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नेतन्याहू के ख़ास रहे और कई मिलिटरी ऑपरेशंस लीड कर चुके नफ़्ताली बेनेट चलाएंगे इज़रायल?

बाबूमोशाय, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं. जिसकी डोर ऊपरवाले की ऊंगलियों में बंधी है. कब, कौन और कैसे उठेगा, कोई नहीं बता सकता है.

‘आनंद’ फ़िल्म में राजेश ख़न्ना ने ये डायलॉग सुनाया था. अमिताभ बच्चन को. इसे हम आपको क्यों सुना रहे हैं? क्योंकि आज का क़िस्सा कमोबेश इसी लाइन के इर्द-गिर्द बसा है. कल रात एक बंद कमरे में रंगमंच सजा था. बहुमत का रंगमंच. जिसकी डोर ऊपरवाले नहीं बल्कि गठबंधन के सबसे छोटे मेंबर की ऊंगलियों में बंधी थी. यानी किंगमेकर की भूमिका. डेडलाइन से 35 मिनट पहले तक ये तय नहीं था कि वो किसे उठाकर राजा बना देगा.

हम बात कर रहे हैं इजरायल के पॉलिटिकल ड्रामे की. जहां विपक्षी गठबंधन के लिए दो जून की डेडलाइन तय की गई थी. बहुमत साबित करो या नए चुनावों का सामना करो. मतलब ये कि पिछले 28 दिनों से किए जा रहे सारे प्रयास नील बटा सन्नाटा हो जाते. बीतते समय के साथ कमरे में मौज़ूद हर शख़्स की धड़कनें तेज़ होती जा रहीं थी. आख़िरी क्षण पर किंगमेकर ने कहा – हमने आपकी बात सुन ली. मैंने अपना मन बना लिया है.

ये किंगमेकर कौन था? उसके दिल ने क्या आवाज़ लगाई? अंत मे कौन राजा बना और किसके नीचे से कुर्सी खींच ली गई? इस परिवर्तन के मुख्य क़िरदारों की कहानी क्या है? और, अभी तक जो हुज़ूरे-आला थे, उनका क्या होगा? सब विस्तार से बताएंगे.

पहले दो तारीख़ों की कहानी सुनिए

पहली, 05 मई 2021 की. येश अतिद पार्टी के मुखिया याया लापिड को एक बुलावा आया. राष्ट्रपति रूवेन रिवलिन की तरफ से. 23 मार्च को हुए चुनाव में येश अतिद दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी. उसके खाते में 17 सीटें आई थीं. नेतन्याहू की लिकुड पार्टी पहले नंबर पर थी. 30 सीटों के साथ.

लापिड जेरूसलम में प्रेसिडेंट के घर पहुंचे. वहां रिवलिन ने कहा-

मिस्टर लापिड, बेंजामिन नेतन्याहू बहुमत साबित करने में नाकाम रहे. आपकी पार्टी दूसरे नंबर पर है. अब सरकार बनाने की बारी आपकी. आपके पास 28 दिनों का समय है.

ये समय ख़त्म होता था दूसरी तारीख़, यानी 02 जून 2021 को. ये तारीख़ इजरायल के लोगों का मुक़द्दर बताने के लिए तय की गई थी. इजरायल को स्थायी सरकार मिलेगी या फिर से नए चुनाव की तैयारी करनी होगी? ढाई सालों के अंदर पांचवी बार.

Yair Lapid
येश अतिद पार्टी के मुखिया याया लापिड. (तस्वीर: एपी)

क्या तय हुआ?

इजरायल की संसद का नाम है, क्नेसेट. इसमें कुल सदस्यों की संख्या होती है – 120. सरकार बनाने के लिए ‘हाफ़ प्लस वन’ का फ़ॉर्म्यूला लागू होता है. मतलब अगर किसी पार्टी या गठबंधन के पास 61 सदस्यों का समर्थन है, तो वो सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है. इजरायल के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी पार्टी ने अकेले दम पर सरकार बनाई हो. ये परंपरा इस बार भी चल रही है.

