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राकेश शर्मा: स्पेस में बैठकर आलू-छोले, पुलाव और सूजी का हलवा खाने वाले अंतरिक्षयात्री

राकेश शर्मा बोले तो इंडिया के स्पेस हीरो. और 13 जनवरी को आता है उनका हैप्पी बड्डे.

राकेश का नाम मुझे बहुत सही लगता है. ऐसा लगता है कि रॉकेट और आकाश की संधि से बना है. ये नाम उनके अचीवमेंट पर एकदम फिट बैठता है.

ये फर्ज़ी सी संधि तो खैर मैंने अपने हिसाब से कर दी. राकेश को तोड़ने से राक और ईश निकलेगा. राक मतलब पूरा चांद. और ईश मतलब देवता. तो राकेश का मतलब हुआ पूरे चांद का देवता. ये मतलब जानकर चेहरे पर मुस्कान तैरने करने लगती है. वो इसलिए कि बहुत सारे लोग राकेश को चांद पर जाने वाले भारतीय की तरह याद रखते हैं. जो कि गलत है.

कुछ बेसिक बातें – राकेश शर्मा रूस के स्पेसक्राफ्ट में बैठ कर स्पेस में गए थे. स्पेसक्राफ्ट का नाम है – सोयूज़-T11. ये स्पेसक्राफ्ट उन्हें रूस के स्पेस स्टेशन तक ले गया. स्पेस स्टेशन का नाम है – सैल्यूट 7. इस मिशन के लिए 18 महीनों तक रूस में उनकी ट्रेनिंग हुई.

सोयुज़ T 11 का मैस्कॉट. भारत और रूस के झंडे के ऊपर आकाश की ओर जाता रथ. (सोर्स - विकिमीडिया)
सोयुज़ T 11 का मैस्कॉट. भारत और रूस के झंडे के ऊपर आकाश की ओर जाता रथ. (सोर्स – विकिमीडिया)

ये बातें तो हमें आसानी से पता चल जाती हैं. लेकिन जो बातें मुश्किल से पता चलेंगी वो हम आपको बताएंगे.

योग और सूजी का हल्वा

राकेश शर्मा ने स्पेस स्टेशन में लगभग आठ दिन बिताए. वहां से वो इंडियन ऑडिएंस के लिए कुछ वीडियोज़ रिकॉर्ड करते थे. उन वीडियोज़ के ज़रिए वो दर्शकों को स्पेस स्टेशन की सैर कराते थे. सैल्यूट 7 नाम का स्पेस स्टेशन दो बेडरूम के अपार्टमेंट जितना बड़ा था. लेकिन इसके कमरे चौकोर न होकर सिलिंडर जैसे थे.

अंतरिक्ष में पृथ्वी के चक्कर काट रहा ये घर पांच मॉड्यूल्स में बंटा था. इस घर का सबसे अहम मॉड्यूल था – वर्क कंपार्टमेंट. एक्सपेरीमेंट्स से लेकर सोने और खाने तक के काम इसी कंपार्टमेंट में होते थे.

सोयूज़ T 11 का ग्राफिक रीप्रज़ेन्टेशन. (सोर्स - इंडिया टुडे)
सोयूज़ T 11 का ग्राफिक रीप्रज़ेन्टेशन. (सोर्स – इंडिया टुडे)

स्पेस में राकेश घर का खाना नहीं ले जा पाए लेकिन उनका खाना घर जैसा ही था. वेजिटेबल पुलाव, आलू-छोले और सूजी का हलवा. ये खाना मैसूर की डिफेंस फूड रिसर्च लैबोरेटरी में तैयार किया गया था. और इसे रोल में पैक किया गया था.

बिना ग्रेविटी के स्पेस में कुर्सी-टेबल लगाकर खाने में दिक्कत होती है. इसलिए रोल में लिपटा हुआ खाना खाते हैं. राकेश ने ये खाना अपने रूस के साथियों को भी खिलाया. उन एस्ट्रोनॉट्स ने पहली बार सूजी का हलवा खाया, वो भी स्पेस में.

खाने के अलावा राकेश अपने साथ कुछ और चीज़ें ले गए थे. तीन तस्वीरें. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की. राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह की. और रक्षामंत्री वेंकटरमण की. बापू की तस्वीर ले जाने के बजाए राजघाट से उनकी मिट्टी ली गई. और इन सबके साथ एक तिरंगा. ये सारी चीज़ें सैल्यूट 7 की दीवार पर सजा दी गईं.

स्पेस स्टेशन में अपने रूसी साथियों के साथ राकेश. (सोर्स - इंडिया टुडे)
स्पेस स्टेशन में अपने रूसी साथियों के साथ राकेश. (सोर्स – इंडिया टुडे)

ये कोई स्पेस पिकनिक नहीं थी. सैल्यूट में राकेश का टाइट शैड्यूल था. नौ घंटे की नींद के बाद अलार्म क्लॉक की आवाज़ से सब जागते थे. और जागने के बाद उन्हें फ्रेश होने और ब्रेकफास्ट के लिए एक घंटे का टाइम मिलता था.

