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जब पता भी नहीं था कि वनडे क्या होता है, तब मज़े-मज़े में विश्व कप में मैच जीत गया भारत!

विश्वकप 2011 के बाद विश्वकप 2015 हो या 2019. भारतीय टीम की पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ एक हार भी क्रिकेट जानकार पचा नहीं पाते. वजह है टीम इंडिया का खेल. मौजूदा समय में एमएस धोनी के बाद विराट कोहली की कप्तानी में टीम इंडिया वनडे क्रिकेट की बादशाह है. इसीलिए लगभग सालभर पहले जब भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड के हाथों सेमीफाइनल में हारकर बाहर हुई, तो किसी के लिए भी ये यकीन करना आसान नहीं था.

अब आपको लेकर चलते हैं लगभग 50 साल पीछे. जब विराट की टीम का एक भी खिलाड़ी पैदा नहीं हुआ था. इस टीम का क्या, सचिन तेंडुलकर वाली जेनरेशन के खिलाड़ी भी तब नहीं थे. हम बात कर रहे हैं साल 1971 की. 1971 में पहली बार वनडे क्रिकेट का नाम दुनिया ने सुना.

जब हुई वनडे क्रिकेट की शुरुआत:
साल था 1971. ऑस्ट्रेलिया में ऐतिहासिक एशेज़ सीरीज़ चल रही थी. लेकिन खराब मौसम की वजह से मेलबर्न में खेले जाने वाले तीसरे टेस्ट के पहले तीन दिन का खेल बारिश की वजह से बर्बाद हो गया. इसके बाद अधिकारियों ने इस मैच को रद्द किया और टेस्ट सीरीज़ के बीच में ही एक 40 ओवर का मैच खेलने का फैसला किया. इस मैच में तेज़-तर्रार गेंदबाज़ी, बल्लेबाज़ी फील्डिंग सब थी. इसे वनडे क्रिकेट का नाम दिया गया.

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इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच पहले वनडे मैच का वीडियो स्क्रीनशॉट.

क्रिकेट के इस नए रूप को न सिर्फ ऑस्ट्रेलिया, बल्कि क्रिकेट के जनक इंग्लैंड में भी खूब पसंद किया गया. तब से इन दोनों देशों ने औपचारिक तौर पर वनडे क्रिकेट की शुरुआत की और अब हर सीरीज़ में वनडे मैच होने लगे.

भारतीय क्रिकेट के लिए ये वो दौर था, जब टाइगर पटौदी के हाथ से 10 साल की बादशाहत जा रही थी और 1971 में अजित वाडेकर को टीम की नई जिम्मेदारी सौंपी गई. भारतीय टीम पहले तो वेस्टइंडीज़ को घर में मात दे चुकी थी और दूसरा इंग्लैंड को भी इंग्लैंड में हरा दिया था. अब भारतीय टीम विश्व क्रिकेट की एक नई शक्ति नज़र आने लगी थी.

जब 1974 में भारत, इंग्लैंड पहुंचा:
साल 1974 में भारतीय टीम दुनिया की नंबर एक टीम थी. अजित वाडेकर की कप्तानी में टीम इंग्लैंड पहुंची. इंग्लिश समर में वनडे क्रिकेट नाम की नई बला, जो कि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के अलावा बाकी देशों के लिए हौवा था. उस समय हर जगह इंग्लैंड में बारिश ही बारिश होती है. साथ ही टीम के अंदर का माहौल भी बहुत अच्छा नहीं था. इस दौरे पर टेस्ट में तो 3-0 से डब्बा गोल हुआ ही. साथ ही साथ हेडिंग्ले और ओवल में भारतीय टीम अपने पहले दोनों वनडे मैच भी हार गई.

1975 में पहले क्रिकेट विश्वकप की शुरुआत:
साल 1975 में पहली बार वनडे क्रिकेट के विश्वकप आयोजन का फैसला किया गया. इंग्लैंड को मेज़बानी सौंपी गई और इसमें कुल आठ टीमें खेलीं, जिनमें सिर्फ छह टीमें ऐसी थीं, जिन्हें टेस्ट स्टेट्स मिला हुआ था. जबकि दो टीमें ऐसी थीं, जिन्हें टेस्ट स्टेट्स मिलना अभी दूर था. पहली टीम थी श्रीलंका की, जो बाद में एक सफल टीम बनी. दूसरी टीम थी ईस्ट अफ्रीका की, जो कि केन्या, युगान्डा, तंजानिया और नॉर्दन रोडेशिया में से सबसे अच्छे खिलाड़ियों को मिलाकर बनाई गई थी.

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1975 विश्वकप में इंग्लैंड की टीम. फोटो: ICC

इस विश्वकप में वनडे क्रिकेट 60 ओवर वाली पारी का मैच होता था, जबकि खिलाड़ी सफेद कपड़ों में लाल गेंद के साथ ही खेलते थे. तब तक खेलों में डे-नाइट या नाइट मैचों का सिलसिला शुरू नहीं हुआ था. इस विश्वकप के सभी मैच दिन में ही खेले गए.