30 मई तक याया लापिड ने 51 सीटें जुटा लीं. अब ज़रूरत थी 10 और सीटों की. उसी शाम यमीना पार्टी के मुखिया नफ़्ताली बेनेट ने अपने ऐलान से सबको चौंका दिया. बेनेट ने अपने पुराने बॉस बेंजामिन नेतन्याहू का ऑफ़र ठुकरा दिया था. क्या था ऑफ़र? नेतन्याहू और बेनेट साथ मिलकर सरकार बनाएंगे. रोटेशन के आधार पर पीएम की कुर्सी दोनों के बीच शेयर होगी. बेनेट इसके लिए राज़ी नहीं हुए.

उन्होंने सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का नया सूत्र खोज लिया था. बेनेट ने कहा कि वो याया लापिड के गठबंधन में शामिल होंगे. बेनेट के प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद नेतन्याहू भी मीडिया के सामने आए. उन्होंने कहा कि बेनेट जो समझौता कर रहे हैं, वो देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है. उन्होंने यमीना पार्टी के सांसदों से सरकार में शामिन न होने की अपील भी की. हालांकि, इससे नेतन्याहू को कोई फायदा नहीं हुआ.

Naftali Bennett
यामीना पार्टी के मुखिया नताली बेनेट. (तस्वीर: एपी)

फायदा किसका हुआ?

याया लापिड का. यमीना पार्टी के पास कुल 6 सीट थी. इस तरह गठबंधन का आंकड़ा 57 पर पहुंच गया था. अब बस चार सीट की कमी थी. पूरा पेंच यहीं पर फंस गया. लापिड की नज़र मंसूर अब्बास की पार्टी ‘यूनाइटेड अरब लिस्ट’ पर थी. उनके पास चार सीटें थी. वो समर्थन देने के लिए भी तैयार थे. लेकिन नफ़्ताली बेनेट की एंट्री से मामला उलझ गया था. क्यों?

विचारधारा के मामले में, नफ़्ताली बेनेट, बेंजामिन नेतन्याहू से कई कदम आगे हैं. वो फ़िलिस्तीन इलाकों में इजरायली सेटलमेंट्स को जायज ठहराते हैं. कई मौकों पर बेनेट ने कहा है कि फ़िलिस्तीन नाम की कोई जगह थी ही नहीं. वहीं दूसरी तरफ़, यूनाइटेड अरब लिस्ट टू-स्टेट सॉल्यूशन में भरोसा रखती है. ईस्ट जेरूसलम को फ़िलिस्तीनी स्टेट की राजधानी बताती है. पार्टी की एक मांग और भी है- इजरायल में रहने वाले अरब नागरिकों के लिए बराबरी का अधिकार.

विचारधारा का टकराव तय था. इसलिए, गठबंधन में सहमति की गुंज़ाइश कम होती जा रही थी. ऐसा होते-होते दो जून की तारीख़ भी आ गई. समर्थन वाली चिट्ठी पर दस्तख़त होना अभी भी बाकी था.

Mansour Abbas
यूनाइटेड अरब लिस्ट के मुखिया मंसूर अब्बास. (तस्वीर: एपी)

पहली बार कोई अरब पार्टी सरकार में शामिल हुई?

जब शाम तक भी बात नहीं बनी, तो नफ़्ताली बेनेट और मंसूर अब्बास की मीटिंग फ़िक्स की गई. कहा गया कि आपस में बैठकर मुद्दे सुलझा लें. दोनों रमात ग़ान पहुंचे. वहां कन्वेंशन सेंटर के बंद कमरे में उनकी बातचीत शुरू हुई.

इधर, बाहर कयासों का दौर शुरू हुआ. पहले बात आई कि यमीना पार्टी के कुछ सांसद इस समझौते से नाराज़ हैं. इसलिए, बात आगे नहीं बढ़ पाएगी. फिर ख़बर चली कि मंसूर अब्बास पर गठबंधन छोड़ने का दबाव बढ़ गया है.

