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3 देशों के बीच हुआ वो समझौता, जिससे चीन तिलमिला उठा है

दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा

ज़िंदगी हमें तेरा, ऐतबार ना रहा…

शैलेंद्र के बोल. शंकर-जयकिशन का संगीत. मुकेश की आवाज़. फ़िल्म का नाम संगम. साल 1964. किसने सोचा होगा कि ये गीत 57 बरस बाद इंटरनेशनल पॉलिटिक्स की एक घटना का मर्म बन जाएगा! लेकिन, ऐसा हो चुका है. और, ये हुआ है एक सिक्योरिटी डील के चलते. इसका नाम रखा गया है, ऑकस (AUKUS). ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट के बीच हुए इस समझौते ने कई दिल तोड़ दिए हैं.

ऑकस डील के तहत, अमेरिका और ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां बनाने में मदद करेंगे. ऐसी बातें खुले मंच से नहीं कही जातीं है और न ही कही गईं. लेकिन ये सर्वमान्य सत्य है कि इस डील का मकसद इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल को काउंटर करना है. चीन का नाराज़ होना तय था. वो हुआ भी. उसने अमेरिका और ब्रिटेन को शीत युद्ध के दौर वाली मानसिकता से बाहर निकलने के लिए कहा है. चीन ने ऑकस में शामिल तीनों देशों पर हथियारों की दौड़ शुरू करने का आरोप भी लगाया.

चीन के अलावा जो देश सबसे अधिक नाराज़ है, वो है फ़्रांस. नाटो में अमेरिका और ब्रिटेन का सहयोगी देश. फ़्रांस और अमेरिका की दोस्ती तो सदियों पुरानी है. आज़ादी की क्रांति हो या वर्ल्ड वॉर में दुश्मनों से भिड़ना. दोनों देशों का साझा इतिहास रहा है. ऑकस की ख़बर बाहर आने के बाद फ़्रांस ने सारे रिश्ते भुला दिए. फ़्रांस के विदेश मंत्री ने नाराज़गी भरे लहजे में कहा –

‘दोस्त आपस में ऐसा नहीं करते. हमारी पीठ में छुरा घोंपा गया है. ये असहनीय है. ये कहानी यहीं पर खत्म नहीं होगी.’

तो जानते हैं कि ऑकस डील की पूरी कहानी क्या है. इस डील से इलाके की जियो-पॉलिटिक्स पर क्या बदलाव आएगा? चीन का गुस्सा तो समझ में आता है, लेकिन अमेरिका के दशकों पुराने दोस्त फ़्रांस की नाराज़गी की वजह क्या है? सब विस्तार से जानते हैं.

Bush came, Hu conquered

थोड़ा अतीत में चलते हैं. ताकि वर्तमान का तिया-पांचा आसानी से समझ आ जाए. ये घटना है, अक्टूबर 2003 की. दो दिनों के अंतराल में दो बड़े ग्लोबल लीडर ऑस्ट्रेलिया पहुंचे. दोनों को ऑस्ट्रेलिया की संसद को संबोधित करने का मौका मिला. पहले थे, अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश. जबकि, दूसरे नेता थे, उस समय चीन के राष्ट्रपति रहे, हू जिंताओ. बुश अपने भाषण में वैश्विक आतंकवाद और इराक़ युद्ध पर फ़ोकस्ड रहे. उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने से मना कर दिया. महज 21 घंटे तक रुकने के बाद बुश ऑस्ट्रेलिया से चले गए. अमेरिकी प्रेस में बुश के बर्ताव की ख़ूब आलोचना हुई.

उनके जाने के अगले दिन हू जिंताओ की बारी आई. ऑस्ट्रेलिया के सिस्टम में परंपरा थी कि संसद में उन्हीं नेताओं को बोलने का मौका दिया जाएगा, जो लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आएं हो. चीन में लोगों की बजाय कम्युनिस्ट पार्टी का बोलबाला है. इसके बावजूद हू जिंताओ को मंच दिया गया था. चीनी राष्ट्रपति ने इस मौके का भरपूर इस्तेमाल किया. उन्होंने चीन की बढ़ती अर्थव्यवस्था में ऑस्ट्रेलिया के प्राकृतिक संसाधनों के योगदान पर बात की. ऑस्ट्रेलिया के साथ कल्चरल पार्टनरशिप की चर्चा की. वो ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सिटीज़ में चीनी स्टूडेंट्स की बढ़ती संख्या को लेकर उत्साहित दिखे. हू जिंताओ ऑस्ट्रेलिया को बराबरी का दर्ज़ा दे रहे थे. वो ये भी जता रहे थे कि एक-दूसरे के विकास का रास्ता आपसी सहयोग से होकर गुजरता है. हू जिंताओ तीन दिनों तक ऑस्ट्रेलिया में रहे. इस दौरान उन्होंने चीन की छवि को सुगम और सहज बनाने की पूरी कोशिश की. वो इसमें काफ़ी हद तक कामयाब भी रहे.

