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हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी का असर चुनाव में होगा? झारखंड में किन मुद्दों पर लड़ रही पार्टियां?

झारखंड में लोकसभा की 14 सीटें हैं. 2004 के पहले चुनाव को छोड़ दें, तो अब तक राज्य के लोकसभा चुनावों में बीजेपी का दबदबा रहा है. क्या इस बार JMM और कांग्रेस एनडीए को टक्कर दे पाएगी?

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 Jharkhand is one of the keys for majority in eastern states for any national parties
झारखंड का सियासी रण इस बार रोचक होने वाला है. (फोटो- इंडिया टुडे)
29 मार्च 2024 (Updated: 29 मार्च 2024, 17:53 IST)
Updated: 29 मार्च 2024 17:53 IST
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साल, 2000. तारीख, 15 नवंबर. बिहार का बंटवारा हुआ और एक नए राज्य झारखंड का जन्म हो गया. तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. इस बात को बीते करीब 24 साल गुज़र गए हैं. केंद्र में अब नरेंद्र मोदी की सरकार है. देश में लोकसभा चुनाव होने हैं. झारखंड की राजनीतिक तासीर दूसरे राज्यों से अलग है. यह एक ऐसा राज्य है, जहां अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग दलों का प्रभाव है और यहां मुद्दे भी इलाकों के हिसाब से बदलते नजर आते हैं.

इस लेख के माध्यम से हम झारखंड के सियासी पेच-ओ-खम को सुलझाने की कोशिश करेंगे.

बेसिक झारखंड 

यहां भाषा भी हर सौ किलोमीटर पर बदल जाती है. मसलन, पश्चिम बंगाल से लगे झारखंड के इलाकों की बोली में बंगाली का मिश्रण है. इसी तरह ओडिशा से लगे हुए इलाके का भी अलग मिजाज दिखता है तो बिहार से लगे हुए इलाकों पर बिहारी संस्कृति हावी रही है. आदिवासियों में भी अलग-अलग संस्कृतियां देखने को मिलती हैं. इसलिए सभी इलाकों के चुनावी मुद्दे भी अलग-अलग हैं. 

सूबे में लोकसभा की कुल 14 सीटें हैं. इनमें से पांच अनुसूचित जनजाति (ST) और एक अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाली NDA गठबंधन ने 14 में से 11 सीटें जीती थीं. कांग्रेस और झामुमो एक-एक सीट पर सिमट गई थी.

राज्य के प्रशासनिक डिवीजन के मुताबिक़, झारखंड पांच हिस्सों में बंटा है. 

- कोल्हान: कोल्हान में लोकसभा की दो सीटें आती हैं: जमशेदपुर और सिंहभूम. पिछली बार जमशेदपुर सीट बीजेपी के खाते में गई थी. जबकि सिंहभूम से कांग्रेस के टिकट पर गीता कोड़ा चुनाव जीती थीं. वो कांग्रेस की एकमात्र सांसद थीं. लेकिन पिछले महीने ही गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गईं. अब सिंहभूम से बीजेपी की उम्मीदवार हैं.

विधानसभा चुनाव के लिहाज से कोल्हान को झामुमो का मजबूत गढ़ माना जाता है. 2019 विधानसभा चुनाव में कोल्हान की 14 सीटों में से 11 पर झामुमो को जीत मिली थी और बाकी तीन सीट पार्टी की सहयोगी कांग्रेस को मिली थी. झारखंड के सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री कोल्हान इलाके से ही बने हैं.

- संथाल परगना: संथाल परगना से लोकसभा की तीन सीटें आती हैं: दुमका, गोड्डा और राजमहल. 2019 आम चुनाव में दुमका और गोड्डा सीट बीजेपी ने जीती थी, जबकि राजमहल सीट झामुमो के खाते में गई थी. संथाल परगना क्षेत्र में विधानसभा की 18 सीटें आती हैं. इसमें 14 महागठबंधन और 4 सीटें भाजपा के पास है.

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- दक्षिणी छोटानागपुर: इस क्षेत्र में लोकसभा की तीन सीटें आती हैं: रांची, खूंटी और लोहरदगा. पिछले लोकसभा चुनाव में तीनों सीट बीजेपी के पाले में गई थी. इस इलाके में आदिवासी आबादी सबसे ज्यादा है. करीब 51 फीसदी. क्षेत्र में मुंडा, उरांव और ईसाई जनजातीय आबादी का वर्चस्व है.

