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बांधने की कोशिश की तो मर जाएगी भाषा : अविनाश दास

भोजपुरी में अश्लील गानों को लेकर कल्पना पटवारी पर जो हंगामा हुआ है, उसके पक्ष और विपक्ष में तमाम लोग अपनी बात रख चुके हैं. खुद कल्पना भी इस बारे में बता चुकी हैं. कल्पना को लेकर ‘अनारकली ऑफ आरा’ फिल्म के डायरेक्टर अविनाश दास ने एक लेख लिखा था. उसपर प्रतिक्रियाएं आईं और लोगों ने कहा कि अविनाश दास भोजपुरी नहीं मैथिली भाषी हैं. इसके बाद अविनाश दास ने एक बार फिर इसी मुद्दे पर लिखा है, जिसे हम पेश कर रहे हैं:

Avinash das

धुएं से ढंके हुए आसमान के नीचे लगता है कि हर चीज़ झूठ है: आदमी, देश, आज़ादी और प्यार! सिर्फ़ नफ़रत सही है. इस शहर में या उस शहर में, यानी कि मेरे या तुम्हारे शहर में. चंद चालाक लोगों ने बहस के लिए भूख की जगह भाषा को रख दिया है. उन्हें मालूम है कि भूख से भागा हुआ आदमी भाषा की ओर जाएगा. उन्होंने समझ लिया है कि एक भुक्खड़ जब ग़ुस्सा करेगा, अपनी ही अंगुलियां चबाएगा.
धूमिल

जब चुनने का वक़्त आता है

तब ये गुलाबी नितंबों वाली मखमली पत्रिकाओं की जगह

ज्ञान का वर्जित फल उठा लेते हैं

उनके झोले में पड़ी किताबों में कोई तस्वीर नहीं होती

उनका सौंदर्य गहरी स्याही से रेखांकित

कुछ वाक्यों में होता है!

विस्साव शिंबोर्स्का

सहमति या असहमति से अलग विचार का उपहास करना और भाषा में कुलांचे भर रहे मेमनों का भाषाई महंथ बन कर भेड़ियों की तरह शिकार करना ही ध्येय हो, तो ऊपर जो काव्य पंक्तियां मैंने साझा की हैं, उनका अर्थ कभी समझ में नहीं आएगा. कुछ लोगों को अश्लील गाने दो, कुछ लोगों को भजन गाने दो, कुछ लोगों को इनक़लाब गाने दो, कुछ लोगों को प्रकृति गाने दो, क्योंकि आभिजात्य [Aristocracy] निर्देशों के पीछे खड़ा कोरस बहुत नीरस होता है. वैविध्य के बीच से समाज अपने हिस्से का फूल चुन लेता है.

कल्पना का दावा है कि उन्हें स्त्री होने की वजह से निशाने पर लिया जा रहा है.
कल्पना का दावा है कि उन्हें स्त्री होने की वजह से निशाने पर लिया जा रहा है.

हर भाषा में बहुजन और अभिजात की अभिव्यक्ति के बीच संघर्ष बहुत प्राचीन है. मैं अक्सर मीरा का उदाहरण देता हूं. स्त्री के लिए ओट की हिमायत करने वाले समाज को मीरा ने निशाना बनाते हुए कहा, “लोकलाज कुल कानि जगत की दई बहाय जस पानी”. महंथों को गुस्सा आया और उन्होंने कहा कि मीरा पागल हो गई है, बौरा गई है. मीरा भी कहां हथियार डालने वाली थी. उसने कहा, “अपने घर का परदा कर लो मैं अबला बौरानी”. आज भाषा को मीरा की तरह परदे में रहने की वकालत करने वाले सूरमा नए ज़माने के भाषाई महंथ हैं. ये भाषा का स्तर गिराएंगे, उसे सीमाओं में बांधेंगे और अंतत: दम तोड़ देने पर मजबूर कर देंगे.

Kalpana 1

मेरी मातृभाषा मैथिली है. मैंने अपने पिता या मां या बहनों से कभी हिंदी में बात नहीं की. मेरी पत्नी की मातृभाषा भोजपुरी है और वह भी अपने बहन-भाइयों से भोजपुरी में ही बात करती हैं. हम दोनों अपनी-अपनी मातृभाषाओं से प्रेम करते हुए एक छत के नीचे प्रीतिपूर्वक निबाह रहे हैं. भाषा के घूंघट में चेहरा छिपा कर भाषा पर हमले का मसला नहीं, मसला विचार का है. इसलिए जो लोग यह मुनादी कर रहे हैं कि चूंकि मेरी मातृभाषा मैथिली है, इसलिए मैं भोजपुरी संगीत को कथित तौर पर डीग्रेड करने वाली कल्पना को डिफेंड कर रहा हूं. उन्हें यह समझना चाहिए कि सवाल कल्पना बनाम संस्कृति का नहीं बल्कि संस्कृति की उदार समझ बनाम संस्कृति की संकीर्ण समझ का है. मैथिली में कांचीनाथ झा किरण, राजकमल चौधरी, ललित, जीवकांत, सोमदेव, कुणाल, अग्निपुष्प, तारानंद वियोगी जैसे कई और लेखकों ने समझ की इसी ज़मीन पर महंथों से शास्त्रार्थ किया और अपनी कीर्ति-पताकाएं फहरायीं.

kalpana 1

गंगा मुक्ति आंदोलन के दौरान एक नारा बड़ा लोकप्रिय हुआ था, गंगा को अविरल बहने दो. भाषा के लिए भी यह हमेशा प्रासंगिक रहने वाला नारा है – भाषा को अविरल बहने दो. बांधने की कोशिश की जाएगी, तो वह ऐसे ही मर जाएगी, जैसे नदियां मर रही हैं.
मेरे लिए फिलहाल यह भाषा-प्रसंग समाप्त!


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