इस बीच बात शूरा काउंसिल तक पहुंच चुकी थी. ये ‘यूनाइटेड अरब लिस्ट’ के भीतर की सबसे ताक़तवर संस्था है. मंसूर अब्बास को बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया गया. कुछ घंटों के बाद काउंसिल ने हरी झंडी दिखा दी. कहा गया कि आप समझौते पर साइन कर सकते हैं.

रात के दस बजे एक बार फिर रमात ग़ान पहुंचे. और, 10 बजकर 20 मिनट पर ख़बर आई कि मंसूर अब्बास ने समर्थन वाली चिट्ठी पर साइन कर दिया है. यानी, लापिड गठबंधन को ज़रूरी बहुमत हासिल हो चुका था. चार सीटों वाली यूनाइटेड अरब लिस्ट इस गठबंधन की गिलहरी थी. सबसे छोटी सदस्य. लेकिन, अंतिम नतीजा उसी ने तय किया. ये कई मायनों में ऐतिहासिक था. पहली बार किसी अरब पार्टी सरकार में शामिल हो रही थी. पहली बार इजरायल में लेफ़्ट, राइट और सेंटर मिलकर सरकार बनाने के लिए तैयार हुए थे.

मंसूर अब्बास के दस्तख़त के बाद चिट्ठी राष्ट्रपति के पास पहुंची. रात के 11 बजकर 26 मिनट पर राष्ट्रपति रूवेन रिवलिन के अकाउंट से ट्वीट हुआ,

येश अतिद पार्टी के मुखिया याया लापिड ने राष्ट्रपति महोदय को बताया है कि वो सरकार बनाने के लिए तैयार हैं.

ये आधिकारिक ऐलान था. लापिड गठबंधन ने तय डेडलाइन से 34 मिनट पहले सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत जुटा लिया था. इस मौके पर याया लापिड ने कहा कि उनकी सरकार सभी लोगों को साथ लेकर चलेगी.

समर्थन की बात हो गई. अब आगे क्या होगा?

एक हफ़्ते के भीतर संसद की बैठक बुलाई जाएगी. वहां विश्वास प्रस्ताव पेश किया जाएगा. अगर लापिड गठबंधन ने संसद में विश्वासमत जीत लिया तो उन्हें सरकार बनाने का मौका मिल जाएगा.

लापिड गठबंधन के बीच जो समझौता हुआ है, उसके मुताबिक पहले नफ़्ताली बेनेट प्रधानमंत्री बनेंगे. बेनेट इस पद पर अगस्त 2023 तक रहेंगे. उनके उतरने के बाद याया लापिड पीएम की कुर्सी पर बैठेंगे. पीएम पद छोड़ने के बाद बेनेट आंतरिक मामलों के मंत्री बनेंगे. किंगमेकर मंसूर अब्बास ने कोई भी मंत्रीपद लेने से मना कर दिया है.

अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक हुआ तो इजरायल में 12 सालों के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कोई नया चेहरा दिखेगा. बेंजामिन नेतन्याहू 2009 से लगातार इस कुर्सी पर कायम हैं. जाहिर सी बात है, नेतन्याहू ने विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने से रोकने की पूरी कोशिश की. लेकिन सफ़ल नहीं हो पाए. उन्होंने कहा है कि ये गठबंधन ‘सदी का सबसे बड़ा फ़र्ज़ीवाड़ा’ है. इस गठबंधन ने इजरायल की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है. तीन जून को नेतन्याहू ने अपने सांसदों की बैठक बुलाई है.

Benjamin Netanyahu
इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू. (तस्वीर: एपी)

जानकारों का कहना है कि जब तक नया प्रधानमंत्री शपथ नहीं ले लेता, नेतन्याहू को पराजित मान लेना बड़ी भूल होगी. वो अभी भी लापिड गठबंधन को तोड़ने की जुगत लगा रहे हैं. अगर एक भी सांसद अपनी लीक से भटका तो नेतन्याहू की मंशा पूरी हो जाएगी.

