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दिग्विजय सिंह : कहानी मध्यप्रदेश के उस मुख्यमंत्री की, जिसका नाम लेकर बीजेपी लोगों को डराती है

चुनावी मौसम में दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आया है पॉलिटिकल किस्सों की ख़ास सीरीज़- मुख्यमंत्री. इस कड़ी में बात उस मुख्यमंत्री की, जिसे राजगढ़-ब्यावरा बेल्ट में आज भी राजा साहब बुलाया जाता है. जो बैतूल गोलीकांड के बाद भी लगातार दूसरी बार चुनाव जीत गया और जो एक बार चुनाव हारा तो पार्टी पिछले 15 साल से सत्ता का वनवास झेल रही है. नाम तो समझ ही गए होंगे. जी…दिग्विजय सिंह.

राजनीति के गेम में एक्सपर्ट नेता, जो सिर्फ एक चुनाव मैनेज कर पाया

12 जनवरी, 1998 का दिन. किसान मध्यप्रदेश में एक तहसील ऑफिस के बाहर जमा होते हैं. इन किसानों के पास खोने को कुछ नहीं है, क्योंकि फसल को गेरुआ चाट गया है. तभी कहीं से ललकार उठती है और भीड़ काबू करने का ज़िम्मेदार प्रशासन खुद भीड़ से घिर जाता है. पुलिस हवा में गोली दागना शुरू करती है. लेकिन जैसे-जैसे गोलियां आसमान में दगती हैं, भीड़ तहसील की ओर बढ़ती जाती है. आखिर में बंदूक की नाल किसानों की ओर हो जाती है. उस दिन 19 लाशें गिरी थीं. 18 किसानों की. और एक फायरब्रिगेड के उस ड्राइवर की, जो भीड़ के हत्थे चढ़ गया था. इस वाकये को हम बैतूल गोली कांड के नाम से जानते हैं. इस कांड के बावजूद सूबे का मुख्यमंत्री चुनाव जीत गया. लगातार दूसरी बार. मगर फिर जो हारा तो पार्टी 15 साल से वनवास झेल रही है.

बैतूल गोलीकांड के बाद भी दिग्विजय सिंह लगातार दूसरी बार चुनाव जीत गए थे.

अंक 1 पुश्तैनी नहीं, नए अन्नदाता चुनूंगा मैं

मध्यप्रदेश कभी कांग्रेस का गढ़ होता था. और इस गढ़ पर भाजपा का भगवा पुतने से पहले आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे दिग्विजय सिंह. जो मध्यप्रदेश के राघोगढ़ राजपरिवार से आते हैं. 28 फरवरी 1947 को जन्म. बचपन में खूब हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट खेला. बाद में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. पिता बलभद्र सिंह 1952 में राघोगढ़ से विधायकी जीते. पर्चा निर्दलीय भरा था, लेकिन उन्हें हिंदू महासभा का समर्थन मिला हुआ था. दिग्विजय ने भी पिता की तरह नेतागिरी की. 22 की उम्र में राघोगढ़ से निर्दलीय नगरपालिका का चुनाव जीत लिया. किसी को हैरानी नहीं हुई. दिग्विजय राजगढ़-ब्यावरा बेल्ट में आज भी राजा साहब बुलाए जाते हैं. तो रियाया को वोट देना ही था. हैरानी किसी को तब भी नहीं हुई जब 25 की उम्र में दिग्विजय कांग्रेस में चले गए. क्योंकि बलभद्र सिंह की यारी थी कांग्रेस नेता गोविंद नारायण सिंह से.

दिग्विजय सिंह को गोविंद नारायण सिंह (बाएं) और राजमाता सिंधिया (दाएं) दोनों ही अपने पाले में खींचना चाहते थे.

कोई और भी था, जो दिग्विजय को अपनी शरण में लेना चाहता था. कभी कांग्रेस की सांसद रही और अब जनसंघ की नेता. राजमाता विजयाराजे सिंधिया. जिनके पति को दिग्विजय के पिता अन्नदाता कहा करते थे. क्योंकि राघोगढ़ रियासत ग्वालियर राज्य के अधीन आती थी.

