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घर वालों की बंदिशों से परेशान युवा का अपने मम्मी-पापा को खुला खत

मैं एक 20 साल का नॉर्मल लड़का हूं. मुझे बहुत प्रॉब्लम है. अपनी सोसाइटी, अपनी फैमिली से. मुझे उनकी कही हुई ज्यादातर बातें अच्छी नहीं लगती. उनकी लगाई हुई पाबंदियां मुझे कतई नहीं भातीं. लेकिन मेरी सबसे बड़ी समस्या ये है कि मेरे मम्मी-पापा भी मुझे या मेरी बातों को नहीं समझते. कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं क्या करूं कि वो मेरी बात को समझ लें. वो वैसे पैरेंट्स बन जाएं, जैसे हमने कई वेब-सीरीज और फिल्मों में देखे हैं.

उनको हमारे मोबाइल चलाने से परेशानी है, घूमने से परेशानी है, हमारे कपड़ों से परेशानी है, टाइम-टेबल से परेशानी है, तौर-तरीकों से परेशानी है. इसकी वजह ये नहीं कि मैं बुरा हूं, मैं गलत संगत में हूं या फिर ऐसा कोई काम कर रहा हूं जिसे सभ्य समाज गलत मानता हो. बस चीजें अपने होने में ही गलत हैं. यही कारण है कि हम ज्यादातर घर से बाहर ही रहना चाहते हैं. उन लोगों के साथ जो हमें जानते हैं, हमारे जैसे ही हैं.

क्यों भाई? इस बेचारे की गलती क्या है?

मैंने ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद एक सम्मानजनक मीडिया फर्म में इंटर्नशिप ज्वाइन कर ली. क्योंकि मुझे इसी फील्ड में इंटरेस्ट है. इससे मेरे घरवाले बेहद परेशान हैं. उनको लगता है उनके लड़के ने पढ़ाई-लिखाई से तौबा कर ली है, इसका तो फ्यूचर ख़त्म है. उनको लगता है कि पढ़ाई के अलावा दुनिया में और कोई कोई रास्ता ही नहीं है. क्योंकि उनको भी बचपन से यही सिखाया गया है. उन्होंने अपने घर में किसी को ये सब करते देखा भी नहीं है. ये सब चीज़ें उन्होंने सिर्फ अख़बारों में पढ़ा या मोहल्ले की आंटियों से सुना है. उनकी चिंता और डर भी जायज हैं. वो चाहते हैं की उनका लड़का भी शर्मा जी लड़के की तरह टॉप करे. अच्छी नौकरी करे. बाउजी का नाम रोशन करे. लेकिन लड़के से कभी नहीं पूछा कि क्या करना चाहते हो? और जब लड़के ने खुद अपने लिए अपनी पसंद का कुछ शुरू किया तो वो उन्हें अच्छा नहीं लग रहा. सपोर्ट करने में उन्हें फैमिली और सोसाइटी से जज किए जाने का भी डर है.

अरे, तो आपके इन झंझटों में लड़का अपना करियर ख़राब कर ले क्या? आपके लिए बच्चे से प्यारी आपकी सोसाइटी है. लेकिन पापा एक बात आप समझने की कोशिश करिए कि लड़के को अपने करियर की चिंता और परवाह आपसे ज्यादा है. थोड़े कंफ्यूज हैं हम. लेकिन ठीक हो जाएंगे. हम तो ठीक हो जाएंगे आप लोग कब ठीक होएंगे? आपके हिसाब से सफल लोग वैसे होते हैं, जैसे अपने आसपास के सफल लोग आपने अब तक देखे हैं. लेकिन मैं दूसरे तरीके से भी तो सफल हो सकता हूं न? फिर हो सकता है, लोग मेरा उदाहरण भी दें, जैसे आप दूसरों का देते हैं, पर वो तब होगा न जब आप उस ओर बढ़ने देंगे.