बुश और जिंताओ के दौरे पर ऑस्ट्रेलिया के अख़बार ‘फ़ाइनेंशियल रिव्यू’ ने रिपोर्ट छापी. और, उसका शीर्षक दिया,

Bush came, Hu conquered

बुश ने बस हाज़िरी लगाई, जबकि हू जिंताओ ने झंडा फहरा दिया.

ऑस्ट्रेलिया-चीन के रिश्ते

ऑस्ट्रेलिया ने 1972 में चीन को मान्यता दी थी. एक साल बाद उसने बीजिंग में अपना दूतावास शुरू किया. डिप्लोमैटिक रिश्ते तो 70 के दशक में शुरू हो चुके थे. पर, आर्थिक मोर्चे पर रफ़्तार 21वीं सदी के शुुरुआती सालों में आई. कुछ ही सालों में चीन, ऑस्ट्रेलियाई उत्पादों का सबसे बड़ा मार्केट बन चुका था. फिर 2017 का साल आया. उस समय ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री थे, मैल्कॉम टर्नबेल. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की आंतरिक राजनीति में बाहरी दखल पर लगाम लगाने का फ़ैसला कर लिया. दिसंबर 2017 में सरकार ने देश के चुनावी कैंपेन में विदेश से चंदा लेने पर रोक लगा दी.

2016 में एक सेनेटर को इसी वजह से मीडिया में आकर माफ़ी मांगनी पड़ी थी. पता चला था कि सेनेटर ने चीनी सरकार से जुड़ी एक कंपनी को निजी खर्च का बिल भरने के लिए कहा था. प्रधानमंत्री टर्नबेल ऑस्ट्रेलिया की पॉलिटिक्स में विदेशी दखल को खत्म करने की बात कर रहे थे. अप्रत्यक्ष रूप से ये इशारा चीन की तरफ़ ही था. यहां से चीन और ऑस्ट्रेलिया के संबंंधों में खटास आने लगी थी. अगले बरस तनाव तब और बढ़ गया, जब ऑस्ट्रेलिया ने चीन के फ़ाइव-जी नेटवर्क पर बैन लगा दिया. ऑस्ट्रेलिया ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश था.

तब से दोनों देशों के संबंध का ग्राफ़ लगातार नीचे गिरा है. चाहे वो चीन द्वारा ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों को जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार किए जाने की घटनाएं हो या ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ से कोविड-19 के ओरिजिन को लेकर चीन पर ज़ुबानी हमला.

वॉर क्राइम की रिपोर्ट पर आमने-सामने

अप्रैल 2021 में ऑस्ट्रेलियन डिफ़ेंस फ़ोर्सेज़ ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैनिकों के वॉर क्राइम की रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट पर चीन ने भयानक तंज कसा था. चीन के एक सरकारी हैंडल ने अफ़ग़ान बच्चे का गला रेत रहे ऑस्ट्रेलियाई सैनिक की फ़ेक फ़ोटो पोस्ट कर दी. इस मामले पर ख़ूब बवाल हुआ. ऑस्ट्रेलिया के पीएम स्कॉट मॉरिसन ने चीन से माफ़ी मांगने के लिए कहा. लेकिन चीन अपनी बात पर अड़ा रहा. उसने माफ़ी नहीं मांगी. उल्टा, ऑस्ट्रेलिया को अपने गिरेबान में झांकने की सलाह दे दी.

इन सबके अलावा चीन, ऑस्ट्रेलिया से आने वाले प्रोडक्ट्स की एंंट्री में देरी कर रहा है. उसने कई प्रोडक्ट्स पर एक्स्ट्रा टैरिफ़ भी लगा रखा है. कुल जमा बात ये है कि ऑस्ट्रेलिया और चीन की वर्षों पुरानी दोस्ती दरकने लगी है. 15 सितंबर 2021 को जब ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिटेन और अमेरिका के साथ ऑकस डील की, इस रिश्ते में उभरी दरारें साफ़ दिखने लगीं.