साल 1975 की शुरूआत भारतीय खेलों के लिए लाजवाब थी. भारत की हॉकी टीम मार्च के महीने में मलेशिया में विश्वकप जीतकर लौटी थी. इसके बाद देश की उम्मीदें क्रिकेट टीम से भी बहुत ज़्यादा बढ़ गई थीं. देश को टीम से भले ही उम्मीदें हो, लेकिन टीम को खुद से कोई भी उम्मीद नहीं थी. क्योंकि इस टूर्नामेंट से पहले टीम ने सिर्फ दो वनडे मुकाबले खेले थे, जिसमें उसे हार मिली थी. वनडे क्रिकेट क्या होता है, ये वक्त अभी समझने में ही जा रहा था.

सलेक्शन कमेटी ने एक ऐसे खिलाड़ी को भारतीय टीम का कप्तान बनाकर उस विश्वकप में भेजा, जो बाद में चलकर एक सफल अंपायर भी बना. यानी श्रीनिवासन वेंकटराघवन.

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वेंकटराघवन. फोटो: ICC

वेंकट की कप्तानी में भारतीय टीम विश्वकप खेलने पहुंची और उसने पहले मैच में ऐसी शुरुआत की कि इंग्लैंड अखबारों ने भारत की जमकर आलोचना की. सुनील गावस्कर ने इंग्लैंड के खिलाफ विश्वकप के पहले मैच में 60 ओवर बल्लेबाज़ी कर सिफ 36 रनों की पारी खेली. इसके बाद इंग्लिश मीडिया ने आरोप लगाया कि भारत नहीं चाहता कि विश्वकप का सफल आयोजन हो.

11 जून 1975 को भारत और ईस्ट-अफ्रीका का मैच:
अब तक भारत तीन वनडे मैच खेल चुका था. दो विश्वकप से पहले और एक विश्वकप में. लेकिन उसके खेल को देखते हुए ऐसा नहीं लग रहा था कि वो वनडे क्रिकेट के गुणा-भाग को समझ पा रहा है. 11 जून 1975 को भारतीय टीम विश्वकप का दूसरा मैच खेलने उतरी. भारतीय टीम के लिए अब टूर्नामेंट का हर मैच करो या मरो का था, क्योंकि नॉकआउट स्टेज में पहुंचने के लिए उसे अपने ग्रुप के तीन में से दो मैच जीतने बेहद ज़रूरी थे.

भारत 11 जून को लीड्स के 14,000 दर्शकों वाले मैदान पर खेलने उतरा. ये मौका था एक कमज़ोर टीम के खिलाफ जीतकर विश्वकप में बने रहने और वनडे क्रिकेट के लिए अपनी तैयारी करने का.

हरिलाल शाह की कप्तानी वाली ईस्ट अफ्रीका ने भारत के खिलाफ टॉस जीता और पहले बल्लेबाज़ी चुनी. लेकिन पहले मैच की हार और बेइज़्जती का बदला लेने भारत उतरा था. टीम इंडिया के गेंदबाज़ों ने ईस्ट अफ्रीका को इतनी बुरी तरह से पटका कि भारत की जीत पहली पारी के आधार पर ही तय हो गई.

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बिशन सिंह बेदी. फोटो: ICC

बिशन सिंह बेदी ने 12 में से आठ मेडन ओवर फेंके और छह रन दिए. आबिद अली ने 12 में से पांच मेडन फेंके और दो विकेट लिए. मदन लाल ने 9.3 ओवरों में 15 रन दिए और 3 विकेट चटकाए. अमरनाथ ने भी अपने खाते में दो विकेट किए. इस तरह से ईस्ट अफ्रीका की टीम 55.3 ओवरों में 120 रन बनाकर ऑल-आउट हो गई.

अब टीम इंडिया के सामने आसान सा दिखने वाला 121 रनों का लक्ष्य था. लेकिन सबकी नज़र इस बात पर थी कि इस बार सुनील गावस्कर कैसा खेलेंगे. गावस्कर ने ईस्ट अफ्रीका के खिलाफ तेज़-तर्रार 65 रनों की पारी खेली. उन्होंने 86 गेंदों में नौ चौके लगाए. गावस्कर ही नहीं, ओपनिंग में उनके जोड़ीदार फारूक इंजीनियर ने 93 गेंदों में 54 रन ठोके.

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Out होकर पैवेलियन की तरफ जाते Sunil Gavaskar (गेटी, फाइल)

भारत ने 29.5 ओवर में इस लक्ष्य को 10 विकेट से हासिल कर लिया. इस मैच में गावस्कर के ज़्यादा रन होने के बावजूद फारूक को ‘मैन ऑफ द मैच’ दिया गया. कई लोगों का तो ऐसा भी कहना है कि इंग्लैंड वालों ने पहली मैच की खुन्नस निकालते हुए गावस्कर को इस मैच में ‘मैन ऑफ द मैच’ नहीं दिया था.

लेकिन इस तरह भारतीय टीम ने विश्वकप ही नहीं, वनडे क्रिकेट में भी अपनी पहली जीत दर्ज की. इस जीत के बाद भारतीय टीम विश्वकप का अगला मैच न्यूज़ीलैंड के हाथों आखिरी ओवर में हारी और उसका विश्वकप का सपना एक जीत के साथ ही खत्म हो गया.


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