दिग्गी पुरानी अन्नदाता के दरबार में जाकर सिर्फ ताबेदार बने नहीं रहना चाहते थे. 1977 में दिग्विजय ने भोपाल विजय की दिशा में पहला कदम बढ़ाया. राघोगढ़ से विधायक बन. 1980 में फिर जीते तो अर्जुन सिंह की सरकार में मंत्री बने. रियासतों वाला ठाकुरवादी भाईचारा काम आया. चार साल बाद अर्जुन ने दिग्विजय को दिल्ली की तरफ मोड़ दिया. दिग्विजय 84 के चुनाव के बाद लोकसभा सांसद हो गए. संगठन में जिन युवाओं को राजीव आगे बढ़ा रहे थे. उनमें से बाद में भी चर्चित नाम रहे ऑस्कर फर्नांडीज, अशोक गहलोत, राजेश पायलट और दिग्विजय.

अर्जुन सिंह जब पंजाब के राज्यपाल बन गए, तो उन्होंने दिग्विजय सिंह को मध्यप्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया.
अर्जुन सिंह जब पंजाब के राज्यपाल बन गए, तो उन्होंने दिग्विजय सिंह को मध्यप्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया.

फिर जब अर्जुन सिंह को विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी भोपाल के बजाय चंडीगढ़ के राजभवन जाना पड़ा तो उन्होंने भोपाल में अपने दो कमांडर तैनात किए. मुख्यमंत्री के पद पर मोतीलाल वोरा. और प्रदेश अध्यक्ष के पद पर दिग्विजय सिंह. दिल्ली से भोपाल लौटे दिग्विजय क्या साथ लाए. राजीव और अर्जुन का भरोसा और एक नया नाम, दिग्गी राजा. ये नाम कैसे मिला. दिल्ली में एक रात राजीव ने कुछ वरिष्ठ संपादकों को भोजन पर बुलाया. अपने साथ रखे कुछ युवा पार्टी सांसद. दिग्विजय भी उस डिनर में मौजूद थे. और मौजूद थे ब्लिट्ज के लेजेंडरी संपादक रूसी करंजिया. उनसे दिग्विजय सिंह बोलते नहीं बन रहा था बार बार. सो वह शॉर्ट में दिग्गी राजा बोलने लगे. और तभी से ये नाम प्रेस में मकबूल हो गया.

अंक 2 टेलिफोन एक खोज, राइटर कमलनाथ

कमलनाथ नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री रहे थे.

छिंदवाड़ा के सांसद और नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री कमलनाथ. दिसंबर 1993 के शुरुआती दिनों की एक दोपहर. दौड़ लगा रहे थे. भोपाल में. कांग्रेस के दफ्तर इंदिरा भवन के गलियारों में. उनके हाथ में एक पर्ची थी और नजर को एक फोन की तलाश. पर्ची पर नंबर लिखे थे. औऱ ये फोन नंबर नहीं थे. ये नंबर अभी कुछ ही मिनट पहले हुई कांग्रेस विधायक दल की हंगामाखेज बैठक में हुए चुनाव के नतीजे थे. इस पर कोड में लिखा था. एसएल 56, डीएस 103. इसका मतलब. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिग्विजय सिंह को मिले 103 वोट, जबकि तीन बार के मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल को मिले 56 वोट. नतीजे पक्के थे. क्योंकि इन पर दिल्ली से आए कांग्रेस के तीन पर्यवेक्षकों जनार्दन रेड्डी, विलासराव मुत्तेमवार और आर के धवन की मुहर लगी थी.

मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे. श्यामाचरण शुक्ला और दिग्विजय सिंह. वोटिंग हुई और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बन गए.
मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे. श्यामाचरण शुक्ला और दिग्विजय सिंह. वोटिंग हुई और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बन गए.

