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फिल्म रिव्यू: अर्जुन पटियाला

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थिएटर्स में इस हफ्ते दिलजीत दोसांझ और कृति सैनन की ‘अर्जुन पटियाला’ लगी है. ‘उड़ता पंजाब’ से बॉलीवुड डेब्यू के बाद दिलजीत पहली बार किसी फिल्म में लीड रोल में दिखाई देंगे. ‘अर्जुन पटियाला’ एक कॉमेडी फिल्म है, जो कुछ एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश करती है. ट्रेलर-टीज़र देखकर किसी स्पूफ जैसा फील आ रहा था, जो थोड़ी फनी लग रही थी. अब ये पूरी पिक्चर आ चुकी है और हमने देख ली है. फिल्म में क्या है? क्यों है? कैसी है? जैसे तमाम सवालों के जवाब आपको नीचे मिलेंगे.

कहानी के अंदर कहानी

एक प्रोड्यूसर फिल्म बनाना चाहता है. फिल्म चलाने वाला हर एलीमेंट का उस कहानी में होना कंपल्सरी है. राइटर उसे जो कहानी सुनाता है, वही इस फिल्म की कहानी है.

पंजाब के पटियाला का एक लड़का है अर्जुन, उसने नेशनल जूडो चैंपियनशिप जीता और स्पोर्ट्स कोटा से उसकी पुलिस में नौकरी लग गई. वो जूडो सिर्फ पुलिस की नौकरी के लिए खेलता था. ऐसा वो अपने आइडल गिल जी की देखा-देखी कर रहा है. उसकी पोस्टिंग फिरोज़पुर में होती है. जहां लोकल स्तर पर क्राइम काफी बढ़ गया है, जिसे खत्म करना (अब) अर्जुन के सीनियर गिल साहब का सपना है. अर्जुन फिरोज़पुर पहुंचता है और गिल जी का सपना पूरा करने में लग जाता है. इसी दौरान अर्जुन को एक जर्नलिस्ट ऋतु से प्यार हो जाता है. और फिर ऋतु के चक्कर में आगे की फिल्म में कॉम्प्लिकेशंस आते हैं. और क्लाइमैक्स में आपको जो पता चलता है, उससे आप बिलकुल संतुष्ट महसूस नहीं करते. और फिल्म की हैप्पी एंडिंग हो जाती है.

फिल्म का हीरो जो हॉट नहीं क्यूट है. ये फिल्म हमें बताती है.
दिलजीत दोसांझ. फिल्म का हीरो जो हॉट नहीं क्यूट है. ये फिल्म हमें बताती है.

एक्टिंग

अर्जुन पटियाला में दिलजीत दोसांझ ने अर्जुन पटियाला, कृति सैनन ने ऋतु, वरुण शर्मा ने मुंशी ओन्निडा सिंह, सीमा पाहवा ने प्राप्ती मक्कड़, रोनित रॉय ने डीएसपी गिल और मो.ज़ीशान अयूब ने सकूल का रोल किया है. इतने सारे एक्टर्स में से काम करने का मौका सिर्फ दिलजीत, वरुण और थोड़ा-बहुत कृति को ही मिला है. बाकी की कास्ट को वेस्ट कर दिया गया है. दिलजीत का कैरेक्टर एक हैप्पी गो लकी लड़के का है. दिलजीत को स्क्रीन पर देखना मजेदार लगता है. उनके डायलॉग्स उनकी हरकतें, सब सही जगह लगती हैं. वरुण शर्मा ने रेगुलर लीड हीरो के चेले का रोल किया है, जो आगे जाकर कहानी को फर्जी में एक थ्रिलिंग फील देने की कोशिश करता है. जहां तक करने का सवाल है, तो वरुण ने वही किया है, जो अब तक अपनी पिछली फिल्मों में करते हैं. कृति सैनन ‘लुका छुपी’ के बाद इस फिल्म में भी जर्नलिस्ट बनी हैं. जिस रफ्तार से वो पत्रकारिता कर रही हैं, ऐसा लग रहा अपनी अगली फिल्म का रिव्यू भी खुद ही लिखेंगी. वो इस फिल्म में ऐसी पत्रकार बनी हैं, जिसका रिकॉर्डर से लेकर स्पाई कैम पुलिस और गुंडे दोनों पकड़ लेते हैं. कैरेक्टर के लिहाज़ से किरदार काफी गंभीर है, लेकिन फिल्म के फन के चक्कर में उसे कोई सीरियसली लेता ही नहीं. कहानी का कैच सीमा पाहवा और रोनित रॉय के कैरेक्टर्स हैं लेकिन वो इतनी देर तक स्क्रीन पर दिखे ही नहीं कि हम उन्हें पूरी फिल्म का दोषी मान लें. मो. ज़ीशान अयूब एक बार फिर से बुरे किरदार के साथ पकड़े गए हैं, जिसे वो  बहुत कोशिश करने के बावजूद उसे ठीक-ठाक नहीं बना पाए हैं. फिल्म में पंकज त्रिपाठी और अभिषेक बैनर्जी का कैमियो भी है.