इसी वजह से याया लापिड जल्द-से-जल्द संसद की बैठक बुलाने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन संसद के स्पीकर की कुर्सी पर येरिव लेविन बैठे हैं. उन्हें नेतन्याहू का करीबी माना जाता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, लेविन जान-बूझकर इस बैठक को अंतिम तारीख़ तक खींचना चाहते हैं. ताकि नेतन्याहू को विपक्षी गठबंधन में तोड़-फोड़ के लिए पर्याप्त समय मिल जाए.

तीन जून को लापिड गठबंधन ने लेविन को हटाने के लिए प्रस्ताव पेश किया है. लेविन को हटाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन चाहिए. लेकिन यमीना पार्टी के एक सांसद ने कह दिया है कि वो इस प्रस्ताव का विरोध करेंगे. कुल जमा बात ये है कि कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता.

Yariv Levin
संसद के स्पीकर की कुर्सी पर येरिव लेविन को नेतन्याहू का करीबी माना जाता है. (तस्वीर: एपी)

नेतन्याहू फिर से चुनाव क्यों कराना चाहते हैं?

अगर नेतन्याहू का विरोधी धड़ा सरकार नहीं बना पाया तो इजरायल में फिर से चुनाव होंगे. नेतन्याहू फिर से चुनाव क्यों कराना चाहते हैं?
इसकी वजह है, उनके ऊपर चल रहे तीन मुकदमे. नेतन्याहू पर फ़र्ज़ीवाड़ा करने, घूस लेने और उद्योगपति मित्रों को ग़लत फायदा पहुंचाने के आरोप हैं. आरोप सही साबित हुए तो उन्हें 13 साल की जेल हो सकती है.

नेतन्याहू अपने बचाव का रास्ता ढूंढ रहे हैं. अगर विपक्षी गठबंधन सरकार नहीं बना पाया तो नेतन्याहू अगले चुनाव तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे. उनका इरादा है इस दौरान कानून बनवाकर अपने बचाव का रास्ता तैयार करना. अगर वो कुर्सी से उतरे तो ये सपना धरा-का-धरा रह जाएगा.

बेंजामिन नेतन्याहू को हटाने के लिए आठ पार्टियां एकजुट हुईं है. क्या वो अपने मिशन में कामयाब होंगी, ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.
फिलहाल, बारी है इस समूह के सबसे खास चेहरों से आपको मुख़ातिब कराने की.

पहला नाम है मंसूर अब्बास का

विपक्षी गठबंधन के किंगमेकर. मंसूर अब्बास 1974 में इजरायल में पैदा हुए. पेशे से डेंटिस्ट हैं. हिब्रू यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनका झुकाव राजनीति की तरफ हुआ. बाद में वो इजरायल के इस्लामिक मूवमेंट से जुड़ गए. इसका मकसद इजरायल में रहने वाले अरब लोगों में इस्लाम का प्रसार. इसके तहत, मुस्लिमों के लिए अस्पताल, मदरसे और मस्जिदों का निर्माण किया जाता था. कुछ समय बाद ये मूवमेंट दो हिस्सों में बंट गया. उत्तरी ब्रांच और दक्षिणी ब्रांच. उत्तरी ब्रांच कुछ ज़्यादा ही कट्टर था. वो इजरायल के अस्तित्व को नहीं मानता था. उसपर हमास को फंडिंग देने के आरोप भी लगे. 2015 में इजरायल ने उत्तरी ब्रांच को बैन कर दिया.

मंसूर अब्बास ने दक्षिणी ब्रांच का साथ चुना था. इसी ब्रांच की राजनीतिक इकाई है, यूनाइटेड अरब लिस्ट. इसकी स्थापना 1996 के चुनावों से ठीक पहले हुई थी. तब से ये पार्टी किसी सरकार में शामिल नहीं हुई थी.

