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सिर्फ जीतने नहीं, दबदबा बनाने टोक्यो पहुंचा ये पुलिसवाला लाएगा ओलंपिक्स मेडल?

खेल में हार-जीत तो लगी रहती है. एक हार से कुछ नहीं होता. अरे हार ही तो थी, कौन सी मौत आ गई. अक्सर हारने वाले एथलीट्स को लोग ऐसी बातें कहकर समझाने की कोशिश करते हैं. लेकिन एक हार किसी एथलीट पर कितना असर डाल सकती है ये तो वही शख्स जानता है जिसने उस हार को जिया हो. इतिहास में ऐसी तमाम हारों के क़िस्से हैं जिनके बाद हारने वालों का करियर खत्म हो गया.

वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हार को पीछे छोड़ तुरंत ही आगे की ओर बढ़ जाते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि बस यही दो कैटेगरी है. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हार का ग़म मनाकर वापसी करते हैं और एक बार फिर से दुनिया को चैलेंज कर अपनी जगह और बेहतर करते हैं. वो दिखा देते हैं कि उनकी हार बस स्पीड ब्रेकर थी, सड़क का अंत नहीं. हमारी टोक्यो 2020 ओलंपिक्स स्पेशल सीरीज ‘उम्मीद’ के सातवें एपिसोड में आज बात एक ऐसे ही एथलीट की.

# कौन हैं Vikas Krishan?

‘पहले मैं भाग्य पर बहुत निर्भर रहता था, ड्रॉ ज़रूरत से ज्यादा ही मायने रखता था. मैं अनुशासनहीन था, पहले के सालों में मैं उतनी शिद्दत से ट्रेनिंग नहीं करता था, जितनी शिद्दत से मुझे ट्रेनिंग करनी चाहिए थी. मैं अपनी हेल्थ की उतनी केयर नहीं करता था जितनी मुझे चाहिए थी. लेकिन अब यह बदल चुका है. पिछले एक साल में मैंने बहुत कु़र्बानियां दी हैं.’

बॉक्सर विकास कृष्ण की इन बातों का महत्व जानने के लिए आपको लगभग 10 साल पीछे जाना होगा. 5-6 अगस्त, 2012 की दरमयानी रात. लंदन ओलंपिक्स में खेल रहा भारतीय बॉक्सिंग खेमा बेहद खुश था. सिर्फ 19 साल के विकास क्वॉर्टर-फाइनल में पहुंच चुके थे. उन्होंने अमेरिकी बक्सर एरल स्पेंस को 13-11 से मात दी थी. टीम बेहद खुश थी कि उनका बॉक्सर अब अपने पहले ही ओलंपिक्स में मेडल से सिर्फ एक जीत दूर था. लेकिन कुछ ही घंटों में ये खुशी दुख में बदल गई. बॉक्सिंग की माई-बाप AIBA ने फैसला पलट दिया.

अमेरिकी बॉक्सर ने फैसले पर आपत्ति जाहिर की थी और AIBA ने उस आपत्ति से सहमति जता दी. बताया गया कि फाइट में विकास ने नौ फाउल किए थे और उन्हें सिर्फ एक के लिए चेतावनी मिली थी. नतीजतन स्पेंस को चार पॉइंट्स और मिल गए. इन पॉइंट्स के दम पर स्पेंस ने मुकाबले को 13-15 से जीत लिया. ओलंपिक्स में गए भारतीय दल के चीफ पीके मुरलीधरन राजा ने इस फैसले पर खूब हंगामा काटा. लेकिन फैसला नहीं पलटा. विकास ‘जीतकर’ भी ओलंपिक्स से बाहर हो गए.

हिसार के गांव सिंघवा खास के रहने वाले विकास जब दो साल के थे तभी बिजली विभाग में कार्यरत उनके पिता का ट्रांसफर भिवानी हो गया था. और विकास ने 10 साल की उम्र में भिवानी बॉक्सिंग क्लब से अपनी बॉक्सिंग शुरू की. और इस शुरुआत के नौ साल बाद सब खत्म होता दिख रहा था. इस हार ने उन्हें बुरी तरह से तोड़ दिया. उन्होंने ग्लव्स टांग किताबें उठा लीं और पढ़ाई की ओर मुड़ गए.

