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वो पांच वजहें जिससे हिमाचल में राहुल गांधी की कांग्रेस हार गई

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हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में 68 सीटों में से बीजेपी को 44 और कांग्रेस को 21 सीटें मिली हैं. अन्य के खाते में 3 सीटें गई हैं. कांग्रेस की इस हार की पांच वजहें ये हैं:

#1. हिमाचल के पॉलिटिकल ट्रेंड की वजह से

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5 साल में सत्ताशीन सरकार से उब जाती है हिमाचल की जनता, ये एक बार फिर साबित हो गया है.

यहां राजनीतिक चलन है कि कोई भी सरकार अपना पांच साल का टर्म पूरा करने के बाद अकसर दोबारा सत्ता में नहीं आ पाती. यहां anti-incumbency का बड़ा फैक्टर रहता है. 2012 में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से हटाया था. इस बार वही काम भाजपा ने कर दिया है. पिछले चुनाव में 68 सीटों की इस विधानसभा में वीरभद्र की अगुवाई वाली कांग्रेस ने 36 सीटें जीतीं थी. वहीं धूमल के चेहरे के साथ लड़ी भाजपा को 26 सीटें मिलीं थी. अन्य के खाते में 6 सीटें आई थीं.

#2. वीरभद्र BJP के खिलाफ अकेले खड़े दिखे

Himachal Pradesh CM Virbhadra Singh during media interaction: Action to be taken in 'phone tapping' during BJP rule at Chandigarh on Wednesday. Photo by PRITAM THAKUR
वीरभद्र सिंह में अभी भी राजनीति बची है, 21 सीटों के रिजल्ट ने दिखा दिया है.

2017 के इस चुनाव में कांग्रेस ने नारा दिया था – ‘मिशन रिपीट’. मगर वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह पर ईडी और सीबीआई के भ्रष्टाचार के मामलों से इस कद्दावर राजनीतिक परिवार की छवि धूमिल हुई. कांग्रेस में वीरभद्र इस बार बेहद कमजोर दिखे. लोगों के बीच वीरभद्र यही कहते दिखे कि ये उनका आखिरी चुनाव है और उन्हें विकास के नाम पर वोट करें और भाजपा को सत्ता में आने से रोकें. इस साल जो 21 सीटें कांग्रेस को मिली हैं, वो वीरभद्र की ही बदौलत मिली हैं.

#3. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की हालत का असर

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राष्ट्रीय कांग्रेसी लीडरशिप से वो सपोर्ट नहीं मिला जो बीजेपी ने हिमाचल में दिखाया.

हिमाचल का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति से काफी प्रभावित दिखता है. अभी वर्तमान राजनीति में कांग्रेस बैकफुट पर दिखती है. पंजाब के अलावा कहीं भी कांग्रेस में वो ऊर्जा नहीं दिखी जो भाजपा के विजय रथ को रोकने का दम रखती हो. इस चुनाव में हिमाचल में कैंपेन करने आए कांग्रेसी नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भाजपा की नीतियों की आलोचना करते दिखे और खुद वीरभद्र सरकार पर उठे सवालों पर सफाई देते ही दिखे. रैलियों में वो दमखम नहीं दिखा जो मोदी लहर को रोक पाता.

#4. गुड़िया रेप केस और फॉरेस्ट गार्ड की हत्या ने साख गिरा दी

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कानून व्यवस्था के फ्रंट पर कमजोर पड़ते दिखी वीरभद्र सरकार.

पहले भ्रष्टाचार के मामलों में वीरभद्र सिंह की साख गिरी. फिर जुलाई 2017 में गुड़िया केस हुआ. उसने हिमाचल प्रदेश में कानून व्यवस्था में इतनी कमजोरियों को उजागर कर दिया. यहां तक कि हिमाचल पुलिस के आईजी समेत कई पुलिसवाले सलाखों के पीछे पहुंच गए. ठियोग इलाके में हुई इस घटना ने वीरभद्र के शासन पर सवालिया निशान लगा दिया. अपर हिमाचल जहां कांग्रेस की पकड़ रहती है वहां भी पार्टी को तगड़ा नुकसान हुआ. इसके अलावा इसी साल जून में मंडी के करसोग में वन माफिया ने कथित तौर पर फॉरेस्ट गार्ड को मारकर पेड़ से लटका दिया था. इससे कांग्रेस राज में माफियाओं की बढ़ती दहशत को हवा मिली थी. वीरभद्र सरकार के लिए ये मामला गले की फांस बन गया था.

#5. पार्टी इतने गुटों में बंट गई कि वापसी नहीं कर पाई

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पार्टी के अंदर ही एक दूसरे को हराने की कोशिश सरेआम दिखीं.

कांग्रेस में वीरभद्र के अलावा कोई भी बड़ा चेहरा नहीं था. इसके साथ ही राज्य में पार्टी कई धड़ों में बंटी हुई दिखती है. पहला धड़ा है खुद वीरभद्र का, दूसरा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खु का और तीसरा मंडी से कौल सिंह ठाकुर का. ये भी खबरें थीं कि वीरभद्र खुद सुक्खु को हराने की भरपूर कोशिश कर रहे थे. ऐसे में पार्टी का एकजुट न होना बहुत घातक रहा.


 

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