अब्बास पहली बार 2019 में संसद पहुंचे थे. तब से अब तक इजरायल में चार चुनाव हो चुके हैं. अब्बास ने कहा था कि वो किसी भी धड़े में शामिल नहीं होंगे. अब उन्होंने अपना प्लान बदल दिया है. अब्बास ने कोई मंत्री पद नहीं लिया है. वो अरब मूल के नागरिकों के लिए समान अधिकारों की मांग पर कायम हैं.

अब्बास के बाद नाम आता है. बेनी गेंज़ का. उनकी पार्टी का नाम है, ब्लू एंड व्हाइट पार्टी. विपक्षी गठबंधन का दूसरा सबसे बड़ा दल. इसके पास आठ सीटें हैं.

Benny Gantz
बेनी गेंज़ विपक्षी गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के प्रमुख हैं. (तस्वीर: एपी)

बेनी गेंज़ कौन हैं?

गेंज़ का जन्म 1959 में सेंट्रल इज़रायल के एक गांव में हुआ था. उनके माता-पिता हिटलर के होलोकॉस्ट से बचकर आए थे. गेंज़ की पढ़ाई-लिखाई बोर्डिंग स्कूल में हुई थी. 18 की उम्र में उन्होंने इजरायल डिफ़ेंस फ़ोर्स में भर्ती हो गए. उन्होंने पैराट्रूपर्स ब्रिगेड को जॉइन किया. गेंज़ ने आर्मी में ही अपना कैरियर बनाने का फ़ैसला किया. उन्होंने कई खास अभियानों में हिस्सा लिया. इथियोपिया से यहूदियों को एयरलिफ़्ट करने का ऑपरेशन हो या लेबनान में इजरायल की लड़ाई. गेंज़ हर मोर्चे पर आगे रहे.

फ़रवरी 2011 में बेनी गेंज़ को चीफ़ ऑफ़ द जनरल स्टाफ़ बनाया गया. यानी इजरायल की डिफ़ेंस फ़ोर्स का सुप्रीम कमांडर. वो इस पद पर 2015 तक रहे. उस वक़्त प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू उनकी खूब सराहना करते थे. उन्हें ये मालूम नहीं था कि कुछ बरस बाद यही व्यक्ति उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी बनेगा.

फ़रवरी 2019 में बेनी गेंज़ ने अपनी पार्टी बना ली. उस साल दो चुनाव हुए. गेंज़ की पार्टी को अच्छी-खासी सीटें भी मिलीं. लेकिन कोई भी पार्टी या गठबंधन सरकार बनाने में नाकाम रही.

मार्च 2020 में तीसरा चुनाव हुआ. इसमें भी नतीजा वही रहा. अगले चुनाव से बचने के लिए नेतन्याहू और गेंज़ ने समझौता किया. तय हुआ कि दोनों आधे-आधे समय तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे. लेकिन सरकार बनते ही नेतन्याहू ने गेंज़ को किनारा कर दिया. गठबंधन में दरार पड़ी और नतीजा चौथा चुनाव.

बेनी गेंज़ को नई सरकार में भी डिफ़ेंस मिनिस्ट्री ही मिली है.

अब बात याया लापिड और नफ़्ताली बेनेट की

नई सरकार में दोनों नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी शेयर करेंगे. दो-दो साल के लिए. लापिड का जन्म तेल अवीव में हुआ था. उनके पिता इजरायल के जस्टिस मिनिस्टर रह चुके हैं. लापिड ने भी डिफ़ेंस फ़ोर्स जॉइन किया था. 1982 में लेबनान वॉर के दौरान उन्हें अस्थमा का दौरा पड़ा. जिसके बाद उन्हें लड़ाई के मैदान से बाहर भेज दिया गया. बचे समय में उन्होंने सेना के बेस कैंप में बतौर संवाददाता काम किया.

