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असम की रहने वाली लवलीना बोर्गोहेन, जो साफ कहती हैं कि मेडल तो गोल्ड ही होता है

किकबॉक्सिंग. अजीब ही खेल है. मुक्का भी मारते हैं और लात भी. साथ में खतरनाक इतना कि एक फाइट घर पर देख ली तो माताजी ने वॉर्निंग दे दी- दोबारा मत देखना. लेकिन ये जरूरी थोड़े है कि सबकी माताजी मेरी माताजी जैसी ही हों. तभी तो दुनियाभर में लोग किकबॉक्सिंग खेलते हैं. और इन्हीं की जमात में हमारे असम की तीन बहनें भी थीं. लिचा, लिमा और लवलीना. लिचा और लिमा जुड़वा बहनें हैं और किकबॉक्सिंग में नेशनल लेवल तक खेल चुकी हैं. और इनको देखकर ही छोटी बहन लवलीना ने भी किकबॉक्सिंग शुरू की.

अब अगर आप स्पोर्ट्स फॉलो करते हैं तो सोच रहे होंगे कि जिस लवलीना को आप जानते हैं, वो तो बॉक्सर है. तो हम ये किस लवलीना की बात कर रहे हैं. तो थोड़ा धैर्य रखिए, ये लवलीना और वो लवलीना में कोई अंतर नहीं है. दोनों सेम ही हैं. और अपनी ओलंपिक्स स्पेशल सीरीज ‘विजेता’ में आज हम किकबॉक्सर से बॉक्सर बनीं लवलीना की ही बात करेंगे.

कमाल की छलांग मारी ना हमने? पिछले एपिसोड में अटलांटा 1996 में थे और अब सीधे टोक्यो 2020 आ गए. लेकिन मम्मी कसम, ये जानबूझकर नहीं हुआ. बस वक्त ने किया कुछ ऐसा सितम कि मजबूर हो गए हम. अब हमारी मजबूरी से आगे बढ़ते हैं और करते हैं लवलीना की बात.

# कौन हैं Lovlina Borgohain

एक लाइन में कहें तो भारत के लिए ओलंपिक्स मेडल जीतने वाली तीसरी बॉक्सर. लेकिन एक ही लाइन में बता देंगे तो इसमें लल्लनटॉप क्या रह जाएगा? इसलिए विस्तार से बात करते हैं. और विस्तार में जाने के लिए अपने को जाना होगा कम से कम 9 साल पीछे. आज 23 साल की हो चुकी लवलीना तब 13-14 साल की थीं. और उसी वक्त हुए थे लंदन ओलंपिक्स. साल 2012 के इन ओलंपिक्स में दुनिया ने पहली बार इस स्टेज पर विमेन बॉक्सर्स को देखा. और इसी वर्ल्ड कप में लेजेंडरी मेरी कॉम ने अपना पहला और इकलौता ओलंपिक्स मेडल जीता.

इस ब्रॉन्ज़ जीत के बाद मणिपुर की मेरी, असम का चेहरा बन गईं. बताते हैं कि उस दौरान पूरे असम में पोस्टर-बैनर-फ्लेक्स पर सिर्फ और सिर्फ मेरी कॉम ही दिख रही थीं. सरकार ने ना सिर्फ मेरी के पोस्टर्स पूरे असम में लगाए बल्कि पड़ोसी राज्य की इस एथलीट को सम्मानित भी किया. कई असमी बुद्धिजीवियों ने इस पर गहरी आपत्ति भी जताई. वे असम से 500 किलोमीटर दूर इम्फाल की मेरी को अपने राज्य का चेहरा बनाए जाने से खफ़ा थे. लेकिन बुद्धिजीवी और आम लोगों में काफी अंतर होता है. और ये अंतर यहां भी दिखा.

सरकार के पोस्टर्स ने असर किया, और राज्य की बॉक्सिंग अकैडमीज में एकाएक बच्चों की बाढ़ आ गई. असम का हर चौथा बच्चा बॉक्सर बनना चाहता था. और इसमें लड़कियों की संख्या काफी थी. इससे पहले राज्य की लड़कियां बॉक्सिंग में नहीं जाती थीं. क्यों नहीं जाती थीं? इस बारे में पूर्व बॉक्सर प्रणामिका बोरा ने न्यूज़क्लिक से कहा था,

‘शुरुआत में एक लड़की के लिए बॉक्सिंग में जाने को जस्टिफाई करना मुश्किल होता था. आपके माता-पिता आपको इतने फिजिकल गेम में नहीं भेजना चाहते थे. यह आज जैसा स्वीकार्य नहीं था. आज के जमाने में चीजें अलग हैं. अब लोगों के पास इंटरनेट है, लोग दिखा सकते हैं कि बड़े इवेंट्स में भी लड़कियां खेल रही हैं. मेडल जीत रही हैं, तो इससे अंतर आया है. फिर अगर बॉक्सर बड़े पोस्टर पे है, तो इंट्रेस्ट बढ़ेगा.’