कमलनाथ ने दिल्ली फोन घुमाया. 5 रेसकोर्स रोड में अपना संदेश छोड़ा. और फिर वहीं कुर्सी पर बैठ गए. बाहर की गहमागहमी से भरसक बचने को. कुछ ही मिनटों में फोन की घंटी बजी. उस तरफ राव थे. नरसिम्हा राव. देश के प्रधानमंत्री. और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष. राव ने सिर्फ इतना कहा. दिग्गी. फोन डिसकनेक्ट. मध्य प्रदेश को साढ़े तीन साल बाद फिर कांग्रेस का राज मिल गया. जिसे चलाने का जिम्मा आ गया 46 साल के दिग्विजय सिंह को. सड़कों पर समर्थक ढोल बजाने लगे. क्या समय था और क्या जश्न. क्या उस वक्त किसी को चार बरस पहले का वो मातम याद आ रहा होगा. जो दिग्विजय के घर पसरा था.

अंक 3 राजा साहब हार गए

राजनीति की जाती है जीतने के लिए. मगर इसमें एक जरूरी पड़ाव की तरह आती हैं हार. क्या इंदिरा, क्या अटल, क्या मनमोहन. सब हारे हैं. लेकिन ये नेता थे. इसे समझते थे. पर रियासतों से आए, राज को ही अपनी नियति समझने वाले, हार को इतनी आसानी से नहीं स्वीकार कर पाते थे. राघोगढ़ के पूर्व रियासतदार दिग्विजय सिंह का भी यही हाल था नवंबर की उस शाम. 22 साल की उम्र से जो जीत देखी, जो हार पहने. वे पहली बार अनुपस्थित थे. क्योंकि दिग्विजय सिंह राजगढ़ लोकसभा से बीजेपी के प्यारेलाल खंडेलवाल से लोकसभा का चुनाव हार गए थे.

लोकसभा चुनाव में दिग्विजय पहली बार हारे थे और उन्हें हराने वाले थे बीजेपी के प्यारेलाल खंडेलवाल.
लोकसभा चुनाव में दिग्विजय पहली बार हारे थे और उन्हें हराने वाले थे बीजेपी के प्यारेलाल खंडेलवाल.

हारी कांग्रेस भी थी. पूरे राज्य और उत्तर भारत में बुरी तरह. सो दिग्विजय की मायूसी अकेले की नहीं थी. 1991 में फिर लोकसभा चुनाव हुए. इस बार वह राजगढ़ से जीत गए. लेकिन मंत्री नहीं बने. क्योंकि उनके राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह खुद ही नरसिम्हा राव के साथ लड़ाई में उलझे थे. मांग रहे थे उपप्रधानमंत्री का पद. मगर राव ने शरद पवार संग गठजोड़ कर लिया और चुरहट के बाबू साहब सूचना प्रसारण मंत्री मात्र बनकर रह गए थे.

ऐसा नहीं था कि राव एक ही बार में अर्जुन सिंह को खत्म करने की खुशफहमी पाले थे. वह कभी पुचकार, कभी दुत्कार के खेल में माहिर थे. इसलिए जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति का मसला आया तो उन्होंने अर्जुन की सिफारिश मान ली. राघवगढ़ सांसद को भोपाल भेज दिया गया.

अंक 4 – ज्योतिषी ने हाथ राव का बांचा, किस्मत दिखी दिग्विजय की

बाबरी गिरने के बाद प्रदेश में राष्ट्रपति शासन हो गया. इस दौरान दो राज्यपाल रहे, एमए खान और मोहम्मद शफी कुरैशी. दोनों के ही शासनकाल में दिग्विजय की खूब सुनी गई.