- उत्तरी छोटानागपुर: क्षेत्र में कुल पांच लोकसभा सीटे हैं: हजारीबाग, चतरा, धनबाद, कोडरमा और गिरीडीह. पिछली बार इन पांचों सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. इस इलाके में राज्य की सबसे कम आदिवासी आबादी है (करीब 9.5 फीसदी). क्षेत्र में राजपूत, यादव, मुसलमान और कुर्मी जातियों का वर्चस्व है.

- पलामू: केवल एक लोकसभा सीट: पलामू. अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट. यहां से बीजेपी के विष्णुदयाल राम सांसद हैं. इलाके में आदिवासी आबादी अपेक्षाकृत कम है. पलामू क्षेत्र में 25.9 फीसदी दलित और 11.9 फीसदी आदिवासी हैं. जबकि दलितों के साथ-साथ ब्राह्मण, यादव और कहार जैसी ओबीसी जातियां अच्छी संख्या में हैं.

झारखंड के जातीय और धार्मिक समीकरण

ओबीसी- करीब 46 फीसदी आबादी है. सभी सीटों पर ओबीसी वोट निर्णायक हैं. इनमें कुर्मी समुदाय की आबादी राज्य में सबसे ज्यादा है. कुर्मी बीजेपी की सहयोगी पार्टी आजसू के आधार वोटर माने जाते हैं.

आदिवासी- 2011 की जनगणना के मुताबिक, ST (आदिवासी) की जनसंख्या 86.45 लाख यानी राज्य की आबादी का 26.2 फीसदी है. राज्य में आदिवासियों के लिए पांच लोकसभा सीटें आरक्षित हैं. सिंहभूम, खूंटी, लोहरदगा, राजमहल और दुमका.

दलित- झारखंड में 11 फीसदी दलित आबादी है. दलित आबादी के लिए पलामू लोकसभा सीट आरक्षित है.

मुस्लिम- राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 14 फीसदी है. हजारीबाग, रांची और धनबाद सीट पर मुसलमान वोटर निर्णायक भूमिका में हैं. इसके बावजूद सत्ता में इनकी हिस्सेदारी नहीं के बराबर है. 

जाति/ जाति समूह/ धर्मसंख्या (प्रतिशत में)
ओबीसी46%
दलित11%
आदिवासी26.2%
मुस्लिम14%
 पिछले चुनावों में क्या हुआ?

झारखंड बनने के बाद से अब तक हुए लोकसभा चुनावों की बात करें तो 2004 के चुनाव को छोड़कर सभी चुनावों में बीजेपी का पलड़ा भारी रहा है. हम आपके सामने 2004 से अब तक हुए लोकसभा चुनाव का लेखा-जोखा रखने जा रहे है.

2004 चुनाव में UPA का धमाका

अलग राज्य बनने के बाद झारखंड में पहली बार 2004 में लोकसभा चुनाव हुए थे. इस चुनाव में राज्य की 14 में से 12 सीटों पर UPA गठबंधन को जीत मिली. इसमें कांग्रेस को 6 सीट, झामुमो को 4 सीट और राजद को 2 सीट मिली थी. बीजेपी समर्थित NDA सिर्फ एक सीट पर सिमट गई और एक सीट सीपीआई के खाते में गई थी. वोट परसेंटेज की बात करें तो UPA गठबंधन को 37.7 प्रतिशत वोट मिले. वहीं NDA गठबंधन को 33 प्रतिशत वोट मिला. पार्टियों को मिले वोट प्रतिशत की बात करें तो बीजेपी को सबसे ज्यादा 33%, कांग्रेस को 21.4%, झामुमो को 16.3%, राजद को 3.5% और सीपीआई को 3.8% वोट मिले.

2009 चुनाव में BJP का दमदार प्रदर्शन

2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 8 सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं UPA गठबंधन के खाते में 3 सीट गई थीं. इसमें कांग्रेस को दो और झामुमो को एक सीट मिली. एक सीट बीजेपी से अलग हुए बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा को मिली थी. 2 सीटों पर इंडिपेंडेंट कैंडिडेट ने जीत दर्ज की. इस चुनाव में NDA को 29.9% और UPA को 24.6% वोट मिले.

2014 के चुनाव में बीजेपी को बंपर बढ़त

2014 के लोकसभा चुनाव में ‘मोदी लहर’ पर सवार बीजेपी ने झारखंड की 14 सीटों में से 12 पर जीत दर्ज की. बाकी दो सीटों पर झामुमो को जीत मिली. राज्य में पहली बार कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई. इस चुनाव में बीजेपी को 40.7%, झामुमो को 9.4%, जेवीएम को 14.7% और कांग्रेस को 13.5% वोट मिले.