हमारे एक चाचा हैं. लेकिन उड़ान फिल्म वाले चाचा जैसे बिलकुल नहीं. उनको लकड़ी करने की बहुत आदत है. एक दिन मैं अपनी रिप्ड जीन्स पहन के कहीं जा रहा था. कहने लगे कि ये कैसा जींस पहन रहे हो. मैंने भी टशन में बोल दिया ‘चाचा आजकल फैशन में है’. सीरियस हो गए. कहने लगे फैशन में आएगा तो नंगे भी घूमने लगोगे? बात बहुत बढ़ गई. शॉर्ट में बताते हैं, उनको लगता है, ये फटी जीन्स पहनने वाले लड़के किसी काम के नहीं होते, अव्वल दर्जे के आवारा होते हैं. जिनको फैशन का भूत लग गया वो पढ़-लिख नहीं सकते.

कपड़े ही हैं जो लोगों की मानसिकता और कैरेक्टर को डिफाइन करते हैं. फटे कपड़ों को वो लोग विद्रोह की निशानी समझते हैं. और पता नहीं क्या-क्या? लेकिन मैं यही पूछना चाहता हूं कि कपड़े किसी का कैरेक्टर कैसे डिफाइन कर सकते हैं. दिन में सौ लड़कों और लड़कियों को मैंने अपने जैसी जीन्स पहने देखा है. मेरे ऑफिस में भी एक मैडम हैं जो फटी हुई जीन्स पहन कर आती हैं. उनको तो हम महिला सशक्तिकरण के उदाहरण के रूप में देखते हैं. इसलिए नहीं कि वो फटी जीन्स पहनने का ‘साहस’ रखती हैं, बल्कि इसलिए कि वो अपने काम में उतनी ही परफेक्ट हैं, जितना आपकी समझ में कोई सफल इंसान होना चाहिए. मेरे क्लास का टॉपर भी फटी वाली जीन्स पहनता था, अभी भी पहनता है. उससे भी बड़ी उदाहरण हैं, लखनऊ की ‘पंखुड़ी गिडवानी’ जो फेमिना मिस इंडिया 2016 कांटेस्ट की सेकंड रनर-अप रही थी. पंखुडी ने 2017 के 12वीं बोर्ड में 97.25% स्कोर किया है. उनका नाम लेकर बस ये बताना चाह रहे हैं कि फैशन बुद्धि कुंद नहीं करता. तो चचा आप गलत हैं. कपड़ों से मुझे या और लोगों को जज करना बंद करिए. नहीं भी करेंगे तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या सोचते हैं. तो भाइयो-बहनों आप भी वही पहनें जो आपको अच्छा लगता है. आपके घरवालों के अलावा कोई आपको जज नहीं करता (अगर आप लकी हुए तो घरवाले भी नहीं करते).

 

फेमिना मिस इंडिया 2016 की 2nd रनर-अप पंखुड़ी गिडवानी
फेमिना मिस इंडिया 2016 की 2nd रनर-अप पंखुड़ी गिडवानी

 

हम लोग दोस्ती करते हैं और घूमते-फिरते भी हैं. ज्यादातर घर से बाहर रहते हैं. हम उनके साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं जो हमें जानते हैं, जैसे हैं, वैसे ही एक्सेप्ट करते हैं. एक लाइन में कहें तो दोस्तों के साथ रहना अच्छा लगता है. इस उम्र में ये बहुत नॉर्मल है, हमने दुनिया को प्रयोगशाला की तरह डील करना अभी-अभी सीखा है, और यहां टिकने के लिए उसके बेसिक्स समझने के लिए घर से निकलना जरूरी है. ये बात मुझे समझ आती है. ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है.

इतना ही नहीं घरवालों को हमारे हर काम से समस्या है. इसमें टॉयलेट में 15 मिनट से ज्यादा बैठने से लेकर फ़ोन चलाना तक शामिल है. घर लेट आने पर जो डांट शुरू होती है वो इसी निर्जीव चीज़ पर आकर रुकती है. अब इसमें बेचारे मोबाइल की क्या गलती है? घर वालों के पास हमेशा उन लड़कों की एक लिस्ट होती है जिसके साथ रहने के लिए वो अपने बच्चों को मना करते हैं. लेकिन उनको क्या पता कि गंगाधर ही शक्तिमान है.

