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लॉकडाउन में घर लौटे मज़दूर अगर काम पर नहीं लौटे तो ये सब देखना पड़ सकता है

मज़दूरों के घर लौटने के तस्वीरें आपने देखी होंगी. कई दिनों तक मज़दूर देश के कई हिस्सों में उलझे रहे. फ़ंसे रहे. अब 29 अप्रैल को गृह मंत्रालय की तरफ़ से आदेश जारी किया गया. देश के अलग-अलग हिस्सों में फ़ंसे मज़दूरों को उनके घरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दी गयी. लेकिन शायद ये घर लौट रहे मज़दूर अब नौकरियों में वापिस नहीं जायेंगे. महानगरों की नौकरी नहीं बजायेंगे. घर पर ही रहेंगे. कम से कम अगले कुछ महीनों तक. और नहीं लौटना, मतलब कई सेक्टरों में वर्क फ़ोर्स की भारी कमी का होना. और इससे कुछ असर हमें और आपको, ज़ाहिर है, देखने पड़ेंगे.

ये हम ख़ुद नहीं कह रहे हैं. मज़दूर ख़ुद कहते हैं. दयाराम कुशवाहा की फ़ोटो याद होगी. दिल्ली से मध्य प्रदेश के ग्वालियर के पास मौजूद अपने गांव तक का सफ़र किया. अपने 5 साल के बेटे शिवम को कंधे पर बिठाकर रॉयटर्स के पत्रकार दानिश सिद्दीक़ी दिल्ली से उनके गांव तक गए. कई जगहों पर दयाराम कुशवाहा की बात छपी. दिल्ली में कन्स्ट्रक्शन वर्कर का काम करने वाले दयाराम कुशवाहा अपने गांव गए. क्योंकि दिल्ली में पैसे और रोटी का कोई जुगाड़ नहीं था. जिस समय फ़सल की कटाई का मौसम है, उस समय दयाराम का घर लौटना ज़रूरी था. लॉकडाउन के चक्कर शहर में सब बंद था. अब कहते हैं कि अब तो कुछ दिन गांव में ही रहेंगे. क्या पता शहर कब सामान्य होगा?

अपने बेटे शिवम के साथ दयाराम कुशवाहा. (फ़ोटो साभार : दानिश सिद्दीक़ी/ रॉयटर्स)

दयाराम ही नहीं, यूपी के मिर्ज़ापुर के मंगला कुमार भी यही कहते हैं. 49 वर्षीय मंगला लॉकडाउन के समय बसों में बैठकर अपने घर पहुंचे. और कहते हैं कि दिल्ली की काग़ज़ फ़ैक्टरी का काम नहीं करना है अब. गांव में ही रहना है. कम से कम रोटी और नमक तो मिल जाएगा. शहर में तो भूखे मरने की नौबत है. फ़ैक्टरी बंद है. किराए-भाड़े तक का पैसा नहीं है. यहां पर तो ऐसी कोई लड़ाई नहीं है. सब अपना ही है.

लेकिन मज़दूरों के अपने-अपने घर वापिस लौटने से क्या होगा? आंकड़े बहुत ज़्यादा तो नहीं हैं. लेकिन कुछ हैं. जैसे एक इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है. कहती है कि पंजाब और हरियाणा के किसानों ने मज़दूरों के अभाव में खेती-किसानी का तरीक़ा ही बदल दिया है. पंजाब के मनसा जिले के किसाब मनजीत सिंह सिद्धू ने एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि उनके पास 13 एकड़ की खेती है. लेकिन मज़दूरों के अभाव में वे इस बार 11 एकड़ में कपास की खेती कर रहे हैं. जबकि बचे हुए 2 एकड़ में ही धान की खेती कर रहे हैं. धान काटने को मज़दूर नहीं हैं. इसलिए धान की खेती कम.

पंजाब और हरियाणा में यही पराली जलाने से प्रदूषण में कई गुना इज़ाफ़ा होता है. लेकिन इस बार धान ही नहीं बोया जा रहा. तो शायद दृश्य कुछ अलग हो.

इसी गांव के शमशेर सिंह बताते हैं कि पिछले साल उन्होंने अपने 8 एकड़ के खेत में धान की खेती की थी. लेकिन पिछले साल तो मज़दूर थे, जो खेत में काम करते थे. इस बार ऐसा नहीं है. तो शमशेर सिंह ने 8 एकड़ के पूरे खेत में कपास की खेती कर दी.