2019 में भी बीजेपी की बढ़त बरकरार

2019 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी की बढ़त बरकरार रही. इस चुनाव में NDA गठबंधन को 12 सीटें मिली, जिसमें 11 सीट बीजेपी और एक सीट सुदेश महतो की AJSU के खाते में गई. वहीं UPA गठबंधन दो सीटों पर सिमट गई. कांग्रेस और झामुमो दोनों को एक-एक सीट मिली. वोट प्रतिशत की बात करें तो राज्य में पहली बार बीजेपी को अकेले 51.6 % वोट मिले. वहीं, कांग्रेस को 15.8%, झामुमो को 11.7% और आजसू को 4.4% वोट मिले.

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इस चुनाव में क्या रहेंगे चुनावी मुद्दे?

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष सुरेंद्र सोरेन कहते हैं कि इस चुनाव में जल, जंगल, जमीन, विस्थापन और रोजगार जैसे पारंपरिक मुद्दे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं. उनका मानना है कि CM हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी सबसे बड़े मुद्दे के रूप में उभरता हुआ नजर आ रहा है. सुरेंद्र सोरेन के मुताबिक,

“जहां झामुमो इस मुद्दे को सहानुभूति के रूप में भुनाना चाहेगी, वहीं बीजेपी हेमंत सोरेन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को मुद्दा बनाना चाहेगी. लोकसभा चुनाव में झामुमो एक जूनियर पार्टनर के रुप में लड़ती है और कोई पॉलिटिकल नैरेटिव ड्राइव नहीं करती है. इस कारण भी इन चुनावों में स्थानीय मुद्दों को इतनी तवज्जो नहीं मिलती.”

डीलिस्टिंग का मुद्दा

राज्य में बीजेपी लंबे समय से ‘धर्मांतरित’ आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति कैटेगरी से बाहर करने की मांग करती रही है. रांची स्थित स्वतंत्र पत्रकार आनंद दत्ता के मुताबिक, बीजेपी इस चुनाव में डीलिस्टिंग को एक बड़ा मुद्दा बनाएगी. हाल में बीजेपी के बड़े आदिवासी चेहरा रहे करिया मुंडा ने "डी-लिस्टिंग महारैली" का आयोजन किया था. इस रैली में करिया मुंडा ने कहा था, 

“धर्मांतरित आदिवासियों को एसटी नहीं माना जा सकता और उन्हें आरक्षण का लाभ देना संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है.”

डीलिस्टिंग के जरिये धर्मांतरण कर चुके आदिवासियों को मिलने वाली एसटी-आरक्षण इत्यादि सभी सुविधाओं से बाहर करने के लिए विशेष कानून बनाने की मांग हो रही है. 

हालांकि कई आदिवासी संगठनों और सामाजिक जन संगठनों के साथ भाकपा माले और अन्य वाम दल मुखर होकर ‘डिलिस्टिंग' का विरोध कर रहे हैं. इनका आरोप है कि संघ और भाजपा इस मुद्दे की आड़ में सांप्रद‍ायिक विभाजन पैदा कर ध्रुवीकरण की सुनियोजित साजिश कर रहे हैं.

बीजेपी की चुनौती क्या?
बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा (फाइल फोटो)


पिछली बार 11 सीटें जीतने वाली बीजेपी ने राज्य की 13 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. और 1 सीट अपने सहयोगी पार्टी AJSU के लिए छोड़ी गई. आजसू ने गिरिडीह से मौजूदा सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी को दोबारा उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी की चुनावी रणनीति और चुनौतियां क्या हैं? झारखंड की राजनीति को लंबे दिनों से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार नीरज सिन्हा बताते हैं,

“बीजेपी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में पहले से जुटी है. पिछले चुनावों में बड़ी जीत के साथ उसे जो 51 प्रतिशत वोट शेयर मिले थे, इससे उसकी उम्मीद कायम है. साथ ही बीजेपी को बड़ा भरोसा है कि नरेंद्र मोदी के प्रभाव का उसे सीधा लाभ इस बार भी मिलेगा. हाल ही में सिंहभूम सीट से कांग्रेस की सांसद गीता कोड़ा को बीजेपी ने अपने पाले में कर उन्हें उम्मीदवार भी बनाया है. लेकिन बीजेपी के सामने आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीटों पर चुनौतियां इन सबसे कम होती नहीं दिखती. वैसे भी 2019 के चुनाव में बीजेपी ने खूंटी, लोहरदगा और दुमका की सीट पर मामूली वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी.”

झामुमो और उसके सहयोगियों की चुनौतियां
हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद सरकार की कमान चंपई सोरेेन के हाथ में है, तो पार्टी के कामकाज में कल्पना सोरेन में भी एक्टिव हैं.