कृति सैनन. फिल्म की हीरोइन, जो एक ऐसी जर्नलिस्ट है. ये कहानी में झोल डालती है, जिसे सीरियसली ही नहीं लिया जाता.
कृति सैनन. फिल्म की हीरोइन, जो एक जर्नलिस्ट है. ये कहानी में झोल डालती है, जिसे सीरियसली ही नहीं लिया जाता.

म्यूज़िक

फिल्म का म्यूज़िक काफी प्यारा है. लेकिन वो फिल्म में बिलकुल रेगुलर तरीके से फिट किया गया है. जैसे फिल्म में प्रोड्यूसर को कहानी सुनाता राइटर कहता है कि अभी बिना वजह फिल्म (Absolutely for no-reason) में एक सनी लियोनी का आइटम नंबर आएगा. और वो आता है. एक फन सा गाना, जो अर्जुन उस लड़की के लिए गा रहा है, जो उसकी रेंज से बाहर है और ये उसे पता है. जैसे इस गाने ‘हबीबी मेरी जानिया’ में एक लाइन आती है ‘सोने जैसे बाल बेबी के लोहे जैसा बेबी का है दिल’, जो प्यारा लगता है. और फिल्म के मूड के हिसाब से भी जाता है. इसे गुरु रंधावा ने गाया है और सचिन-जिगर ने बनाया है. उसके बाद एक डांस वाला गाना, एक रोमैंटिक ट्रैक और फाइनली एक सैड सॉन्ग. म्यूज़िक सॉर्टेड!

फिल्म की अच्छी बातें

फिल्म की सबसे खास बात है उसके डायलॉग्स, जो काफी चुटीले हैं. आप भले ही उन्हें सुनकर ठठाकर न हंसे लेकिन पूरी फिल्म में मुस्कुराते ज़रूर रहते हैं. हालांकि इसी बीच कुछ सीरियस बात भी हो जाती है, जैसे अर्जुन लड़कियों को छेड़ते दो लड़कों को पकड़ता है और उनके पेट पर 3.2 किलो के ईंटे बांधकर उनसे थाना साफ करवाता है. वो बाद में बताता है कि पैदा होने वाले बच्चों का वजन इतना ही रहता है. बाद में उन दोनों बदमाशों को सलाह देता है कि जब मां के बारे में बुरा लगे, तो वो जा सकते हैं.

वरुण शर्मा. हीरो का दोस्त, जिसे फिल्म में ऐसे ही प्लेट में हीरो का चेला बताया जाता है.
वरुण शर्मा. हीरो का दोस्त, जिसे फिल्म में हीरो का चेला बताया जाता है.