अब बाढ़ आ तो गई, लेकिन जरूरी थोड़े है कि बाढ़ में सब अच्छा ही अच्छा हो. ऐसे में हुआ टैलेंट हंट. और इसी टैलेंट हंट के दौरान गोलाघाट की किकबॉक्सर लवलीना को स्कूल बॉक्सिंग ट्रायल्स से उठाकर सीधे सब जूनियर नेशनल्स में महाराष्ट्र भेज दिया गया. कमाल की बात ये कि लवलीना को भेजने वाला कोई स्कूल का पीटी टीचर नहीं, बल्कि स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के गुवाहाटी सेंटर के बड़े कोच पदम बोरो थे. और इस सेलेक्शन के लगभग तुरंत बाद लवलीना समेत कई लड़कियों को SAI के गुवाहाटी सेंटर भेज दिया गया.

और यहां से शुरू हुआ लवलीना का सफर अब पहुंच चुका है ओलंपिक्स ब्रॉन्ज़ मेडल तक. लेकिन यहां तक आना इतना आसान नहीं था. आसान होता तो अभी तक सिर्फ तीन भारतीय बॉक्सर्स ही थोड़े ना इस लिस्ट में होते. तो सफर अगर आसान नहीं है तो इंट्रेस्टिंग जरूर होगा. और दी लल्लनटॉप में हम यही तो करते हैं, इंट्रेस्टिंग बातें आपको बताते हैं. तो चलिए अब आगे बढ़ते हैं.

# Tokyo 2020 Olympics

SAI गुवाहाटी आने के बाद इस किकबॉक्सर ने बॉक्सिंग शुरू कर दी. और इसे बस शुरू ही तो करना था, क्योंकि बॉक्सिंग के लिए जरूरी चीजें तो पहले से इनके पास थीं. बकौल कोच पदम बोरो,

‘हमने उसकी शारीरिक विशेषताओं को देखकर उसका सेलेक्शन किया था. क्योंकि उसके पास एक कॉम्बैट (मारपीट वाले) स्पोर्ट का अनुभव था, उसका बैलेंस अच्छा था और सहनशक्ति भी. मैंने उसे शैडो-बॉक्सिंग (शैडो माने परछाईं और बॉक्सिंग आप जानते हैं) के लिए कहा और देखा कि वो कायदे से मूव कर पा रही है. बस इतना काफी था.’

और बस इन जरूरी चीजों के साथ शुरू हुआ लवलीना का सफर. साल 2016 से उन्होंने नेशनल और इंटरनेशनल इवेंट्स में भारत की जर्सी में खेलना शुरू कर दिया. और फिर आया साल 2018. ऑस्ट्रेलिया के शहर गोल्ड कोस्ट में होने थे कॉमनवेल्थ गेम्स. सारे एथलीट्स तैयारी कर रहे थे. और इसी बीच लवलीना के पास नॉर्थ-ईस्ट नाउ से एक कॉल आई. कॉल करने वाले पत्रकार ने कहा,

‘कॉमनवेल्थ गेम्स में सेलेक्शन की बधाई’

अब सोचिए, बधाई मिलने पर आम रिएक्शन क्या हो सकता है?

व्यक्ति बहुत खुश होगा या चौंक जाएगा. लेकिन यहां तो तीसरी ही बात हो गई. लवलीना के पैरों के तले से जमीन खिसक गई. क्योंकि इस कॉल से पहले किसी ने उन्हें बताया ही नहीं था. जी हां, लवलीना को अपने सेलेक्शन की ख़बर आम जनता की तरह ही मीडिया से मिली. इस देश के खेलों को चलाने वाली अथॉरिटीज ने उन्हें सूचित करने का लोड ही नहीं लिया. हालांकि इसके बाद भी लवलीना गोल्ड कोस्ट गईं और वहां क्वॉर्टर-फाइनल में उन्हें हार मिली.

और लवलीना ने इसका बदला लिया इसी साल हुई वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप्स में. यहां उन्होंने ब्रॉन्ज़ मेडल अपने नाम किया. और फिर अगले साल हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप्स में फिर से ब्रॉन्ज़ जीत लिया. तमाम मेडल्स के साथ आए इन दो मेडल्स ने लवलीना का कॉन्फिडेंस बढ़ाया और फिर 2020 एशियन एंड ओशेनिया बॉक्सिंग ओलंपिक्स क्वॉलिफिकेशन इवेंट में उज़्बेक बॉक्सर को पीट उन्होंने टोक्यो के लिए क्वॉलिफाई कर लिया. ओलंपिक्स तक पहुंचने वाली पहली असमी महिला एथलीट लवलीना ने इस इवेंट का ब्रॉन्ज़ मेडल भी जीता.

और अब टोक्यो में वह ब्रॉन्ज़ मेडल ऑलरेडी अपने नाम कर चुकी हैं. यहां अगला मुकाबला जीतते ही वह सिल्वर और दूसरी जीत मिलते ही गोल्ड भी अपने नाम कर लेंगी. और अपने इस सफर के बारे में उनका कहना है.

‘मेडल तो एक ही होता है, ‘गोल्ड’ उसी की तैयारी है.’


कुश्ती पहलवान केडी जाधव ने कैसे जीता था हेलसिंकी ओलंपिक्स में ब्रॉन्ज़ मेडल?

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