Yair Lapid
येश अतिद पार्टी के मुखिया याया लापिड. (तस्वीर: एपी)

मिलिटरी सर्विस पूरी करने के बाद लापिड बॉक्सिंग और एक्टिंग की तरफ मुड़ गए. हालांकि, वो इसमें ज़्यादा सफ़ल नहीं हो पाए. फिर शुरू हुआ उनका पत्रकारिता का कैरियर. यही उनकी दुनिया थी. इस फ़ील्ड में वो काफ़ी पॉपुलर हुए. लापिड ने एक दर्जन से अधिक किताबें लिखीं है. जब उन्होंने प्राइम टाइम शो होस्ट करना शुरू किया, उनकी लोकप्रियता और बढ़ी. एक समय लापिड सबसे ताक़तवर यहूदियों की लिस्ट में गिने जाते थे.

2012 में उन्होंने अपना पेशा छोड़कर येश अतिद पार्टी की शुरुआत की. 2013 के चुनाव में वो नेतन्याहू सरकार का हिस्सा भी बने. उन्हें वित्त मंत्रालय मिला था. लापिड टू-स्टेट सॉल्युशन के समर्थक हैं. इसको लेकर नेतन्याहू धड़े से उनका विवाद हुआ.

2014 में उन्होंने उस गठबंधन को बाय-बाय कर दिया. अगर सब सही रहा तो लापिड 2023 में इजरायल के प्रधानमंत्री बन सकते हैं.

अभी प्रधानमंत्री बनेंगे नफ़्ताली बेनेट. उनकी क्या कहानी है?

बेनेट का जन्म 1972 में हुआ था. हाइफ़ा में. उनके माता-पिता अमेरिका से आकर इजरायल में बस गए थे. इजरायल में मिलिटरी सर्विस अनिवार्य है. इसी के तहत 1990 में वो कमांडो ग्रुप में शामिल हुए. बेनेट ने लेबनान में इजरायल के कई मिलिटरी ऑपरेशंस में हिस्सा लिया. 1996 में एक ऑपरेशन के दौरान वो सैनिकों की एक टुकड़ी लीड कर रहे थे. इसी दौरान उन्होंने यूनाइटेड नेशंस की एक बिल्डिंग पर हमला करने का आदेश दिया था. इस हमले में 102 आम नागरिक मारे गए थे. बेनेट पर आरोप लगता है कि उन्होंने उस वक़्त सही फ़ैसला लेने में देर कर दी. ये आरोप आज भी चुनाव के दौरान उनके ऊपर लगाए जाते हैं.

Naftali Bennett
नेतन्याहू ने नफ़्ताली बेनेट को 2006 में अपना चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ बनाया था. (तस्वीर: एपी)

नफ़्ताली बेनेट 1999 में सेना से अलग हो गए. उन्होंने टेक्नोलॉजी की फ़ील्ड में खूब नाम बनाया. कई कंपनियां भी स्थापित की. 2005 में कंपनी बेचकर वो पॉलिटिक्स में आ गए. अगले ही साल उन्हें नेतन्याहू ने अपना चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ बना लिया. नेतन्याहू और बेनेट का साथ मई 2020 तक बना रहा. इस दौरान उन्होंने पांच मंत्रालय संभाले. मई 2020 में वो इजरायल के रक्षामंत्री थे.

अब उन्होंने अपने पुराने बॉस को टाटा कर दिया है. और, वो उन्हीं की कुर्सी पर बैठने जा रहे हैं. क्या उनका सपना पूरा हो पाएगा? ये तो संसद में विश्वास प्रस्ताव पेश होने के बाद ही पता चलेगा.

अब इजरायल के पॉलिटिकल ड्रामे को विराम देते हैं. हमने एक अनुमान लगाया, इस वक़्त नफ़्ताली बेनेट, बेंजामिन नेतन्याहू को क्या सुना रहे होंगे? साहिर लुधियानवी की लिखी ये पंक्तियां सुनते जाइए.

इज़्ज़तें, शोहरतें, उल्फ़तें, चाहतें
सब कुछ इस दुनिया में रहता नहीं
आज मैं हूं जहां, कल कोई और था
ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था.


विडियो- इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी जाने वाली है?

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