कैलेंडर के हिसाब से अभी राज्य में विधानसभा चुनाव में ढाई साल बाकी थे. लेकिन दीवार गिर गई. कैलेंडर वाली नहीं. बाबरी मस्जिद वाली. और पटवा सरकार बाकी तीन भाजपा सरकारों साथ दिसंबर 1992 में बर्खास्त हो गई. अब सूबा राजभवन से चलना था. अगले एक साल. और वहां काबिज थे कांग्रेसी केंद्र सरकार के नियुक्त किए लोग. इसमें आधे वक्त मेरठ के वकील और पुराने कांग्रेसी एमए खान महामहिम रहे और फिर आए कश्मीर के कांग्रेसी मुहम्मद शफी कुरैशी. दोनों के राज में दिग्विजय की प्रशासनिक हलकों में सुनी जाने लगी. लेकिन नवंबर 1993 के विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण के दौरान राव ने सब खेमों की सुनी. श्यामाचरण शुक्ल, माधवराव सिंधिया, अर्जुन सिंह. सबकी सिफारिशो के मुताबिक टिकट बंटे. नतीजे आए तो कांग्रेस को मिलीं 320 में 174 सीटें. फिर शुरू हुई विधायक दल नेता की दौड़. इसका नतीजा तो आपने शुरुआत में वाया कमलनाथ सुन लिया. लेकिन नतीजों के नंबर सब कुछ नहीं बताते. इसलिए हम बताते हैं.

प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव केंद्र से अर्जुन सिंह को हटाना चाहते थे. लेकिन उनके ज्योतिषि ने उनको ऐसा न करने की सलाह दी थी.
प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव केंद्र से अर्जुन सिंह को हटाना चाहते थे. लेकिन उनके ज्योतिषि ने उनको ऐसा न करने की सलाह दी थी.

मध्य प्रदेश की जीत की खबर सुनने पर राव को सबसे पहले महाराष्ट्र फॉर्मूला याद आया. प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार शरद पवार को वह केंद्रीय कैबिनेट से रुखसत कर चुके थे. पवार जो राव सरकार में रक्षा मंत्री थे, वापस मुंबई जाकर महाराष्ट्र संभालने लगे थे. सुधाकर नाईक की जगह पर. राव ने सोचा, अर्जुन को भी यहां से दफा किया जाए. लेकिन तब राव के भरोसेमंद ज्योतिषी एनके शर्मा ने इसके उलट सलाह दी. अर्जुन दिल्ली के ज्यादा करीब रहते. और मुख्यमंत्री बनकर और ताकतवर हो जाते. एमपी में रहते और पड़ोस के यूपी और राजस्थान के नेताओं को उपकृत कर अपने पाले में लाते. इससे आगे चलकर राव को खतरा होता.

इसलिए राव ने खेल खुला छोड़ने का फैसला किया. कुछ देर के लिए. और यहीं वह चूक गए. क्योंकि मध्य प्रदेश के खेल में अर्जुन सिंह से पार पाना आसान नहीं था. पहली दावेदारी आई, पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल की. जो पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी थे. उन्होंने प्रचारित किया कि मुझे प्रधानमंत्री का आशीर्वाद हासिल है. इसे दम मिला. क्योंकि श्यामाचरण के भाई विद्या चरण, राव सरकार में संसदीय कार्यमंत्री थे.

श्यामाचरण शुक्ला, माधवराव सिंधिया और सुभाष यादव, मुख्यमंत्री की दौड़ में ये तीन नाम शामिल थे.
श्यामाचरण शुक्ला, माधवराव सिंधिया और सुभाष यादव, मुख्यमंत्री की दौड़ में ये तीन नाम शामिल थे.

दूसरी दावेदारी थी, माधवराव सिंधिया की. एक और मंत्री. नागरिक उड्डयन विभाग के. राव ने उन्हें भी दम दे दिया. इतना कि दिल्ली एयरपोर्ट पर एक प्लेन रिजर्व में रखा जाने लगा. कि कभी भी मंत्री जी उड़ान भर सकते हैं. भोपाल की. सीएम बनने जाने के लिए. तीसरी दावेदारी अप्रत्याशित थी. क्योंकि इस नाम को दिल्ली में कम लोग जानते थे. सुभाष यादव. मध्य प्रदेश में कांग्रेस का ओबीसी वर्ग का सबसे बड़ा नेता. उनका नाम आगे बढ़ाया अर्जुन सिंह ने. राग अलापा कि अब पार्टी में दलितों और पिछड़ों को शीर्ष पर बैठा मान देने का वक्त आ गया है.