स्पेस में एक्सरसाइज़ का बहुत बड़ा रोल होता है. पृथ्वी पर ग्रेविटी के कारण हमारे कई हिस्सों की कसरत होती रहती है. अब स्पेस में ग्रेविटी ज़ीरो. और कसरत फुस्स. तो कोई हिस्सा सुन्न न पड़ जाए इसलिए एस्ट्रोनॉट्स एक्सरसाइज़ करते हैं. राकेश सैल्यूट में फिट रहने के लिए योग करते थे. उनके बाकी के साथी पैडलर्स पर एक्सरसाइज़ करते थे.

राकेश के लेफ्ट में कमांडर यूरी और राइट में फ्लाइट इंजीनियर गैनेडी. (सोर्स - स्पेस फैक्ट्स)
राकेश के लेफ्ट में कमांडर यूरी और राइट में फ्लाइट इंजीनियर गैनेडी. (सोर्स – स्पेस फैक्ट्स)

दिन में लगभग दो घंटों के लिए उनकी छाती, गले और जांधों से इलेक्ट्रॉड्स जुड़े होते थे. ये इसलिए कि ज़ीरो ग्रेविटी में उनके खून की चाल देखी जा सके. पृथ्वी पर ग्रेविटी के कारण खून नीचे को ज़्यादा भागता है. ऊपर पंप करने के लिए दिल को अलग से मेहनत करनी पड़ती है. बेसिकली इलेक्ट्रॉड्स के ज़रिए उनकी दिल का हालचाल पता किया जाता था.

ऊपर से क्या दिखा?

जब राकेश कुछ नहीं कर रहे होते थे, तो वो कैमरा निकाल लेते थे. उनके पास स्पेशल मल्टी-स्पेक्ट्रल कैमरे थे. इन कैमरों से वो इंडिया की फोटो खींचते थे. स्पेस स्टेशन कुल नौ बार इंडिया के ऊपर से गुज़रा. नौ में से चार बार राकेश फोटो खींच पाए. और उन्होंने भारत के 60% से ज़्यादा हिस्से की फोटो खींची.

1992 में सैल्यूट का खर्चा पानी बंद हो गया. और वो तब से बंद पड़ा है. (सोर्स - विकिमीडिया)
1992 में सैल्यूट का खर्चा पानी बंद हो गया. और वो तब से बंद पड़ा है. (सोर्स – विकिमीडिया)

उनके पास बढ़िया वाला कैमरा था. वो ऐसे कि उन्हें वहां से माउंट एवरेस्ट चढ़ते कुछ लोग नज़र आए थे. स्पेस से ही उन्हें बर्मा के जंगलों में लगी आग भी दिखी. नीचे इसकी सूचना पहुंची और उस आग पर काबू पाया गया.

राकेश शर्मा और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बातचीत बहुतों ने सुनी है. लेकिन ऊपर से इंडिया को देखकर राकेश ने कुछ और दर्ज किया था –

जैसे-जैसे हम दक्षिण से उत्तर की तरफ जाते हैं, नीला समंदर हरे मैदानों में जा मिलता है. मध्य भारत के ऊपर भूरा नज़ारा. आखिरी में हिमालय की बर्फ से इस नज़ारे को भव्य और सुंदर बना देती है.

कुछ देर बाद उन्हें इल्हाम हुआ –

यहां से सरहदें नज़र नहीं आतीं. पूरा ग्रह एक दिखता है. यहां से ये समझना मुश्किल है कि दुनिया में इतना तनाव क्यों है. यहां से तो हर तरफ शांति फैली दिखती है.

गगनयान की नेशनल एडवाइज़री काउंसिल. इसरो का प्लान है कि 2022 तक गगनयान मिशन पूरा होगा. (सोर्स - ISRO)
गगनयान की नेशनल एडवाइज़री काउंसिल. इसरो का प्लान है कि 2022 तक गगनयान मिशन पूरा होगा. (सोर्स – ISRO)

राकेश शर्मा का 2020 वाला ये बर्थडे इसलिए भी खास है. इसी साल कुछ दिन पहले मिशन गगनयान के लिए चार एस्ट्रोनॉट्स को सिलेक्ट किया गया है. मिशन गगनयान अंतरिक्ष में इंसान पहुंचाने वाला पहला भारतीय मिशन है. और राकेश शर्मा गगनयान की नेशनल एडवाइज़री काउंसिल के सदस्य हैं.

ये बातें हमें 30 अप्रेल 1984 की इंडिया टुडे मैग्ज़ीन से पता चलीं.


वीडियो – स्पेस में जाने वाले एस्ट्रॉनॉट्स की ट्रेनिंग में क्या अलग होता है?

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