लेकिन पढ़ाई और फिर पुलिस की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद हरियाणा पुलिस के DSP विकास बॉक्सिंग रिंग में लौट आए. उनकी जिंदगी को क़रीब से देखें तो उन्हें रिंग में लौटना ही था. क्योंकि उनके ज्यादातर दोस्त बॉक्सर ही थे. और कबीरदास जी बहुत पहले कह गए हैं,

‘जो जैसी संगति कर, सो तैसा ही फल पाइ.’

अर्थात जिसकी जैसी संगति होती है, वह वैसा ही फल पाता है.

विकास रिंग में लौटे और फिर आया 2016 रियो ओलंपिक्स. इस बार वह क्वॉर्टर-फाइनल तक तो पहुंच गए. लेकिन इससे आगे नहीं जा पाए. 75kg कैटेगरी में खेल रहे विकास को उज़्बेकिस्तान के बेकतेमिर मेलिकुज़ीव ने 0-3 से हराया. ऐसे लोग जो सिर्फ ओलंपिक के दौरान क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों को फॉलो करते हैं,उन्हें लग रहा होगा कि ये तो हर बार हार जाता है. फिर हम इससे उम्मीद क्यों कर रहे हैं? तो इस सवाल का जवाब हम आगे देंगे.

# खास क्यों हैं Vikas Krishan?

बेहद कम उम्र में बॉक्सिंग शुरू करने वाले विकास ने भिवानी बॉक्सिंग क्लब के बाद आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट पुणे से ट्रेनिंग ली. और उन्हें पहला ब्रेकथ्रू मिला साल 2010 में. विकास ने साल 2010 में एक-एक कर चार मेडल्स जीते. सबसे पहले उन्होंने 2010 की एशियन यूथ बॉक्सिंग चैंपियनशिप का गोल्ड मेडल जीता.

और फिर उसी साल बाकू में हुई यूथ वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप का गोल्ड मेडल अपने नाम किया. फिर उन्होंने समर यूथ ओलंपिक्स का ब्रॉन्ज़ और फिर एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल भी जीत लिया. एक साल में चार इंटरनेशनल मेडल और उसमें भी तीन गोल्ड! इससे बेहतर शुरुआत क्या हो सकती है? विकास ने अगले साल की वर्ल्ड अमेचर बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी ब्रॉन्ज़ मेडल जीता.

लंदन 2012 ओलंपिक्स की निराशा के बाद विकास ने 2014 एशियन गेम्स से वापसी की. यहां भी विकास ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. फिर अगले साल एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप का सिल्वर भी इनके ही नाम रहा. हालांकि रियो ओलंपिक्स के क्वॉर्टर-फाइनल में विकास हार गए. फिर उन्होंने 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड जबकि इसी साल के एशियन गेम्स का ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. इस मेडल का रंग बदल सकता था लेकिन आंख में लगी गंभीर चोट के चलते विकास आगे के मैचों में खेल ही नहीं पाए.

इसके बाद उन्होंने प्रोफेशनल बॉक्सिंग में हाथ आजमाने का फैसला किया. बता दें कि बॉक्सिंग दो तरह की होती है, अमेचर और प्रोफेशनल. प्रोफेशनल बॉक्सिंग से मतलब वो बॉक्सिंग जिसमें खिलाड़ी किसी देश के लिए नहीं, अपने लिए खेलता है. जीतने पर उसे खूब पैसे मिलते हैं. और अमेचर वाले देश के लिए ही खेलते हैं. विकास ने प्रोफेशनल बॉक्सिंग के दो मैच खेले हैं. और उन्होंने इन दोनों ही मैचों में जीत दर्ज की है.

अमेचर बॉक्सिंग को चलाने वाली संस्था AIBA ने हाल ही में प्रोफेशनल बॉक्सर्स को ओलंपिक्स में खेलने की अनुमति दी थी. इससे पहले प्रोफेशनल सर्किट के बॉक्सर्स ओलंपिक्स नहीं खेल पाते थे. और इस फैसले के बाद विकास ने एक बार फिर से तिरंगे के लिए खेलने का फैसला किया. उन्होंने अपने दोस्त और प्रो बॉक्सर नीरज गोयत के साथ ट्रेनिंग कर अपना वजन फिर से 69 किलो किया.