इससे राव खेमा बैकफुट पर आ गया. लेकिन ऐन मौके पर अर्जुन सिंह चुप्पी साध गए. दरअसल सुभाष यादव कभी उनके कैंडिडेट थे ही नहीं. डमी थे. उन्हें तो डिप्टी सीएम की लॉलीपॉप पहले ही थमाई जा चुकी थी. अर्जुन के कैंडिडेट थे प्रदेश अध्यक्ष दिग्विजय सिंह. लेकिन शुरू में ही उनके नाम का ऐलान कर दिया जाता तो श्यामाचरण और सिंधिया के एक होन का खतरा था. वे एक हुए भी. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

मुख्यमंत्री के तीन दावेदार किनारे रह गए और अर्जुन सिंह ने दिग्विजय को मुख्यमंत्री बनवा दिया.
मुख्यमंत्री के तीन दावेदार किनारे रह गए और अर्जुन सिंह ने दिग्विजय को मुख्यमंत्री बनवा दिया.

विधायक दल मीटिंग से एक रोज पहले दिग्गी के घर 90 विधायक जुट गए. सिंधिया ने अपना चार्टेड प्लेन दिल्ली से रवाना किया. लेकिन उसमें वे खुद सवार नहीं थे. उनके दूत थे. उनके समर्थक विधायकों के लिए एक संदेश लेकर. कि वोटिंग हो तो श्यामाचरण के पाले में जाना. पर विधायक तो विधायक ठहरे, कोई भेंड़ तो थे नहीं जो सिर्फ गड़रिए का डंडा देखते. उन्हें समझ आ गया कि अब राज दिग्गी का आना है तो सलाम भी वहीं ठोंकने में भलाई है. और इस तरह चुनाव में अर्जुन सिंह की चाल कामयाब रही.

अंक 5 – फिर शुरू हुआ दिग्विजय का अश्वमेध

पर याद रखिए. आपके उत्थान में ही आपके पतन के बीज छिपे होते हैं. अर्जुन सिंह को लगा कि उन्होंने ये बाजी जीत ली. लेकिन जल्द दिग्विजय ने निष्ठा बदल ली. एक डेढ़ बरस में ही वह राव के खास हो गए. इसीलिए जब 1995 में अर्जुन सिंह ने राव को छोड़ा, तिवारी कांग्रेस बनाई तो दिग्गी ने निष्ठा नहीं बदली. निष्ठा तब बदली जब राव की जगह 1996 के चुनाव के बाद केसरी राष्ट्रीय अध्यक्ष हो गए. वैसे भी जनाधार विहीन केसरी को दिल्ली की राजनीति मजबूती से करने के लिए कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की भरपूर ताकत चाहिए थी. और फिर इसी ताकत के दम पर दिग्विजय सोनिया राज में भी प्रासंगिक बने रहे.

दिग्विजय अर्जुन सिंह के करीबी थे. लेकिन जब अर्जुन सिंह ने कांग्रेस छोड़ी तो दिग्विजय राव के पाले में आ गए और उसके बाद वो सोनिया गांधी के खास हो गए.
दिग्विजय अर्जुन सिंह के करीबी थे. लेकिन जब अर्जुन सिंह ने कांग्रेस छोड़ी तो दिग्विजय राव के पाले में आ गए और उसके बाद वो सोनिया गांधी के राज में भी प्रासंगिक बने रहे.

इस प्रासंगिकता की तारतम्यता के बीच पांच बरस भी तो पूरे हो चुके थे. नवंबर 1998 में फिर मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए. सोनिया ने उन्हें फ्री हैंड दिया. दिग्विजय ने बड़े पैमाने पर सिटिंग विधायकों के टिकट काटे और जब नतीजे आए तो वह सही साबित हुए. अरसे बाद किसी उत्तर भारतीय राज्य में कांग्रेस ने सत्ता सुरक्षित रखी. 320 सीटों में कांग्रेस को हासिल हुईं 172 सीटें. 1993 के मुकाबले सिर्फ 2 सीट कम. दिग्विजय फिर मुख्यमंत्री बन गए. ऐसा क्या था राघोगढ़ के राजा की सियासत में, कि जब उत्तर भारत में कांग्रेस सिकुड़ रही थी. वह जमे रहे.

तीन-चार चीजें.