झामुमो और कांग्रेस गठबंधन की सबसे बड़ी समस्या है कि अब तक इनमें सीट शेयरिंग को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई है. पत्रकार आनंद दत्ता के मुताबिक, झामुमो और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर बात नहीं बन पा रही है. पिछली बार झामुमो 4 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. लेकिन इस बार पार्टी राज्य की उन सभी पांच सीटों पर चुनाव लड़ना चाह रही है, जो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. लोकसभा चुनावों में महागठबंधन में कांग्रेस बडे़ भाई की भूमिका में रहती है. कांग्रेस ने पिछली बार 7 सीटों पर चुनाव लड़ा था.

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हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी का क्या असर होगा?

नीरज सिन्हा बताते हैं,  

“हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी और उनके मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद बीजेपी को यह लगने लगा था कि मैदान खुला मिलेगा, लेकिन वैसे हालात हैं नहीं. हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के खिलाफ जेएमएम कैडर और आदिवासियों में गोलबंदी देखने को मिल रही है. आदिवासियों के कई संगठनों समेत जन संगठनों में नाराजगी है. इस बीच कल्पना सोरेन ने चुनावी मोर्चा संभाला है और इसका असर भी होता दिख रहा है."

नीरज के मुताबिक, जेएमएम की सीधी नजर आदिवासियों की सुरक्षित सीटों पर बीजेपी को मात देने की है. कांग्रेस भी कोशिश में जुटी है कि जेएमएम की नाव पर सवार होकर बीजेपी के विजय रथ को रोके.

जिन सीटों पर रहेंगी नजर

खूंटी: ये सीट अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित है. यहां से बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा को दोबारा मैदान में उतारा है. INDIA गठबंधन की ओर से कांग्रेस ने एक बार कालीचरण मुंडा को उम्मीदवार बनाया है. पिछली बार भी इस सीट से कालीचरण मुंडा ने अर्जुन मुंडा को कड़ी टक्कर दी थी. खूंटी बीजेपी की पारंपरिक सीट मानी जाती है. इस सीट से लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और बीजेपी नेता करिया मुंडा सात बार सांसद रहे हैं.

सिंहभूम (चाइबासा): ये सीट भी अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित है. यहां से 2019 में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा कांग्रेस के टिकट पर सांसद बनी थी. गीता कोड़ा ने हाल ही में बीजेपी का दामन थाम लिया. और अब इस चुनाव में सिंहभूम सीट से बीजेपी की उम्मीदवार हैं. सिंहभूम सीट कोल्हान इलाके में आता है, जो झामुमो का गढ़ माना जाता है. इस इलाके में एसटी आबादी करीब 58 फीसदी है.

दुमका: दुमका सीट इस बार झारखंड लोकसभा चुनाव में सबसे हॉट सीट हो सकती है. इस सीट से अभी भाजपा के सुनील सोरेन सांसद हैं. उन्होंने पिछले चुनाव में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता शिबू सोरेन को हराया था. बीजेपी ने इस बार सुनील सोरेन की जगह शिबू सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन को इस सीट से टिकट दिया है. सीता सोरेन हाल में भाजपा में शामिल हुई थीं. कहा जा रहा है कि इस बार यहां से हेमंत सोरेन चुनाव लड़ सकते हैं. INDIA गठबंधन उनकी गिरफ्तारी के बाद मिलने वाली सहानुभूति का फायदा उठाना चाहती है.

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गोड्डा: गोड्डा सीट पर भी इस बार देशभर की निगाहें रहने वाली हैं. इस सीट पर सातवें चरण में मतदान होगा. यहां से बीजेपी नेता निशिकांत दुबे सांसद हैं. निशिकांत दुबे 2009 से लगातार इस सीट से जीतते आए हैं. इस सीट पर अनुसूचित जाति की आबादी 11 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 12 फीसदी है.

झारखंड में चार चरणों में चुनाव होने में हैं. चौथे, पांचवें, छठे और सातवें चरण में 13, 20, 25 मई और एक जून को वोट डाले जाएंगे. 13 मई को सिंहभूम, खूंटी, लोहरदगा और पलामू, 20 मई को चतरा, कोडरमा और हजारीबाग, 25 मई को गिरीडीह, धनबाद, रांची और जमशेदपुर और 1 जून को राजमहल, दुमका और गोड्डा में वोटिंग होगी.

वीडियो: हेमंत सोरेन की भाभी सीता सोरेन झामुमो छोड़ने के कुछ घंटों बाद BJP में शामिल

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