आजाद के तीन बेटे थे. एक डॉक्टर बना, दूसरा आईपीएस और तीसरा क्रिकेटर. कीर्ति झा आजाद ने 1983 का वर्ल्ड कप खेला और फिर सियासत में भी भाजपाई टर्फ पर लंबी पारी. अरुण जेटली से लंबी लड़ाई के बाद फिलहाल कीर्ति कांग्रेस में हैं. और उनके कांग्रेसी पिता भागवत, उनका 2011 में निधन हो गया.


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