1 दिग्विजय सिंह ने विधायकों को खूब उपकृत किया. कार्यकर्ताओँ के काम किए. इससे उनका वफादार काडर तैयार हुआ.

2 विपक्ष को भ्रम में रखा. कभी सुंदरलाल पटवा के घर पहुंच जाते, कभी विक्रम वर्मा को सार्वजनिक रूप से बधाई देते. इतना ही नहीं, विपक्ष के बड़े नेताओं के व्यक्तिगत काम भी व्यक्तिगत दिलचस्पी लेकर करते.

मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्विजय सिंह ने अपना काडर तैयार कर लिया था.

3 दिल्ली दरबार में अपने दूत मुस्तैद रखे. और आलाकमान को भारी भरकम मशीनरी चलाए रखने के लिए जिस ग्रीस ऑयलिंग की जरूरत होती है, वह लगातार मुहैया कराई.

4 सिर्फ करीब के दुश्मन पर ही नजर नहीं रखी. एक संभावित और लगातार मजबूत होते दुश्मन यानी बीएसपी को भी वक्त रहते ठिकाने लगाया. और इस पर बात विस्तार से.

मध्यप्रदेश में तकरीबन 18 फीसद दलित हैं और 22 फीसद के करीब आदिवासी. तब छत्तीसगढ़ नहीं बना था. और फिर ओबीसी भी थे. लेकिन सत्ता हमेशा ब्राह्मणों और ठाकुरों के पास रही. कांशीराम की बसपा के लिए ये जमीन पसरने को मुफीद थी. और ये बात बीएसपी सुप्रीमो तब ही समझ चुके थे, जब वह जांजगीर से लोकसभा लड़े थे. साल था 1984. फिर बीएसपी ने धीमे धीमे काडर बनाना शुरू किया. सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश से सटे इलाके में. बुंदेलखंड और बघेलखंड में. जहां दलित और ओबीसी एक विनिंग कॉम्बिनेशन बना सकते थे.

मध्यप्रदेश में कांशीराम भी अपना काडर तैयार करने में जुटे थे.
मध्यप्रदेश में कांशीराम भी अपना काडर तैयार करने में जुटे थे.

और ये बना भी. दिग्विजय को एक किस्म की चेतावनी सा देता. 1996 में. सतना लोकसभा सीट से दिग्विजय के राजनीतिक गुरु रहे अर्जुन सिंह तिवारी कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थे. सिटिंग एमपी थे वह. उनके सामने बीजेपी ने उतारा पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र सखलेचा को. सबकी नजर इनके घमासान पर थी. दिग्विजय सिंह ने सतना से कांग्रेस टिकट दिया कुर्मी बिरादरी से आने वाले तोशान सिंह को. राजनीतिक पंडितों ने कहा कि ये दिग्विजय का दांव है. पुराने गुरु को वॉक ओवर दे रहे हैं. ओबीसी कैंडिडेट लाए हैं, ताकि बीएसपी के वोट में कट लगा सकें. किसी ने कहा, अर्जुन सिंह का खेल बिगाड़ रहे हैं. बहरहाल, नतीजे आए तो बीएसपी के सुखलाल कुशवाहा 22 हजार वोट से चुनाव जीत चुके थे. दूसरे नंबर पर सखलेचा रहे और तिवारी कांग्रेस के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष अर्जुन सिंह तीसरे पर खिसक गए.

सखलेचा और अर्जुन सिंह के बीच की लड़ाई में बीएसपी के सुखलाल कुशवाहा बाजी मार ले गए थे.
सखलेचा और अर्जुन सिंह के बीच की लड़ाई में बीएसपी के सुखलाल कुशवाहा बाजी मार ले गए थे.

इस नतीजे ने दिग्गी ने सबक सीखा. प्रदेश के सभी बड़े बसपा नेताओं पर डोरे डालने शुरू किए. उन्हें कांग्रेस में लाए और लाभ के पद दिए. इसके अलावा उन्होंने दलितों को टारगेट कर योजनाएं लॉन्च करनी शुरू कर दीं. मसलन, चरनोई की ज़मीन भूमिहीन दलितों को बंटवा दी. सरकारी खरीद में दलित व्यापारियों के लिए कोट फिक्स कर दिया. इस दौरान दिग्विजय की किस्मत भी उनके साथ थी. मायावती दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी थीं, मगर एमपी में 1998 के चुनाव आते आते वह सत्ता बीजेपी के कल्याण सिंह के हाथों गंवा चुकी थीं.