जब अगस्त 2018 में स्कॉट मॉरिसन ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने कहा था कि ऑस्ट्रेलिया को विकल्प चुनने की ज़रूरत नहीं है. बयान के तीन बरस बाद ही ऑस्ट्रेलिया ने विकल्प चुन लिया है. और, उसने चीन वाला ऑप्शन ब्लैंक छोड़ दिया है. ऑकस डील से चीन बेहद नाराज़ है. उसने कहा कि ऑस्ट्रेलिया को ये डिसाइड करना पड़ेगा कि वो हमें अपना दोस्त मानता है या दुश्मन. 16 सितंबर को स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि वो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से ऑकस के मुद्दे पर बात करने के लिए तैयार हैं. हालांकि, चीन ने इस अपील पर कोई ध्यान नहीं दिया.

चीन की धमकी

चीन के सरकारी टैबलॉयड ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने लिखा कि अगर साउथ चाइना सी में लड़ाई हुई तो ऑस्ट्रेलिया भी इसकी चपेट में आएगा. अख़बार ने ये भी लिखा कि साउथ चाइना सी में जान गंवाने वाले पहले पश्चिमी सैनिक ऑस्ट्रेलिया से हो सकते हैं. ज़ाहिराना तौर पर ये बयान खुली धमकी है. ऑस्ट्रेलिया के रक्षामंत्री पीटर डटन ने एक इंटरव्यू में कहा कि इसी तरह के बयानों की वजह से हमारे बीच की दूरियां बढ़ीं है. उन्होंने कहा कि हम इस इलाके में शांति चाहते और स्थिरता चाहते हैं. उनके बयान ग़ैर-ज़िम्मेदाराना और बेहद घटिया हैं.

जानकारों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया के पास दो ऑप्शन बचे थे. वो या तो चीन के साथ टॉक्सिक रिश्ते में बना रहता और उसकी मनमानियां सहता या फिर अपना फ़ोकस अमेरिका पर शिफ़्ट कर देता. ऑस्ट्रेलिया पिछले दो दशकों से अमेरिका और चीन, दोनों को एक साथ साध रहा था. अब ये बैलेंस अमेरिका पर शिफ़्ट हो चुका है. यहां से ऑस्ट्रेलिया का वापस लौटना नामुमकिन है.

ऑकस के तहत क्या होने वाला है?

इस समझौते की सबसे बड़ा टॉकिंग पॉइंट है, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली सबमरीन्स बनाने में ऑस्ट्रेलिया की मदद करना. इस काम के लिए तकनीक अमेरिका मुहैया कराएगा, जबकि ब्रिटेन इंजीनियर्स और ज़रूरी कम्पोनेंट्स देगा. ऑकस के तहत 2040 तक आठ सबमरीन्स बनाने का दावा किया जा रहा है. इन्हें ऑस्ट्रेलिया अपनी सामरिक नीति के अनुसार अलग-अलग जगहों पर तैनात करेगा. फिलहाल, अगले 18 महीने इस पूरे प्लान का ब्लूप्रिंट तैयार होने में लगेंगे. अमेरिका ने ये टेक्नॉलजी 1958 में ब्रिटेन के साथ साझा की थी. कोल्ड वॉर के दौर में सोवियत संघ की चुनौती का सामना करने के लिए. उसके बाद से अब वो ये तकनीक ऑस्ट्रेलिया के साथ साझा कर रहा है. ये ऑकस की गंभीरता को बताने के लिए काफी है.

एक और बात, ये सबमरीन्स परमाणु ऊर्जा से चलेंगी. इनमें परमाणु हथियार नहीं लगे होंगे. ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तख़त किया हुआ है. इंडो-पैसिफ़िक में चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय सीमा में चीनी सबमरीन्स की गश्ती तेज़ होने लगी है. चीन के पास दुनिया की सबसे सबमरीन फ़्लीट है. उसके पास लगभग 350 सबमरीन्स हैं. इनमें से एक दर्ज़न से अधिक परमाणु ऊर्जा और हथियारों से लैस है.

परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां अपेक्षाकृत तेज़ होती हैं. वे ज़्यादा लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं. उन्हें सिर्फ़ क्रू के खाने-पीने का स्टॉक भरने के लिए ऊपर आना होता है. साउथ चाइना सी में चीन के बढ़ते दखल से पश्चिमी देशों की चिंताएं बढ़ी हुई थी. ऑकस को इसी चिंता के एक समाधान के तौर पर देखा जा रहा है. इसके जरिए, तीनों देश एक-दूसरे के साथ तकनीक तो साझा करेंगे ही. साथ ही साथ, रोटेशनल बेसिस पर एक-दूसरे की ज़मीं पर सैनिकों और बाकी सैन्य साजो-सामान की भी तैनाती हो सकेगी.

ऑकस ने तीनों देशों को चीन से निपटने का मंत्र तो दे दिया, लेकिन उनका एक खास दोस्त बेहद नाराज़ हो चुका है. फ़्रांस के रक्षामंत्री और विदेश मंत्री ने जॉइंट स्टेटमेंट जारी कर ऑकस पर नाराज़गी जताई. उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपने खास सहयोगी को धोखा दिया है. 16 सितंबर को वॉशिंगटन में फ़्रांस और अमेरिका की दोस्ती को लेकर एक इवेंट का आयोजन था. ऐन मौके पर फ़्रेंच डिप्लोमैट्स ने इसमें हिस्सा लेने से मना कर दिया.

फ़्रांस की नाराज़गी का कारण क्या है?

इसका कारण है, साल 2016 की एक डील. ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस के साथ डीजल से चलने वाली 12 पनडुब्बियां खरीदने के लिए समझौता किया था. ये लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये की डील थी. ऑस्ट्रेलिया के इतिहास का सबसे डिफ़ेंस कॉन्ट्रैक्ट. सप्लाई की डेडलाइन साल 2034 में रखी गई थी. 15 महीने तक चली बिड के बाद ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस को जापान और जर्मनी के ऊपर तरजीह दी थी. इस फ़ैसले से जापान नाराज़ भी हुआ था. लेकिन फ़्रांस के साथ डील आगे बढ़ गई.

बीच-बीच में कुछ रुकावटें आतीं रही, लेकिन काम नहीं रुका. दो हफ़्ते पहले ही ऑस्ट्रेलिया ने आश्वस्त किया था कि डील बदस्तूर ज़ारी है. और, अब अचानक से फ़्रांस के साथ हुई डील को रद्द कर दिया गया है. ऑस्ट्रेलिया के पीएम स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि उनके देश की ज़रूरतें बदल गईं है. ये ज़रूरतें डीजल से चलने वाली सबमरीन्स से पूरी नहीं हो पाएंगी. फ़्रांस का गुस्सा इसी बात को लेकर है. फ़्रांस का कहना है कि हमें बिना बताए और हमें भरोसे में लिए बिना डील तोड़ी गई है. इससे तकरीबन तीन हज़ार नौकरियां अचानक से खत्म हो गईं. ये लोग सबमरीन बनाने के काम में जुटे थे.

फ़्रांस ने कहा है कि ये कहानी यहीं पर खत्म नहीं होगी. ऑस्ट्रेलिया को इसका जवाब देना होगा. हम उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ देंगे. ये दो सरकारों के बीच का समझौता है. जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में दोनों देश अंतरराष्ट्रीय अदालत में एक-दूसरे को चुनौती देते दिख सकते हैं.

फ़्रांस का सबसे अधिक गुस्सा अमेरिका को लेकर है. उसने कहा कि इस तरह के घटिया फ़ैसले की उम्मीद जो बाइडन से कतई नहीं थी. अमेरिका और फ़्रांस नाटो में एक-दूसरे के सहयोगी हैं. अफ़ग़ानिस्तान में मिली हार के बाद से नाटो को भंग किए जाने की मांग हो रही है. ऐसे समय में फ़्रांस को धोखा देना अमेरिका को भारी पड़ सकता है.

अमेरिका इस नुकसान को रोकने की कोशिश में जुटा है. क्या फ़्रांस इतना भारी नुकसान झेलने के बाद चुप बैठ जाएगा, ये कहना बेहद मुश्किल है. इतना तो तय है कि चीन को साधने के चक्कर में अमेरिका ने अपने बड़े सहयोगी को नाराज़ कर दिया है. इसका क्या परिणाम होगा, ये तो आने वाले वक़्त में ही पता चलेगा.


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