और फिर क्वॉलिफायर्स में वर्ल्ड नंबर छह जापानी बॉक्सर सिवोन ओकाज़ावा को पीटकर ओलंपिक्स का टिकट कटाया. कई साल से 75kg में खेल रहे विकास ने इस ओलंपिक्स के लिए दोबारा से 69kg में वापसी की और अब अपने पहले ओलंपिक्स मेडल के लिए तैयार हैं.

# Vikas से उम्मीद क्यों?

इतिहास गवाह है कि विकास भारत के लिए जब भी रिंग में उतरे हैं, मेडल लेकर ही लौटे हैं. हालांकि ओलंपिक्स के बारे में ऐसा नहीं कह सकते. ओलंपिक्स में विकास अभी तक सफल नहीं हो पाए हैं. विकास की मानें तो इस बार उनके पास वो सबकुछ है, जो ओलंपिक्स गोल्ड के लिए चाहिए होता है. विकास ने हाल ही में अपनी ट्रेनिंग के बारे में कहा था,

‘अभी मैं जितना तैयार हूं, उससे ज्यादा नहीं हो सकता. मैं महसूस कर सकता हूं कि ये मेरा बेस्ट ओलंपिक्स होने वाला है. अगर चीजें मेरी प्लानिंग के हिसाब से हुईं तो मैं गोल्ड जीतूंगा और अगर चीजें भगवान की प्लानिंग के हिसाब से हुईं, तब भी मैं गोल्ड मेडल जीतूंगा. सरकार और मेरे स्पॉन्सर ने मुझे पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, मुझे इसका क़र्ज चुकाना होगा, मुझे तैयारी के लिए जो कुछ भी चाहिए था, सब मिला, अब यह डिलिवर करने का वक्त है.’

विकास ओलंपिक्स जा रहे भारतीय बॉक्सर्स में सबसे ज्यादा अनुभवी हैं. इस हिसाब से भी उनसे मेडल की उम्मीद की जा रही है. साथ ही वह विजेंदर सिंह के बाद तीन ओलंपिक्स तक पहुंचने वाले सिर्फ दूसरे भारतीय बॉक्सर भी हैं. हालांकि यह आसान नहीं होगा. टोक्यो 2020 ओलंपिक्स में मेडल जीतने के लिए विकास को रशियन आंद्रिय ज़मकोवोय, इंग्लैंड के पैट मैककॉर्मैक जैसे दिग्गजों से पार पाना होगा. 2012 से ओलंपिक्स खेल रहे ज़मकोवोय इस बार मेडल के बड़े दावेदारों में से एक हैं.

जबकि पैट पिछले कई साल से हर इंटरनेशनल इवेंट में गोल्ड या सिल्वर मेडल जीत रहे हैं. पैट बाएं हाथ के बॉक्सर यानी साउथपॉ भी हैं. और विकास लंबे वक्त से साउथपॉ बॉक्सर्स के खिलाफ स्ट्रगल कर रहे हैं. इनके अलावा अमेरिकी डेलांटे ‘टाइगर’ जॉनसन और स्पेन के गब्रिएल माएस्त्रे से निपटना भी आसान नहीं होगा. लेकिन इन चुनौतियों से निपटने के लिए विकास का मंत्र सीधा है,

‘मैं अपने विपक्षी को स्कोर ही नहीं करने दूंगा. ट्रेनिंग हो या टूर्नामेंट मेरा माइंडसेट सेम है. मेरा लक्ष्य अपनी सारी ट्रेनिंग झोंकने का है जिससे ओलंपिक्स में कोई मुझे छू भी ना पाए. मैं सिर्फ जीतकर नहीं रुकने वाला, मुझे दबदबा बनना है.’


उम्मीद: टोक्यो 2020 ओलंपिक्स से शूटिंग में गोल्ड ला पाएगी सौरभ-मनु की जोड़ी?

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