 

बहुत देर लगी समझने में
बहुत देर लगी समझने में

 

उनको लगता है घूमने से लड़के गैर-जिम्मेदार हो जाते हैं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. हम लोग अपने सारे काम निपटाने के बाद ही घूमते हैं. और जब जरूरत होती है तो नहीं भी घूमते हैं. घरवालों की बड़ी ख्वाहिश रहती है कि लड़का हमारी सब बात सुने लेकिन लड़के को 8 दोस्तों के फ़ोन आने के बावजूद, आजतक नाइट-आउट की परमिशन नहीं दी. जब आपने लड़के की एक बात नहीं मानी तो कैसे एक्स्पेक्ट करते हैं की वो आपकी सुनेगा. आपने वो नहीं सुना ‘कर्मा इज बिच’.

घरवालों की असली खुन्नस तब सामने आती है, जब लड़का पार्टी के लिए परमिशन मांगने आता है. ऐसा लगता है सारी भड़ास आज ही निकाल देंगे. लेकिन उसके पीछे उनका एक डर भी है जो उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर देता है. वो है नशे की लत का डर. ये वो चीज़ें हैं जिनसे कोई भी मां-बाप सबसे ज्यादा खौफ खाते हैं. लेकिन मम्मी-पापा ये बताइए अगर मुझे ये करना ही होगा तो मैं पार्टी का वेट क्यों करूंगा? ये तो मैं कभी भी कर सकता हूं. एक बात हमेशा याद रखिए, अगर आप अभिभावक हैं और आपको कोई नई चीज पता लगती है और जिसकी भनक भी आप आपने बच्चे को नहीं लगने देना चाहते, तो एक चीज तय मानिए, आपका बच्चा उस चीज को कब का आजमा चुका होगा.

आप लोग माई-बाप बनने के चक्कर में मां-पापा बनना भूल जाते हैं. समस्या यही है. यहीं से शुरू होता है गतिरोध, जो टूटता नहीं है. आप मुझे 20 की उम्र में वो बात समझाना चाहते हैं, जो आपने खुद 45 की उम्र में सीखी है. हमको आपकी वाली एथिक्स और मोरैलिटी समझ नहीं आती और आपको हमारी वाली. जिससे हमारे रिश्ते खराब होने लगते हैं. जो नहीं होने चाहिए किसी शर्त पर. हम हर उस चीज़ से इन्फ्लुएंस नहीं हो जाते, जो हमारे आसपास घटती हैं. हमारा भी अपना दिमाग है जिसका इस्तेमाल आप लोग करने नहीं देना चाहते हैं. जब तक हम चीज़ें खुद नहीं करेंगे, तो सीखेंगे कैसे? कैसे जानेंगे कि क्या गलत और क्या सही है? और इतना भरोसा तो रखिए अपनी औलाद पर कि वो कोई गलत काम नहीं करेगी. आज आप हमें किसी छोटी चीज के लिए टोकेंगे, कम्युनिकेशन बंद हो जाएगा, अभी तो हम कुछ गलत नहीं कर रहे, तब हमारे रिश्ते बिगड़ जाएंगे, फिर कल को अगर किसी कमजोर पल में मुझे आपकी जरूरत होगी तब भी आप नहीं होंगे. बेसिकली आप उन चीजों की सजा भी अनजाने में दे देते हैं, जो हमने ना की है और ना ही करने का इरादा है. हमारी यही गुजारिश है की हमें एक उम्र के बाद आज़ादी मिलनी चाहिए, लेकिन आप लोग इतने प्रोटेक्टिव और पज़ेसिव हो जाते हैं की चीज़ें बिगड़ने लगती हैं.

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क्योंकि इस आर्टिकल में ऐसी फोटो लगाना जरुरी है.

 

मम्मी-पापा आप लोग हमारी दुनिया हैं और हम आपसे बहुत प्यार करते हैं और कोई भी चीज़ इस प्यार को कमजोर नहीं कर सकती. इसीलिए ये सब मैंने आपसे कहा है. ये मेरी और मेरे जैसे युवाओं की कहानी है, जो बहुत ज़रूरी है कि आप तक पहुंचे.


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के साथ इंटर्नशिप कर रहे श्वेतांक शेखर ने की है.


 

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