अंक 6 – मिस्टर बंटाधार

दूसरी पारी में दिग्विजय सिंह ने अपनी समझ भर वह सब किया जो उनकी सत्ता को बचाकर रखता. लेकिन वह भी किया, जिसके लिए अब वह कुख्यात हैं. बड़े बोले. ये दूसरी जीत ही थी, जिसके बाद विकास के मुद्दे की खिल्ली सी उड़ाते हुए दिग्विजय बोले थे. चुनाव सड़कें बनवाकर नहीं जीते जाते. चुनाव जीते जाते हैं राजनीतिक प्रबंधन से.

दूसरी बार मुख्यमंत्री बने दिग्विजय सिंह ने कई गलतियां कीं.
दूसरी बार मुख्यमंत्री बने दिग्विजय सिंह ने कई गलतियां कीं.

इसके बाद दिग्विजय ने बतौर मुख्यमंत्री गलती पर गलती कीं. सरकारी तंत्र में कॉन्ट्रैक्ट कल्चर ले आए. एमपी की भाषा में कहें तो कर्मी कल्चर. मसलन, सहायक शिक्षक की जगह शिक्षाकर्मी. इससे सरकारी कर्मचारी खफा हो गए. फिर एमपी की सड़कों खस्ता हालत मुद्दा बनी. और हमेशा नदारद बिजली भी. बिजली को लेकर दिग्गी की सफाई. नया राज्य छत्तीसगढ़ बना तो सब बिजली घर चले गए. बताइए बिजली कहां से दूं. पब्लिक ने बता दिया. 2003 में. बीजेपी नेता उमा भारती के दिए तमगे पर भरोसा कर. मिस्टर बंटाधार.

दिग्विजय को लग रहा था कि ये बिपासा यानी बिजली, सड़क, पानी का मुद्दा सिर्फ बीजेपी के कार्यकर्ताओं के बीच है. इसीलिए तो रिजल्ट आने से एक दिन पहले एक टीवी डिस्कशन में बोल दिया.

”आप मुझे आज जहां पा रही हैं, अगले 10 साल तक यहीं पाएंगी.”

बाद में एक जगह यह भी बोले-

‘कांग्रेस हार ही नहीं सकती. अगर हार गई तो मैं 10 साल सत्ता से दूर रहूंगा.’

चुनाव हारने के बाद दिग्विजय 10 साल तक मध्यप्रदेश की राजनीति से दूर रहे. केंद्र में संगठन का काम देखते रहे. राहुल गांधी से नज़दीकी बनाए रखी. फिलहाल संगठन का काम देख रहे हैं.

जनता ने फैसला सुनाया. कांग्रेस को अब तक की सबसे बुरी हार मिली. 230 में 38 सीटें. इस नतीजे को 15 साल बीत चुके हैं. दिग्विजय केंद्र में संगठन की राजनीति कर रहे हैं. कभी राहुल के करीबी पार्टी महासचिव थे, आजकल कुछ हाशिए पर चल रहे हैं. कुछ, पूरी तरह नहीं. क्योंकि चाहे राहुल गांधी हों, चाहे कमलनाथ. सब जानते हैं. जनता के लिए दिग्गी भले ही एक बुरी याद हों. मगर हर जिले में कार्यकर्ता उन्हीं के पास हैं. और दिग्विजय भी जानते हैं. पार्टी पिछले 15 साल में उनके बयानों के चलते पर्याप्त बैड प्रेस हासिल कर चुकी है. इसलिए चुप हैं और अपने दांव चल रहे हैं.


एमपी के सीएम और यूपी के गवर्नर रहे मोतीलाल वोरा, जो नरसिम्हा, सोनिया और राहुल तीनों के खास रहे

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