आंकड़े और भी हैं. मज़दूरों के घरों की ओर लौट जाने से बड़ी संख्या में आजीविका का संकट सामने आ रहा है. और मज़दूरों के साथ काम करने वाले लोग बताते हैं कि लॉकडाउन की स्कीम इस संकट को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गयी थी. घूमंतू मज़दूरों के साथ काम करने वाले संगठन आजीविका ब्यूरो की अधिकारी अमृता शर्मा बताती हैं,

“लॉकडाउन की जब बात हो रही होगी, उस समय केंद्र के सामने ये अन्दाज़ नहीं होगा कि मज़दूरों के सामने इतना बड़ा संकट पैदा हो जाएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि ये मज़दूर कभी किसी पॉलिसी के केंद्र में थे ही नहीं. लॉकडाउन लगा. संकट आया. तब समझ आया कि ये दिक़्क़त है.”

अमृता आगे कहती हैं,

“अब मज़दूर अपने घर जाना चाह रहे हैं. और घर पहुँच रहे हैं. तो कहीं भी कुछ काम है नहीं. और उन्हें पता नहीं कि वे लौटकर अपना काम कब सम्हाल पाएँगे. काम कब शुरू होगा? पैसा कैसे आएगा?”

इंडिया टुडे हिन्दी के सम्पादक और हमारे अर्थात के स्तम्भकार अंशुमान तिवारी इस दिशा में कुछ प्रकाश डालते हैं. कहते हैं,

“सबसे पहली बात ये जाननी चाहिए कि मज़दूर बस शहर से गांवों की ओर नहीं जा रहे हैं. एक क़िस्म की अर्थव्यवस्था से दूसरे क़िस्म की अर्थव्यवस्था में लौटे हैं. अब वे अपने गांव की इकॉनमी में गए हैं. वहां संसाधन सीमित हैं. सब कुछ पहले से और कम है. इसी वजह से वे सब छोड़कर शहरों की ओर गए थे. अब शहरों से वापिस चले गए हैं तो फ़ैक्टरी शुरू होने के बाद वहाँ काम करने वाले लोग नहीं होंगे. यानी शहर में काम करने वाले नहीं बचे, गांवों में काम नहीं बचा.”

इसके परिणाम क्या हो सकते हैं? अंशुमान तिवारी बताते है,

“कामगारों की कमी बढ़ेगी. इस वजह से उत्पादन में भी कमी बढ़ेगी. वो चाहे कोई भी सेक्टर हो. और भारत ऐसा देश है नहीं कि वही काम करने के वैकल्पिक तरीक़े तेज़ी से तलाशे जा सकें. अब उत्पादन कम होगा तो ज़ाहिर है, देश के शहरों में महंगाई बढ़ेगी. अब इस स्थिति से बचने के लिए लॉकडाउन के बाद कंपनियां अपने कामगारों की संख्या में कटौती करेंगी. और चूंकि उपभोक्ताओं की मांग ही नहीं है, तो आप उत्पादन क्यों बढ़ायेंगे?”

ये ठीक कैसे होगा? सरकार क्या कर सकती है. क्योंकि मज़दूर संगठनों के लोग सरकार से अपेक्षा लगाकर बैठे हैं कि उसकी नीतियों से इस सेक्टर में बदलाव होंगे. लेकिन अंशुमान तिवारी बताते हैं,

“नहीं. सरकार क्या करेगी? सरकार अधिक से अधिक कम्पनियों को या तो मज़दूरों को फ़ौरी तौर पर थोड़ी मदद दे सकती है. लेकिन जब तक हमारे और आपके जैसे आम उपभोक्ताओं से मांग नहीं उपजती है, तब तक कुछ नहीं हो सकता. सरकार के तो अधिकार इस मामले में सीमित ही हैं. डिमांड से ही अर्थव्यवस्था का चक्का घूमेगा. वहीं से कुछ हासिल होगा.”

यानी शिकायतें तो हैं, लेकिन समाधान भी कमोबेश शिकायत करने वाली जनता के पास ही है. लोग खेती बदल रहे. काम करने का तरीक़ा बदल रहे. लेकिन अगर मार्केट में किसी चीज़ मांग बढ़ती है, तो ही उस चीज़ की फ़ैक्टरी का स्टार्ट बटन दबेगा और तभी उस फ़ैक्टरी का कर्मचारी फिर से अर्थव्यवस्था को सींचेगा.


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