सबसे इंट्रेस्टिंग बात है इस फिल्म का ट्रीटमेंट, जो शायद आज तक किसी बॉलीवुड फिल्म में नहीं हुआ. हॉलीवुड में देखने पर एक बार को ‘डेडपुल’ से मिलता-जुलता माहौल यहां भी है. लेकिन डेडपुल के पास कहानी भी थी, जो इनके पास नहीं थी. अगर ये कहानी क्लीशे और रेगुलर से थोड़ी भी अलग होती, तो इस फिल्म को देखने में गज़ब का मज़ा आता. उसके अलावा फिल्म में ग्रैफिक्स का इस्तेमाल बहुत सही तरीके से हुआ है. आप स्क्रीन पर एक फिल्म देख रहे हैं और आपके देखते-देखते वो वीडियो गेम बन जाए, तो मज़ा तो आता है. वैसे तो ये चीज़ पूरी फिल्म में फन के लिएइ चलती रहती है लेकिन ऋतु की बैकस्टोरी बताने के लिए उसका फुटनोट में जैसा इस्तेमाल किया गया है, वो आपको सरप्राइज़ करता है. इस फिल्म को रोहित जुगराज ने डायरेक्ट किया है, जो दिलजीत के साथ पहले भी (सरदार जी सीरीज़ में) काम कर चुके हैं, इसलिए दोनों के बीच का कंफर्ट फिल्म को आसान बनाता है.

फिल्म के एक सीन में विलेन का रोल करने वाले मो. ज़ीशान अयूब. और उनके चारों एक एक्शन सीन के दौरान इस्तेमाल किया गया ग्रैफिक.
फिल्म के एक सीन में विलेन का रोल करने वाले मो. ज़ीशान अयूब. और एक एक्शन सीन के दौरान उनके चारों ओर इस्तेमाल किए गए ग्रैफिक्स.

फिल्म के साथ दिक्कतें

लेकिन दिक्कत वही है कि फिल्म की कहानी, सारी क्रिएटिविटी की लुटिया डुबो देती है. हालांकि ये कितनी रेगुलर फिल्म होने वाली है, इस बारे में मेकर्स ने फिल्म के शुरुआती प्रोमोज़ से बताना शुरू कर दिया था. इसलिए इस बारे में शिकायत नहीं की जानी चाहिए. पहले एक-डेढ़ घंटे में फिल्म मजेदार लगती है लेकिन बीतते समय के साथ वो मज़ा बोरियत और फिल्म के खत्म होने के इंतज़ार में तब्दील हो जाता है. फिल्म खिंचनी शुरू हो जाती है. और क्लाइमैक्स में जो होता है, उसकी आपने कभी उम्मीद ही नहीं की थी. जब वो सीन होता है, जब आपको लगता है अच्छा इस फिल्म में ये सब भी होना था.

फिल्म के दो अलग-अलग सीन्स में सीमा पाहवा और रोनित रॉय.
फिल्म के दो अलग-अलग सीन्स में सीमा पाहवा और रोनित रॉय. पूरी फिल्म की डोर इनके हाथ में थी लेकिन इन्हें खींचने का मौका ही नहीं दिया गया.

ओवरऑल एक्सपीरियंस

क्लीशे सीन्स से भरपूर इस फिल्म में सिर्फ एक चीज़ देखने और सीखने लायक है, वो है इसका ट्रीटमेंट. ‘स्त्री’ के बाद मेकर्स से उम्मीद थी कि वो कुछ बेहतर करेंगे, लेकिन एक्सपेरिटमेंट के चक्कर में उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गई हैं. उसके ऊपर फिल्म कुछ अलग बात भी कहने की कोशिश नहीं करती. अगर आपको लगता है कि थिएटर में कोई सिर्फ इसलिए आएगा क्योंकि फिल्म में वीडियो गेम वाला फील है, तो इस गफलत से जल्द से जल्द बाहर निकल आने  की ज़रूरत है. जितनी लंबी ये फिल्म है, उतने समय में हम कुछ कायदे का कॉन्टेंट देख सकते हैं. अगर प्रयोगधर्मी हैं, तो एक बार को ये फिल्म देख सकते हैं लेकिन बहुत उम्मीद लेकर मत जाइगाा. कम निराश होंगे.

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