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एग्जिट पोल: कैसे तेजस्वी यादव एक मजबूत युवा नेता के तौर पर उभरे?

बिहार चुनाव के बाद आए एग्जिट पोल बिहार में भारी बदलाव की तरफ इशारा कर रहे हैं. सीटों की फाइनल संख्या 10 नवंबर को ही पता चलेगी. लेकिन एग्जिट पोल के आंकड़ों से एक बात स्पष्ट हो गई है कि आरजेडी के 31 साल के मुखिया तेजस्वी यादव एक बड़ी ताकत के तौर पर उभरे हैं. एग्जिट पोल के आंकड़े तेजस्वी के उदय की क्या कहानी कह रहे हैं.

यूथ पर बनाए रखा पूरा फोकस

पूरे इलेक्शन में तेजस्वी यादव ने युवाओं पर फोकस बनाए रखा. तेजस्वी यादव ने अपने पूरे ब्रैंड को ही बदल लिया. उन्होंने अपने पिता की  पारंपरिक राजनीति से हटकर यूथ से जुड़े मामलों को उठाया.उन्होंने युवाओं में रोजगार को लेकर गुस्से के वक्त पर समझा और उस हिसाब से अपने कैंपेन को खड़ा किया. उन्होंने विकास और रोजगार के आधार पर वोट वोट मांगे न कि पुराने ढर्रे पर.
शायद यही काम किया.

इंडिया टुडे- एक्सिस माई इंडिया बिहार एग्जिट पोल के अधार पर ऐसा ही मालूम पड़ता है. इस सर्वे से पता चलता है कि 44 फीसदी लोग तेजस्वी यादव को ही बिहार के अगले सीएम के तौर पर देखना चाहते हैं. सिर्फ 39 फीसदी लोग ही हैं जो नीतिश कुमार को फिर से सीएम के तौर पर देखना चाहते हैं.

Tejashwi Yadav
तेजस्वी ने लगातार यूथ पर फोकस बनाए रखा. (पीटीआई)

10 लाख जॉब बना मास्टर स्ट्रोक

तेजस्वी यादव ने पूरे इलेक्शन में 10 लाख नौकरी देने की बात करके इलेक्शन का माहौल ही बदल दिया. बिहार में सरकार बनने के बाद 10 लाख का वादा इतना तगड़ा दाव था कि इसमें बीजेपी और नीतीश कुमार भी बैकफुट पर नजर आए. एक तरफ बिहार सरकार में डिप्टी सीएम 10 लाख नौकरी की बातों को बोगस बताते रहे तो दूसरी तरफ बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में 4 लाख नौकरी और 19 लाख रोजगार के अवसर का वादा कर दिया. जानकार बताते हैं इस दावे के पहले बीजेपी ने अपने साथी नीतीश कुमार से भी बात नहीं की. तेजस्वी यादव ने बिहार में माइग्रेशन और रोजगार की समस्या को भांप लिया और हर रैली में इसकी बात की.

इंडिया टुडे-एक्सिस माई इंडिया एक्जिट पोल का डाटा दिखाता है कि 47 फीसदी लोगों ने महागठबंधन को चांस देने की बात की है. यह पोल 18 से 35 साल की उस जनता के बीच किया गया जिसमें रोजगार और माइग्रेशन बड़ा मसला है. 

यह सर्वे 243 विधानसभा सीटों पर 63 हजार लोगों को शामिल करके किया गया है. इस सर्वे में शामिल 43 फीसदी ग्रेजुएट्स, 46 फीसदी पोस्ट ग्रेजुएट और 43 फीसदी प्रोफेशनल डिग्री धारी लोगों ने तेजस्वी को पसंद किया. एनडीए को लेकर क्रमशः 38 फीसदी, 36 फीसदी और 41 फीसदी लोग ही दोबारा मौका देने के लिए तैयार दिखे. यह दिखाता है कि तेजस्वी यादव ने पढ़े-लिखे लोगों के बीच अपने मुद्दों और कैंपेन के जरिए पैठ बनाई है. उनका यह कैंपेन शहरी इलाकों में भी बहुत सफल नजर आया. सर्वे के अनुसार उन्हें शहरी वोटरों ने भी काफी पसंद किया है. उन्हें 46 फीसदी लोगों ने पसंद किया, जबकि एनडीए को लेकर सिर्फ 42 फीसदी लोगों में ही इंटरेस्ट नजर आया.

Tejashwi Yadav
बिहार विधानसभा चुनाव में सीएम के तौर पर तेजस्वी यादव लोगों के बीच पहली पसंद बन कर उभरे. (फोटो-एएनआई)

MY में जोड़ा एक और Y

युवा लीडर तेजस्वी ने आरजेडी के पुराने वोटर मुस्लिम और यादव में एक और समर्थक जोड़ा. यह समर्थक है यूथ. नीतीश कुमार के मुकाबले बेरोजगार, स्टूडेंट और माइग्रेंट युवा तेजस्वी को लेकर काफी सकारात्मक नजर आया. डाटा भी कुछ ऐसा दिखाता नजर आया कि महागठबंधन को मिडिल क्लास और गरीब तबके का साथ मिला. इस पूरे कैंपेन में तेजस्वी ने MYY (Muslim/Yadav/Youth) वोट बैंक को मजबूत किया.

नीतीश के गुस्से के भुनाया

तेजस्वी यादव को इस बात का पूरा आभास था कि 15 साल के नीतीश के शासन से बिहार के लोग काफी नाराज हैं. सत्ता विरोधी लहर को तेजस्वी ने अच्छी तरह से समझा और अपने निशाने पर नीतीश के बनाए रखा. उन्होंने बीजेपी से ज्यादा नीतीश कुमार के निशाना बनाया और उनकी सरकार को नाकार कहा. उन्होंने आम आदमी के मुद्दे कमाई, दवाई, पढ़ाई, सिचाई और मंहगाई को फोकस में बनाए रखा.
सर्वे के दौरान जब लोगों से पूछा गया कि महागठबंधन को क्यों पसंद कर रहे हैं तो 25 फीसदी लोगों ने कहा कि वो नीतीश के काम से नाराज हैं. इसमें से 21 फीसदी लोगों ने कहा कि तेजस्वी यादव अच्छा काम कर सकते हैं.

Nitish Kumar
नीतीश कुमार के खिलाफ गुस्से को तेजस्वी ने बखूबी इस्तेमाल किया. फोटो क्रेडिट- PTI

वनमैन शो से बढ़ा समर्थन

आरजेडी ने अपना मैसेज बहुत क्लियर रखा. कैंपेन और पोस्टर पर सिर्फ तेजस्वी यादव का चेहरा रखा गया. सबसे पहले जॉब की बात की. इसके बाद पुलिस वालों के रिटारमेंट की उम्र में इजाफा और बिहार के लिए खास स्टेटस की मांग की बात कही गई. यह वही मसले हैं जिसका वादा नीतीश पहले करते आते रहे, लेकिन कर नहीं सके. खचाखच भरी रैलियों को देखकर एनडीए में भी खलबली नजर आई. तेजस्वी ने अपनी रैलियों में अपने पिता लालू यादव का जिक्र भी नहीं किया. वह जानते थे कि एनडीए लगातार जंगल राज की बात कर रहा है. ऐसे में उन्होंने पूरे कैंपने को खुद और जरूरी मुद्दों तक ही सीमित रखा.


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